अकबर-ए-आजम

अकबर-ए-आजम

मुंशी प्रेमचंद की बरसी पर खास

दूसरी और आखिरी किस्त

‘जमाना’

अक्टूबर 1905

 

कि खानदान शाही से जो मुगायरत थी

वह यगानगत से बदल जाए और इसी गरज से 23 हिजरी जुलूस में उसने इबादत खाना फतेहपुर सीकरी मंे उन काबिले यादगार मजहबी मनाजिरों को कायम किया जिनमें हर कौम व हर मजहब के उलेमा हिस्सा लेते और निहायत आजादी से अपने-अपने मजहब के उसूल की तशरीह करते थे। उन मनाजिरों का यह नतीजा हुआ कि अकबर जो जेवरे इल्म से आरी था उस बुलंदी ख्याल पर पहुच गया जो खास फलासफरों का हिस्सा है और जहां से हर मजहब के इब्तिदाई उसूल यकसां हक्कानियत का रंग लिए होते आते हैं। इनका एक बड़ा फायदा यह भी हुआ कि जो लोग शरीक हुए थे उनमें वुसअते नजर की वजह से तास्सुब बिला वजह कम हो गया उस जमाने में मजहबे इस्लाम की भी सदियों की तकलीद और पेशवायाने मजहब की तबअ आजमाइयों की वजह से अजब कैफियत हो रही थी। सादगी जो इस्लाम के लिए मखसूस है नाम को बाकी न रही थी और मजहब अक्ल से खारिज एतकादात और बेजा तौहुमात और तकलीदी तखैयुलात का एक मजमूआ हो गया था और पेशवायाने मजहब की इससे भी बदतर हालत थी कि गोया कि रियाकारी का जामा हर वक्त जेबतन रहता था लेकिन जाह तलबी के पीछे एहकामे मजहबी को बाजीचए एतफाल समझते थे और जैसा मौका होता था वैसा ही फतवा देने के लिए मौजूद हो जाते थे। इसके मुताल्लिक मखदूमुल मुल्क और सदर जहां के कारनामे और दुनियासाजी काबिले मुलाहिजा है। उन्हें वजूद से अकबर का इब्तिदाई जोशे मजहबी जो उसे अजमेर शरीफ को पैदल ले जाता और या मुअय्यन के वजीफे में दिनरात मसरूफ रखता था ठंडा होता गया और इस नतीजे के निकालने पर मजबूर हुआ कि तकलीद के इस जाल से जिसने लोगों के जेहनों को मुकीद कर रखा है निजात न मिले किसी पायदार इस्लाह की उम्मीद नहीं हो सकती। इसलिए उसने 24 हिजरी में उलेमा से इजतहाद की सनद हासिल की। और मजहबे इलाही की बुनियाद डाली जो तमाम रायज मजहबों के लोगों के लिए यकसां खुला हुआ था। इसमें शक नहीं कि यह काम एक जाहिल तुर्क की कुदरत और मंसब से बालातर था और इसी वजह से उसमें बावजूद अबुल फजल व फैजी की जेहानत आराइयों के जैसी कामयाबी चाहिए थी न हुई बल्कि खेल तमाशा बन कर रह गया। लेकिन इसका इतना असर जरूर हुआ कि तास्सुब की बला जो अहले मुल्क को बाहमी इख्तिलाफात की वजह से सर न उठाने देती थी बिल्कुल खत्म हो गई और तंग दिली की जगह वुसअत ख्याल ने लोगों के दिलों में ली। गोया कि वह खुद इल्म से बेबहरा था लेकिन वह बखूबी जानता था कि तास्सुब की बुनियाद जेहालत है और उसके खत्म और अकवाम मातहत पर ठीक तौर पर हुकूमत करने की बेहतरीन तदबीर यह है कि खुलफाए बगदाद की तरह एक सर रिश्ता ए तर्जुमा कायम करके बीसियों संस्कृत किताबोे के तर्जुमे शाया कराए। दाढी मुडवाने, गाय के गोश्त और लहसुन-प्याज के खाने से बचने और गम के मौकों पर भदरा करने की गरज व गायत भी यही थी कि हाकिम व महकूम के ख्यालात मंे जो इख्तिलाफ हे वह बाकी न रहे। अकबर बखूबी जानता था कि वह मुसलमान तो है ही और इसलिए अगर एत्तेहाद व यकजहती कायम करने के लिए इसको जरूरत है तो हिन्दुओं की बातें अख्तियार करने की है। कौमों और मजाहिब के इख्तिलाफात दूर करने के बाद उसने इन इस्लाहों की तरफ ध्यान दिया जो जमाअते इंसानी की तरक्की के लिए जरूरी हैं। निजामे मआशरत का दारोमदार शादी व्याह पर है और उनके मुताल्लिक आए दिन लड़ाई झगड़े पैदा होते रहते हैं। जो खानदानों को तबाह कर देते या खुद शौहर या बीवी की जिंदगी खाक में मिला देते हैं या अगर इब्तदा मेें काफी एहतियात न की जाए तो उनका असर मौजूदा नस्ल से लेकर आइंदा नस्ल तक पहुचता है। अकबर ने निहायत दूरअंदेशी से करार दिया कि करीब के रिश्तेदारों में शादियां न हुआ करें और इसी तरह किसी की शादी सने बलूग को पहुचने से पहले या अगर औरत की उम्र मर्द से बारह साल से ज्यादा हो न हुआ करे और एक से ज्यादा औरत करना भी नापसंदीदा है और इन कामों की निगरानी की गरज से यह कायदा बना दिया कि तमाम शादियों का दाखिला दफातर सरकारी में रहा करे। हिन्दुस्तान की आला कौमों में बेवाओं के अक्द सानी का रिवाज न होने से निजामे मआशरत में जो खराबियां पड़ती हैं वह मोहताजे बयान नहीं हैं और गोया कि इस किस्म के मामलों में कानूनी मदाखलत मुनासिब नहीं होती लेकिन अकबर ने इसके मुताल्लिक भी दूरअंदेशी से एक निहायत मुफीद कायदा बना दिया और वह यह कि अगर कोई बेवा अक्द सानी करना चाहे तो उसका रोकना दाखिल जुर्म होगा। उनमें से अक्सर वह अहम इस्लाहें हैं जिन के लिए आजकल के सोशल रिफार्मर जोर दे रहे हैं मगर नक्कारखाने में तूती की आवाज कोई नहीं सुनता। सती की जालिमाना और कबीह रस्म की रोकथाम का फख्र भी अकबर ही को हासिल है। और वह अपने कवानीन का ऐसा दिलदादा था कि एक बार जब राजा जयमल मुहिम बंगाल के रास्ते में बमकाम चांसा पहुच कर फौत हुआ और उसके रिश्तेदारों ने उसकी रानी को सती होने पर मजबूर किया तो अकबर एक तवील सफर करके खुद जा पहुचा और उनको इस शर्मनाक काम से बाज रखा।

तालीम चूंकि गिजाए रूह है और कौमी तरक्की का इसपर दारोमदार है इसलिए अकबर ने इस तरफ भी पूरा ध्यान दिया और एक मुफीद निसाब मुकर्रर करके तरीका तालीम में भी ऐसी मुफीद इस्लाहें की कि बकौल अबुल फजल के जो बात बरसों में नसीब होती थी वह महीनों में हासिल होने लगी। लोगों की बदअखलाकी को मुहासिल आबकारी कायम करके कभी उसने अपने खजाने के भरने का जरिया नहीं बनाया।

यह भी ताकीद कर दी कि अगर कोई छुप कर औरत का इस्तेमाल करे तो उससे मजाहमत भी न की जाए। इस जमाने में मुहासिल आबकारी और औरत पर जिस किस्म के एजराजात हमारे पालिटिकल रिफार्मर किया करते हैं वह मोहताजे तशरीह नहीं हैं और न इस बात के बयान करने की जरूरत है कि वह किस हद तक अकबर के इंतजाम पर आयद हो सकते है। गल्ला और मवेशी और काम द्दंद्दे की तरक्की के लिए उसने यह तदबीर अख्तियार की कि हर एक चीज की तरक्की का एक-एक अमीर को जिम्मेदार करार दिया और इस बात की निगरानी के लिए कि उन्होने अपने इस खास फर्ज पर किस हद तक ध्यान दिया है जश्न नौरोज के बाद खास महलाते शाही में एक बड़ा बाजार लगता था जिसमें खुद बादशाह और उमरा और महल की बेगमात खरीद-फरोख्त करती थीं और हर शख्स अपना कमाल दिखाने की कोशिश करता था। इस बाजार को मौजूदा नुमाइशों की इब्तदा समझना चाहिए। दूसरे तौर पर भी इसको तिजारत की तरक्की को बेहद ख्याल था। जिसका एक शाम्मा दलालों का तकर्रूर भी था। गरीबों की इमदाद के लिए पाए तख्त से बाहर दो आलीशान मकानपुरा और द्दर्मपुरा के नाम से तामीर कराए जिनमे से एक मुसलमानों के लिए मखसूस था और दूसरा हिन्दुओं के लिए। और उनमें हर वक्त हर शख्स को तैयार खाना मिलता था और जब इन मकानों मे योगी ज्यादा जमा होने लगे जिस से दूसरों की हक तलफी होती थी तो उनके लिए अलग मकान बनाम ‘योगीपुरा’ तामीर कराया गया। इंतजामे सल्तनत की खूबी का दारोमदार चंद बातों पर है। शख्सी आजादी, अम्न व अमान, महसूलों का मोतदिल होना और मुकर्ररा शरह से लिया जाना। और रास्तों का दुरूस्त हालत में रहना। अगर इस एतबार से अकबर के अहद पर नजर डाली जाए तो वह भी किसी से पीछे न नजर आएगा। शख्सी आजादी की तो यह कैफियत थी कि हर शख्स को अख्तियार था कि जो मजहब चाहे अख्तियार करे। और उसमें यहां तक एहतमाम था कि अगर कोई हिन्दू लड़का बचपन में मुसलमान हो जाए तो सने बलूग पर पहुचने के बाद उसको अपने आबाई मजहब पर लौटनेका पूरा अख्तियार होगा और इसी तरह अगर कोई हिन्दू औरत किसी मुसलमान के घर में पाई जाए तो वह अपने विरसा के पास पहुचा दी जाए। इस जमाने में पादरी लोग शख्सी आजादी के भेष में जो सुलूक मुख्तलिफ कौमों के यतीम बच्चो से करते या बाज सूरतों में जनाना मिशन के जरिए से जाहिल औरतों को उनके आबाई मजहब से अलग करके खानाबर्बादी का मूजिब होते हैं उसके बयान करने की कोई जरूरत नहीं है। कयामे अम्न व अमान के मुताल्लिक भी अकबर ने निहायत दानिशमंदाना एहकाम जारी किए थे जैसा कि अशखास जरायम पेशा व वारिद व सादिर की निगरानी हर मोहल्ले में एक शख्स के बनाम मीर मोेहल्ला जिम्मेदार इंतजाम करार दिए जाने और कोतवाल और चैकीदारों के फरायज और जिम्मेदारियों से मालूम होता है। और खल्कुल्लाह की दादरसी और उनके आपसी झगड़े के हल के लिए काजी व मीर अदल मुकर्रर थे जिन में से काजी का काम तहकीकात और मीर अदल का फैसला सादिर करना था और सबकी निगरानी के लिए एक आला ओहदेदार बनाम सदर जहां मुकर्रर था। फरायज की इस तकसीम से जाहिर होता है कि इंसाफरसानी का काम कैसी एहतेयात से होता होगा और लुत्फ यह है कि अदना से अदना शख्स बिला किसी खर्च के अदालत हाए शाही से फैजयाब हो सकता था क्योंकि उस जमाने के न कोई कानूनी स्टाम्प था और न गरोह व वकील। महसूलात के मुताल्लिक अकबर का जो ध्यान इब्तदा से था उसका जिक्र पहले आ चुका हैं। उसने निहायत इस्तकलाल और दानिशमंदी के साथ इन तमाम महसूलात को बिल्कुल खत्म कर दिया जो कौमी तरक्की में हारिज या लोगों की दिलआजारी का मूजिब थे और जो महसूल बाकी रखे उनके मुताल्लिक भी साफ व सरीह कायदे बना दिए। इंतजाम माल गुजारी के मुताल्लिक बहुत जरूरी उसूल यह हैं कि आराजी जेरे काश्त का रकबा मुअय्यन हो। लगान चंद साल की औसत पैदावार के लिहाज से बलिहाज अकसाम आराजी ऐसी मोतदिल शरह से मुअय्यन किया जाए जिसमें बुरी और भली दोनों किस्म की फसलों का लिहाज रहे और काश्तकारों को अलावा अपनी मकबूजा जमीन के आराजी इफतादा के लेने की भी तरगीब हो। यह उसूल तो नफा सरकार के लिहाज से जरूरी हैं लेकिन काश्तकारों केा फायदा इसमें है कि जमीन के मुताल्लिक उनको हक मकाबजत हासिल हो कि तरक्की आराजी व काश्त की तरगीब हो। और लगान की शरह मुअय्यन और मालूम हो कि अवाम को ज्यादा सताने का मौका न मिले और इस कदर नर्म हो कि उसको हर साल कुछ पस अंदाजा होता रहे ताकि बसूरत खराबी फसल बसर अवकात आसानी हो सके। यही उसूल थे जिन पर टोडरमल और मुजफ्फर खां का बंदोबस्त माल गुजारी मबनी था और वही इस वक्त तक कवानीन माल गुजारी की बुनियाद हैं। जिले का हाकिम माल आमिल गुजार कहलाता था जिस को वसूल जर माल गुजारी के मुताल्लिक बलिहाज हालात फसूल वसीअ अख्तियार होते थे और सूबा का गवर्नर सिपहसालार होता था। इल्म आदाद जिसको इस जमाने में इस कदर तरक्की हुई है कि गवर्नमंेट आफ इंडिया ने एक मुस्तकिल सररिश्ता मुकर्रर किया और तमाम दफतर सरकारी का बड़ा वक्त तरतीब नक्शा में गुजरता है और जो नतीजे कि उनसे अलग होते हैं उनसे निगरानी व इंतजाम में बडी मदद मिलती है। इसकी बुनियाद भी हिन्दुस्तान मेे अकबर ही ने डाली थी और जो कैफियतें कि अफसरान मुफस्सिलात रोजाना और हफतावार और माहाना पेश करते थे उनसे हुक्काम सदर को निगरानी का उम्दा मौका मिलता था। अब अगर आसानी राह के एतबार से देखा जाए तो मालूम होता है कि मुहासिल राहदारी तो बिल्कुल मौकूफ कर दिए गए थे और हुस्ने इंतजाम की वजह से हर शख्स बेखौफ एक मकाम से दूसरे मकाम पर जा सकता था। इसके अलावा इब्तदाई दौर में आगरा से अजमेरशरीफ तक एक पुख्ता सडक जिसपर कोस-कोस भर के फासले पर छोटे-छोटे मीनारे और कुएं और हर मंजिल पर सराएं जहां खाना तैयार मिलता था। अकबर की खुश एतकादी ने बनवा दी थी। मगर 48 हिजरी में रिफाह खल्कुल्लाह के ख्याल ने इस हुक्म को आम कर दिया। लेकिन मालूम  होता है कि अकबर को इसकी तकमील का मौका नहीं मिला। 41 हिजरी में एक कहत पडा और अकबर नामा के देखने से मालूम होता है कि अकबर ने गरीबों मोहताजों की इमदाद का खास इंतजाम किया और इस काम के लिए खास खास ओहदेदार भी मुकर्रर किए। इससे जाहिर होता है कि इस मुबारक तरीके का बानी भी जिसने ब्रिटिश गवर्नमेट के रौशन जमाने में कई फीमन कमीशनों की बदौलत बहुत कुछ तरक्की की है अकबर ही था। हमने सिर्फ उन बड़े-बड़े सीगों का मुख्तसर सा हाल लिखा है जिनका असर खल्कुल्लाह पर पड़ता है। इसके अलावा बाकी जितने सीगे थेे उनके आईन भी निहायत बारीक नजरी से तैयार किए गए थे। गरज कि सल्तनत का कोई सीगा ऐसा न था जिसको अकबर की दानिशमंदी से फायदा न पहुचा हो। अब अगर सरकारी इंतजामात से गुजर कर अकबर की प्राइवेट लाइफ को देखा जाए तो मालूम होता है कि वह अजब मोहब्बत के काबिल आदमी था। उसकी खुश मिजाजी की यह कैफियत थी कि कैसा ही खुश्क आदमी उसकी मजलिस में शरीक हो मुमकिन नहीं कि बाग-बाग न हो जाए। मुरव्वत व रहम का तो वह पुतला था। जिस शख्स की भी उसतक पहुच हो जाती उम्र भर के लिए फारिगुल बाल हो जाता था और जिस दुश्मन ने सरे इताअत उसके सामने झुकाया उसका दर गुजर व करम का दरिया जोश में आया और उसको अपने उमरा खास में दाखिल किया। खाना सिर्फ एक वक्त खाता था और ख्वाहिशाते नफ्सानी का भी पाबंद न था। गोया पढा-लिखा न था मगर अपना अक्सर वक्त इल्मी मजलिसों और हर किस्म की किताबों के सुनने में लगाता था और उलेमा की चाहे वह किसी कौम और मजहब के हों बडी कद्र करता था। उसमें मर्दुम शनासी का माद्दा आला दर्जे का था। और इंतखाब की यह खूबी थी कि जो शख्स जिस काम का अहल होता था वही उसके सुपुर्द किया जाता था और इसी वजह से उसके मंसूबे बहुत कम नाकामी की शक्ल देखते थे और उसकी बदौलत वह बेशकीमती जवाहिर उसके दरबार की जेब व जीनत का बाइस थे जो विक्रामजीत के नौरत्न को मात करते थे। शिकार का बेहद शौक था और हाथियों का तो आशिक ही था और फने मौसीकी के रमूज से नावाकिफ न था। तामीराते आम्मा की तरफ भी बहुत तवज्जो थी और बहुत से आलीशान किले और इमारतें आज तक उसके हुस्न और शाहाना उलुल अज्मी पर शहादत देने के लिए मौजूद हैं। कुदरत ने जैसा हुस्ने सीरत से आरास्ता किया था वैसा हुस्ने जाहिरी भी अता फरमाया था। जहांगीर ने बेटे की मोहब्बत और नक्काश के कलम से उसकी तस्वीर तुजके जहांगीरी में खींची है। जिसका तर्जुमा नाजरीन की दिलचस्पी के लिए दर्ज किया जाता है- बुलंद बाला, कदम्याना, गंदुमी रंग, आंखों की पुतलियां और भवें स्याह, रंगत गोरी थी मगर उसमें फीकापन न था, नमकीनी ज्यादा थी। शेरअंदाम, सीना कुशादा, छाती उभरा हुआ, दस्त व बाजू लम्बे, बाएं नथुने पर एक मस्सा चने के बराबर जिसको माहिरीने फन कयाफा शनासी बहुत मुबारक समझते थे। आवाज बुलंद और गुफ्तगू में एक खास लोच और कुदरती नमकीनी थी और सजद्दज सा आम लोगों को उन से कुछ मुनासिबत न थी। शिकवा खुदादाद उनके चेहरे से जाहिर थी।

आखिर में नालायक औलाद ने उस मुहिब्बे वतन बादशाह को बहुत से दाग दिए और वह उसी रंज व गम मंे 20 जमादी उल आखिर 1014 हिजरी मुताबिक सितम्बर 1605 ईसवी को इस दुनिया को हमेशा के लिए छोड़ चला औेर सिकंदरा के आलीशान मकबरे में अपने पुरअजमत कारनामे हमेशा के लिए यादगार छोड़ कर दफन हुआ। अगरचे अकबर में चन्द्रगुप्त की शुजाअत और उलुल अज्मी अशोक की नेक नफ्सी और इंजबाते कवानीन और विक्राजीत की शान व शौकत और कद्रदानी इल्म व हुनर जमा थे लेकिन उसने जिस काम की बुनियाद डाली थी वह एक शख्स के बस का न था और चूंकि उसके जानशीनों में कोई इसका हमख्याल पैदा न हुआ इसलिए वह पूरी तरह बारावर न हो सका। लेकिन फिर भी अकबर की पुरसोज कोशिशें बेकार न गई और यह उन्हीं की बरकत थी कि हिन्दू मुसलमान बावजूद हुक्काम वक्त की बेपरवाई के निहायत सुलूक और इत्तफाक से कई सदियों तक रहे और अब जमाने में भी जबकि अजाजाए इख्तिलाफ हर तरफ से जमा होकर एक पुरसोज सैलाब की शक्ल मेे नमूदार हो रहे हैं  और कौमी एत्तेहाद की कश्ती को डुबोने के लिए भाएं-भाएं करते बढ रहे हैं। अगर कोई उम्मीद है तो उसी के मुबारक नाम से है जो हमारे बेडे़ को पार लगाने में इस्मे आजम की तासीर दिखाएगा। पस ऐ हिन्दू मुसलमानो! ख्वाबे गफलत से बेदार हो। उठो और सिकंदरा की राह लो। ताकि उसके मुकद्दस मजार पर अगर हम दो फूल चढाएं तो ऐ हिन्दू भाइयो! तुम भी थोड़ा पानी डाल कर उसकी रूह को खुश करो। क्या अजब है कि उसके फैजान से हमारे बेबुनियाद इख्तिालाफात दूर होकर फिर यकजहती की सूरत पैदा हो जाए। अफसोस और शर्म का मकाम है कि ब्रिटिश गवर्नमेट बावजूद अजनबी होने के अपने आपको इसका कायम मकाम और उसकी तकलीद को बाइसे फख्र समझे लेकिन तुम अपने मुहिब्बे वतन कौमी बादशाह की कीमती मीरास की तरफ आंख उठाकर भी न देखो।