कुमार विश्वास ने किया जहरीली जेहनियत का मजाहिरा

कुमार विश्वास ने किया जहरीली जेहनियत का मजाहिरा

”मुसलमानों की लिंचिंग पर प्रियंका का बयान, कुमार विश्वास को नागवार क्यों गुजरा? वह खुद भी बताएं कि वह किधर खड़े हैं। लिंचिंग करने वालों के साथ या उनके खिलाफ? अगर साथ नहीं है तो खामोश क्यों रहे। 1984 में सिख मुखालिफ दंगों पर प्रियंका का खून क्यों नहीं खौला था यह पूछने वाले कुमार विश्वास बताएं कि 1984 मंे वह किसके साथ थे?“

 

 

नई दिल्ली! मनमोहन सिंह की यूपीए हुकूमत के खिलाफ आरएसएस परिवार की जानिब से जो गरोह दिल्ली के रामलीला मैदान में प्लाण्ट किया गया था उसमें सरगर्म रहे मामूली कवि कुमार विश्वास भले ही दिल्ली सरकार में शामिल न हुए हों लेकिन उसका फायदा उठाकर उन्होने अपनी कविता के रेट जरूर बढा दिए। खबर है कि अब वह एक कवि सम्मेलन में जाने के लिए एक से दो लाख तक रूपए, हवाई टिकट और महंगे होटल का कमरा लेते हैं। उस गरोह में शामिल रहे मेम्बरान में शायद कुमार विश्वास ही अकेले ऐसे शख्स हैं जो आज भी आरएसएस की खिदमत और उसका एजंेडा लागू करने के काम में लगे हैं।

कुमार विश्वास आरएसएस का कितना काम करते हैं और वह जेहनी तौर पर कितने बडे़ मुस्लिम दुश्मन फिरकापरस्त हैं इसका अंदाजा एक बार फिर उस वक्त लगा जब तीन जुलाई के अखबारात में उनका एक जहरीला बयान शाया (प्रकाशित) हुआ। वैसे तो उनका यह बयान प्रियंका गांधी पर चोट करने के बहाने था लेकिन अस्ल निशाना मुसलमानों पर था। प्रियंका गांधी ने लिंचिंग (पीट-पीटकर मुसलमानों को कत्ल करने) के वाक्यात पर बयान देते हुए कहा था कि ऐसी खबरों से उनका खून खौल उठता है। इसपर आरएसएस का कोई लीडर तो बोला नहीं लेकिन आरएसएस के पुराने नमकख्वार कुमार विश्वास जरूर मैदान में आ गए और सवाल किया कि 1984 में (सिख मुखालिफ दंगों के वक्त) प्रियंका गांधी का खून क्यों नहीं खौला था। उन्होने दूसरा सवाल यह भी किया कि जब वजीर-ए-आजम की हैसियत से मनमोहन सिंह ने यह कहा था कि देश के वसायल (संसाधनों) पर पहला हक अकलियतों का है तब प्रियंका का खून क्यों नहीं खौला था। कुमार विश्वास को यह भी तो बताना चाहिए कि मुसलमानों की लिंचिगं पर उनका खून खौलता है या नहीं और क्या उन्हें ऐसे वाक्यात पर खुशी हासिल होती है?

जदीद मरकज ने कुमार विश्वास को कई फोन किए उन्होने बात नहीं की और एसएमएस के जरिए पूछा कि क्या बात करनी है। जवाब दिया गया कि प्रियंका पर आए उनके बयान के सिलसिले में बात करनी है तो वह गायब हो गए। अखबार की जानिब से इस बड़बोले मुबय्यना (कथित)कवि से यह सवाल किया जाना था कि 1984 में प्रियंका की उम्र क्या थीं? जो वह प्रियंका से खून न खौलने का सवाल कर रहे हैं। दूसरे 1984 में प्रियंका की चहेती दादी को कत्ल किया गया था किसी कम उम्र की बच्ची कितने बड़े सदमे का शिकार हो गई होगी इसका अंदाजा कुमार विश्वास जैसे छोटी सोच के लोग क्यों नहीं लगाते? दूसरे यह कि कुमार विश्वास जैसे ढोेगी यह बात क्यों भूल जाते हैं कि 1984 में कांग्रेस लीडर इंदिरा गांधी का कत्ल नहीं हुआ था बल्कि हिन्दुस्तान की वजीर-ए-आजम को कत्ल किया गया था। आज के वजीर-ए-आजम के खिलाफ तो बयान देना ही ‘देशद्रोह’ हो जाता है उनसे यह भी पूछा जाना चाहिए कि सिखों को मारा किसने था? उस वक्त सिखों को कुमार जैसे हिन्दुओं ने मारा था, आज मुसलमानों को भी उसी जेहनियत के हिन्दुओं का एक गरोह मार रहा है। सिखों को मारने में पूरे मुल्क में एक भी मुसलमान के शामिल होने की शिकायत नहीं आई थी। अगर उस वक्त कोई नहीं बोला था तो क्या कुमार यह कहना चाह रहे  हैं कि हिन्दुओं के जिस गरोह ने सिखों को मारा था उस जेहनियत के गरोह के लोगों को मुसलमानों को कत्ल करने का लाइसंेस मिल गया है? उन्हें यह भी बताना चाहिए कि अगर 1984 में वह पैदा हो चुके थे तो खुद उन्होने क्या बोला था और मारे जाने वाले सिखों की कितनी मदद की थी?

कुमार विश्वास ने प्रियंका के बयान के बहाने मुसलमानों के खिलाफ अपनी जहरीली जेहनियत का मजाहिरा यह कह कर भी कर दिया कि मनमोहन सिंह ने वजीर-ए-आजम की हैसियत से जब यह कहा था कि मुल्क के वसायल पर पहला हक अकलियतों का है तो प्रियंका का खून क्यों नहीं खौला था? कुमार को यह भी बताना चाहिए कि मनमोहन सिंह का यह बयान किस कानून के तहत जुर्म के जुमरे (श्रेणी)में आता है और इस बयान से मुल्क की अकलियतों खुसूसन मुसलमानों को क्या मिल गया था?

दिल्ली के ओखला से आम आदमी पार्टी के मेम्बर असम्बली अमानउल्लाह खां ने पिछले दिनों जब यह बयान दिया था कि कुमार विश्वास आम आदमी पार्टी में रहकर आरएसएस और बीजेपी के एजेंट का काम कर रहे हैं तो उन्हें बहुत नागवार गुजरा था लेकिन अब तो प्रियंका और मुसलमानों पर बयान देकर कुमार विश्वास ने खुद ही साबित कर दिया कि हां वह आरएसएस के एजेंट हैं और शायद आगे भी रहेंगे। इस खबर में कुमार विश्वास को मुबय्यना (कथित) कवि लिखा गया है कि अगर वह कवि होते तो किसी भी  कमजोर पर जुल्म देखकर उनका दिल भी जरूर रोता कवि और शायर इंतेहाई हस्सास और नर्म दिल (संवेदनशील और कोमल हृदय) वाले होते हैं जालिम जेहनियत का शख्स कभी कवि या शायर नहीं हो सकता। लिंचिंग में मुसलमानों को कत्ल किए जाने केे वाक्यात पर पूरा मुल्क 28 जून को एहतेजाज में उठ खड़ा हुआ कुमार ने क्या किया? जो लोग लिंचिंग के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर करने मुल्क की सडकों पर निकले थे वह सब मुसलमान नहीं थे वह हिन्दू थे लेकिन वह हिन्दू नहीं थे जो खुद या उनके पुरखे 1984 में सिखों का कत्लेआम करते फिर रहे थे। कुमार किस गरोह में है अगर कातिल गरोह में नहीं है तो बताए कि लिंचिंग के वाक्यात पर उनके क्या ख्यालात हैं और वह किधर खड़े हैं।

‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ के ड्रामें से शुरूआत करके आम आदमी पार्टी तक पहुचने वाले गरोह की भले ही दिल्ली में सरकार बन गई हो पार्टी के बेश्तर (अधिकांश) लोग आज भी अंदरखाने आरएसएस की खिदमत और उसके एजेडे पर काम कर रहे हैं। 2012 से 2014 तक आरएसएस ने अन्ना हजारे, कुमार विश्वास, किरन बेदी और अरविन्द केजरीवाल वगैरह को मिलाकर मनमोहन सिंह हुकूमत को बदनाम करने के लिए जो ‘सियासी सुपारी किलर’ गरोह तैयार किया था उसमें शामिल किरन बेदी को पुद्दूचेरी (पांडीचेरी) की गवर्नरी का अवार्ड देकर राजभवन भेज दिया गया। अरविन्द केजरीवाल दिल्ली के चीफमिनिस्टर बने तो वह इन्हे सियासत में पाल पोसकर बड़ा करने वाले आरएसएस परिवार की आंखों का कांटा बन गए। अन्ना हजारे अंधे और बहरे होकर अपने गांव में ऐश कररहे हैं। मनमोहन सिंह सरकार में अन्ना को देश में हर तरफ बुराई ही नजर आती थी नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के बाद तीन सालों मंेे उन्हें मुल्क के काश्तकारों की खुदकुशी के वाक्यात, काश्तकारों और गौरक्षा के नाम पर मुसलमानों पर हो रहे मजालिम  न दिखाई दे रहे हैं और न सुनाई दे रहे हैं। आम लोगो का ख्याल है कि अन्ना अब आंख, कान और अक्ल तीनों से अंधे और बहरेे हो चुके हैं।

 

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