सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के बेमियादी भूक हड़ताल – यकसां तालीम के लिए जस्टिस सुधीर अग्र्रवाल का फैसला लागू हो

सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के बेमियादी भूक हड़ताल – यकसां तालीम के लिए जस्टिस सुधीर अग्र्रवाल का फैसला लागू हो

लखनऊ! ‘सरकार ने सबको तालीम का हक कानून तो बना दिया है लेकिन न तो सबको तालीम दिलाने का हुकूमते बंदोबस्त कर पाई हैं और न ही सभी को यकसां तालीम मिले इसको यकीनी बनाया जा सका हैं चूंकि सरकारी स्कूलों और प्राइवेट या निजी स्कूलों के तालीमी मेयार मे जमीन आसमान का फर्क है। पैसे वाले लोग अपने बच्चों के मुस्तकबिल को रौशन बनाने के लिए सरकारी स्कूलों में दाखिला कराने के बजाए प्राइवेट स्कूलों को तरजीह देते हैं इसीलिए सरकारी स्कूलों की हालत रोज बरोज बदतर होती जा रही है।’ एक रिट पटीशन पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने  गुजिश्ता 18 अगस्त 2015 को यह फैसला दिया था कि ‘सभी सरकारी तनख्वाह पाने वालों के बच्चे लाजमी तौर पर सरकारी स्कूलों में पढे, का नज्म किया जाए। इसके बगैर सरकारी स्कूलों की हालत बेहतर नहीं होगी और गरीब के बच्चों को तालीम नहीं मिल पाएगी।’ इस फैसले को आए तकरीबन दो साल होने को हैं लेकिन अखिलेश सरकार ने इस फैसले पर कोई कार्रवाई नहीं की। मौजूदा योगी आदित्यनाथ सरकार भी इस फैसले के ताल्लुक से कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही है। योगी सरकार में प्राइमरी एजूकेशन की वजीर अनुपमा जायसवाल ने तो साफ-साफ कह दिया है कि अभी सरकारी स्कूलों की हालत इतनी अच्छी नहीं है कि इसमे अफसरों के बच्चे पढ सकें। उन्होने यह जवाब पिछले दिनो उस वक्त दिया था जब इटावा में एक सहाफी ने यह पूछा था कि जस्टिस सुधीर अग्रवाल के फैसले को लागू करने के लिए वह क्या करेंगी तो उन्होने यह भी कहा कि ‘पहले सरकारी स्कूलों के मेयार को बेहतर बनाया जाएगा तब उसमें अफसरों के बच्चे दाखिला लेंगे।’ बेसिक एजूकेशन की वजीर से यह पूछा जाना चाहिए कि सरकार आम शहरियों के बच्चों को घटिया और गैरमेयारी तालीम क्यों दे रही हैं। इसमें एक बच्चे का क्या कुसूर है अगर वह एक आईएएस अफसर के यहां न पैदा होकर किसी गांव के गरीब मजदूर के घर में पैदा हो गया? अगर वजीर के मुताबिक सरकारी स्कूलों का मेयार बेहतर नहीं है तो गरीबों के बच्चों के साथ खिलवाड़ क्यों किया जा रहा है?

सरकारी स्कूलों के मामले में तो सरकार का रवैया इंतेहाई बेहिसी का है तो दूसरी तरफ पूरे मुल्क में एक टैक्स सिस्टम को लागू करने के लिए सरकार पूरा जोर लगाए हुए हैं यहां तक कि उसने इसे अपने वकार का मसला बना लिया। यकसां सिविल कोड लागू करना तो भारतीय जनता पार्टी की अव्वलीन तरजीह रही है। लेकिन यकसां तालीमी निजाम की बात सरकार क्यो नहीं करती? नरेन्द्र मोदी ने बड़े जोर शोर से ‘कौशल विकास’ प्रोग्राम चला रखा है जिसका फायदा उठाने के लिए कम से कम तालीमी लियाकत हाई स्कूल पास होना चाहिए। मुल्क मे करीब आधे बच्चे दर्जा दस तक पहुच नहीं पाते। क्या मोदी के विकास के तसव्वुर में ऐेेसे नौजवान लडके लड़कियां शामिल नहीं हैं? क्या नरेन्द्र मोदी इस मुल्क की आधी आबादी को दरकिनार करके मुल्क को आलमी ताकत बनाना चाहते हैं? मजबूत नीव के बगैर कोई इमारत खड़ी की जा सकती है? यह कैसे हो सकता है कि जब तक मुल्क के बाशिदे तालीमयाफ्ता और सेहतमंद नहीं होंगे वह मईशत में ठोस तआवुन दे सकते हैं? हिन्दुस्तान के बड़े मसायल में बच्चों मे तगजिया की कमी, ख्वातीन की सेहत, किसानों की खुदकुशी शामिल है। इस सभी का हल तालीम के रास्ते से होना है। जस्टिस सुधीर अग्रवाल के फैसले को लागू करने में सरकार की अदम दिलचस्पी यही जाहिर करती है कि वह गरीबों और अमीरोें के बीच बढती खाई को बढाने में ही अपनी पालीसियों के जरिए तआवुन कर रही है।

वाजेह हो कि तालीम के हक कानून 2009 के तहत जो स्कूल सरकार के कानून कायदे मानने को तैयार नहीं जैसे कि गरीब तबके के पच्चीस फीसद बच्चों के दाखिले देना, उनके खिलाफ अभी तक कोई भी कार्रवाई सरकार की तरफ से नहीं की गई है। लखनऊ में सिटी मांटेसरी स्कूल, नवयुग रेडियन्स, सिटी इंटरनेशनल, सेंट मेरी इंटरकालेज, वीरेन्द्र स्वरूप पब्लिक स्कूल डीएम और कौमी कानून को मानने  को तैयार नहीं। इसी तरह कानपुर में वीरेन्द्र स्वरूप, चिंटल पब्लिक स्कूल और स्टेपिंग स्टोन पब्लिक स्कूल कानून की खिलाफ वर्जी कर रहे है। यकसां निजामे तालीम को नाफिज करने का मतालबा पर धरना देने वालों की सीधी मांग यही है कि उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए और इन स्कूलों में पढने वाले बच्चों के वाल्दैन और सरपरस्तों से अपील की गई है कि वह फीस देना बंद कर दे। क्या ऐसा होगा? 27 जून से बेमियादी भूक हड़ताल से सरकार के कान पर जंू रेंगेगा यह फिर उनका भी वैसा ही हश्र होगा जैसा जंतर-मंतर पर दो महीने तक धरना देने वाले किसानों का हुआ?