बेईमानी किसे कहा जाए?

बेईमानी किसे कहा जाए?

जनतान्त्रिक सिस्टम में अवाम का दर्जा भगवान बराबर कहा जाता है। इसके बावजूद कि आम लोगों यानी जनता के पांच साल या अमरीका, ब्रिटेन और आस्टेªलिया जैसे मुल्कांे में चार साल में एक बार अपने वोट का इस्तेमाल करने का मौका मिलता है। वोट के जरिए सरकारें बनने और बिगड़ने का सिलसिला दुनिया के हर मुल्क में रायज है। एलक्शन के वक्त हर सियासी पार्टी अपना एक एलक्शन मेनिफेस्टो जारी करती है। जिसे सियासी पार्टियों का सबसे ज्यादा पाकीजा दस्तावेज (पवित्र ग्रंथ) कहा जाता है। 1947 में हिन्दुस्तान आजाद हुआ तभी से दुनिया के तमाम दूसरे मुल्कों की तरह हिन्दुस्तान की मरकजी सरकार रही  हो या प्रदेशांे की सरकारें जैसे ही एलक्शन में किसी पार्टी की शिकस्त हुई या यूं कहें कि जो कोई भी पार्टी 49 फीसद तक रह गई वह अपोजीशन पार्टी बनी और जो 51 फीसद तक पहुच गई वह रूलिंग यानी सत्ताधारी पार्टी बन गई। हद यह है कि 1999 में पंडित अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार लोक सभा में सिर्फ एक वोट से हार गई थी तो अटल बिहारी वाजपेयी ने हंस कर वजीर-ए-आजम की कुर्सी छोड़ दी थी। जिन लोगों ने उस दिन हारने के बाद टीवी चैनलों पर अटल बिहारी वाजपेयी को देखा था उन्हें अच्छी तरह याद होगा कि वाजपेयी के चेहरे पर न कोई शिकन थी न गुस्सा बल्कि उस वक्त की लीडर आफ अपोजीशन सोनिया गांधी की जानिब उन्होने कुछ ऐेसा एक्सप्रेशन दिया था जैसे कह रहे हों कि ठीक है मैडम आज तो हरा दिया आइंदा मैं भी आपको हरा कर दम लूंगा। वही हुआ लोक सभा एलक्शन हुए और वाजपेयी की कयादत वाला एनडीए अक्सरियत में आ गया। इस वाक्ए का जिक्र हमने यहां इसलिए किया है कि सेहतमंद जम्हूरियत (स्वस्थ जनतन्त्र) का यही एक बड़ा किरदार रहा है कि 49 फीसद तक पहुचने वाली पार्टियां खुशी-खुशी सत्ता से हट जाया करती रही हैं। इसे ही ईमानदारी की सियासत और सियासत की ईमानदारी कहा जाता रहा है।

मुल्क में नए किस्म की सियासत चल रही है। तकरीबन तीन साल कब्ल आखिरी मई 2014 में नरेन्द्र दामोदर दास मोदी मुल्क के वजीर-ए-आजम बने उसी वक्त से मुल्क की जम्हूरियत मंे बेईमानी ने जम्हूरियत की उसूलपरस्ती की जगह ले ली। नरेन्द्र मोदी ने देश के बड़ी तादाद में लोगों खुसूसन कट्टरपंथी हिन्दुओं को धर्मराष्ट्रवाद हिन्दुत्व और गाय वगैरह की अफीम कुछ इस तरह चटाई कि इंसान से मोदी भक्त बने लोगों ने जैसे अपनी अक्ल और सोचने-समझने की सलाहियत ही खो दी है। मोदी भक्त यह भी सोचने समझने और सुनने के लिए तैयार नहीं हैं कि एलक्शन से पहले नरेन्द्र मोदी ने जितने वादे अवाम से किए थे उनमें एक भी पूरा नहीं कर पाए। उल्टे यह हुआ है कि महंगाई में कई गुना ज्यादा इजाफा हो गया। सरहद पार से पाकिस्तानी दहशतगर्दों की घुसपैठ में इजाफा हो गया। इन तीन सालों मे पाकिस्तान की हठधर्मी और लाइन आफ कंट्रोल पर सीजफायर की बार-बार खिलाफवर्जी में हमारे मुल्क के जवानों की ज्यादा जाने गईं। अब तक अमरीका के पांच दौरों समेत नरेन्द्र मोदी साठ से ज्यादा गैर मुल्की दौरे कर चुके हैं लेकिन गैर मुल्की सरमायाकारी (विदेशी निवेश) के नाम पर कहीं से छः हजार रूपए भी नहीं आए। इसके बावजूद हिन्दुओं के एक बड़े तबके पर चढा मोदी का नशा कम नहीं हुआ है।

नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी के सदर अमित शाह ने बार-बार कहा था कि वह मुल्क को कांगे्रस से पाक (कांगे्रस मुक्त) भारत बना देंगे। लेकिन उन दोनों ने मुल्क को ‘जम्हूरियत मुक्त’ भारत और अपोजीशन मुक्त भारत बनाने पर अमल शुरू कर दिया है। मोदी के नशे में चूर उनके भक्त इस खतरे को भांप नहीं पा रहे हैं या सब कुछ जानते हुए खामोश हैं कि अगर देश मे अपोजीशन न रहा तो जो लोग सत्ता में रहे होगे वह मुल्क को कैसा खतरनाक मुल्क बना देंगे। आज नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी लम्बे-चैड़े दावे करते  हुए कहती है कि तीन सालों में बेईमानी का एक भी वाक्या पेश नहीं आया। अव्वल तो उनका यह दावा गलत है, मुकम्मल तौर पर बेबुनियाद है। इतनी बेईमानियां और लूट तो गुजिश्ता तीस सालों में देश में नहीं हुई थी जितनी लूट मोदी सरकार के तीन सालों में हो चुकी हैं। इन तीन सालों में हुई लूट को सत्ता में बैठे लोगों ने बड़ी हठधर्मी से ढक रखा है। मुल्क का मीडिया या तो बिक चुका है या इतना ज्यादा खौफजदा हो चुका है कि सब कुछ जानने के बावजूद कोई अखबार एक भी खबर छापने और चैनल खबर दिखाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है। ताजा मामला अमितशाह की आमदनी में हुए बेशुमार इजाफे का है। तकरीबन साढे चार साल कब्ल अमित शाह ने जब गुजरात असम्बली का एलक्शन लड़ा था उस वक्त पर्चा नामजदगी दाखिल करते वक्त उन्होंने अपनी जो जायदाद और दौलत बताई थी अब तक उसमें तीन सौ फीसद का इजाफा हो चुका है। कोई कहता है कि तीन सौ नहीं तीन हजार फीसद का इजाफा हुआ है। लेकिन लालू यादव और उनके परिवार को फांसी पर लटकवाने के लिए उतावले टीवी चैनलों ने अमित शाह की जायदाद का जिक्र तक करने की हिम्मत नहीं की। यह कोई खुफिया या ढकी-छुपी बात भी नहीं है अमित शाह ने बाकायदा हलफनामे के साथ राज्य सभा के उम्मीदवार का पर्चा भरा है। साढे चार साल कब्ल भी उन्होने हलफनामे के साथ असम्बली एलक्शन के लिए पर्चा नामजदगी दाखिल किया था दोनों बार अपनी जायदाद और दौलत भी बताई है वह मुल्क की सबसे बड़ी सियासी पार्टी के सदर हैं उन्हें खुद ही दोनों बार बताई गई अपनी जायदाद की तफसील मीडिया के जरिए अवाम को बता देना चाहिए था तो यह अफवाहें भी न उड़ती कि उनकी जायदाद में तीन सौ फीसद या तीन हजार फीसद का इजाफा हो गया है। वह ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि उनपर सत्ता का गरूर चढा है।

नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने मिलकर मुल्क की जम्हूरियत के साथ जितनी बड़ी बेईमानी की है उसके सामने दस बीस लाख करोड़ रूपयों की बेईमानी की कोई अहमियत नहीं है। मणिपुर, गोवा और अब बिहार के अवाम के जरिए एलक्शन में बरी तरह ठुकराए जाने के बावजूद इन लोगों ने उन प्रदेशों के अवाम की मर्जी और उनके वोट के हक के खिलाफ उनकी सरकारों को लूटने का काम किया है। गोवा मे तो बीजेपी के चीफ मिनिस्टर और सभी छः वजीरों को अवाम ने ठुकरा दिया था। इसके बावजूद मरकजी सत्ता की ताकत का बेजा इस्तेमाल करके बीजेपी ने वहां की सरकार पर कब्जा कर लिया। इस वक्त एक वजीर-ए-आला मनोहर परिकर के अलावा बाकी सभी वजीर दूसरी पार्टियों के हैं। यही उन्होने मणिपुर में किया। अब बिहार में अपनी ताकत का नाजायज इस्तेमाल करके बिहार सरकार पर भी कब्जा कर लिया। महज बीस महीने पहले बिहार के अवाम ने असम्बली एलक्शन में बीजेपी को बुरी तरह हराया था 243 मेम्बरान की असम्बली में बीजेपी को एक चैथाई से भी कम 51 सीटें मिली थी। इसके बावजूद मोदी और अमित शाह बिहार में सत्ता के बगैर रह नहीं पाए और अपने बदतरीन मुखालिफीन मुसलमानों, यादवों और दलितों के वोटों सेे जीते जनता दल यूनाइटेड के 71 मेम्बरान की ताकत पर सरकार में शिरकत कर ही ली। क्या इसे ही ईमानदारी कहेंगे?

बेईमानी सिर्फ पैसों की नहीं होती है पैसों की बेईमानी से कहीं ज्यादा खतरनाक इण्टेलेक्चुअल बेईमानी होती है। मोदी सरकार के आने के बाद से उनके हामियों ने आज मुल्क को पस्ती या गिरावट की उस सतह तक पहुंचा दिया है कि इस तरह जम्हूरियत की लूट के जरिए सरकारों पर कब्जा करने की गैर एखलाकी (अनैतिक) हरकत को लोग सियासी बसीरत (राजनैतिक सूझबूझ) कहने लगे हैं। यानी दिन दहाड़े हो रही डकैती को बहादुरी बताया जा रहा है। इस किस्म की बातें करने वाले भी जम्हूरियत के कातिलों में ही शामिल किए जाएंगे। रही बात सत्ता पर कब्जे की तो मोदी और अमित शाह को यह नहीं भूलना चाहिए कि इस देश ने लोक सभा में 350, 380 और 414 सीटें आती भी देखी हैं उत्तर प्रदेश असम्बली की उस वक्त की 412 में से 380 सीटंे आती भी देखी हैं अगर मुल्क के जम्हूरी सिस्टम को 2019 तक खत्म करके मुल्क पर डिक्टेटरशिप न लाद दी गई और वोट की ताकत बाकी रही तो आज की जैसी हठधर्मी और बेईमानी भी बाकी नहीं रहेगी।