हजरत इब्राहीम (अलै0) का सच्चा ख्वाब

हजरत इब्राहीम (अलै0) का सच्चा ख्वाब

सैयद लुत्फउल्लाह कादरी फलाही

हजरत इब्राहीम (अलै0) इराक के शहर उर में पैदा हुए। यह शहर दरिया फुरात के मगरिबी किनारे पर कूफा के करीब वाके था। उसकी खुदाई के दौरान जो कतबात बरामद हुए हैं उनसे इस शहर के मुताल्लिक बहुत सी तफसीलात मंजरेआम पर आई हैं और हजरत इब्राहीम (अलै0) के खानदान की बाज तफसीलात और मुल्क के बाशिदांे के दीनी व इज्तिमाई हालात से भी पर्दा हटा है। उर एक तरिक्कयाफ्ता शहर था और उसे सनअती व तिजारती मरकज की हैसियत हासिल थी। उस शहर की आबादी तीन तबकों पर मुश्तमिल थी। अमीलो, मशकीनों और उर्दू। अमीलो तबके के लोग ऊंचे और बाअसर लोग थें उनमें इबादतगाहों के पुजारी, महंत, हुकूमत के ओहदेदारान और फौजी अफसर होते थे। मशकीनो मेें ताजिर, अहले सनअत, किसान और जराअत पेशा लोग होते थे और उर्दू तबके के लोग बंधुआ मजदूर और गुलाम होते थे। हजरत इब्राहीम (अलै0) का खानदान अमीलो से ताल्लुक रखता था।

हजरत इब्राहीम (अलै0) के बाप को नाम आजर था और वह इराक के बादशाह नमरूद के दरबार में आला ओहदे पर फायज थे और बुतपरस्त था। इराक में उस वक्त सारे लोग ही बुत परस्त थे। हजरत इब्राहीम (अलै0) का जमाना हजरत ईसा बिन मरियम (अलै0) से तकरीबन दो हजार एक सौ साल पहले का जमाना है यानी आज से चार हजार एक सौ नौ साल पहले का है।

हजरत इब्राहीम (अलै0) को अल्लाह तआला ने उनकी कौम में रसूल बनाकर भेजा। हजरत इब्राहीम (अलै0) ने अपनी कौम को शिर्क व बुतपरस्ती से रोका और तौहीद की दावत उनके सामने पेश की। मगर कौम ने आप की बात मानने से इंकार कर दिया। और जबरदस्त मुखालिफत शुरू कर दी। बात बादशाहे वक्त नमरूद तक पहुची। उससे आपका मुबाहिसा हुआ। वह मुबाहिसा में नाकाम व नामुराद हुआ। आखिर कार बादशाह ने आपको आग के अलाव में डाल देने का हुक्म दिया। हुक्म पर अमल हुआ। हजरत इब्राहीम (अलै0) आग के दहकते हुए अलाव में डाले गए। उधर शहंशाहे कायनात ने आग को हुक्म दिया कि मेरे बंदे इब्राहीम पर ठंडी हो जा और उनपर सलामती बन जा। आग ने इब्राहीम (अलै0) के जिस्म के एक बाल को भी नहीं जलाया। वह जिंदा व सलामत आग से बाहर आ गए।

जब रसूल को जान से मार डालने की साजिश हो या उसपर जान लेवा हमला हो या उसकी जान खतरे में पड़ जाए तो यह दावत का आखिरी मरहला होता है। और कौम की मोहलत खत्म हो जाती है। इराकी कौम ने इब्राहीम (अलै0) के अलाव में डाल कर अपनी मोहलत खत्म करा ली। इसलिए इस वाक्ए के बाद अल्लाह के हुक्म सेइब्राहीम (अलै0) ने इराक से हिजरत फरमा ली। हिजरत के वक्त तक वह बेऔलाद थे इसलिए उन्होने एक दुआ की कि ऐ मेरे रब मुझे सालेह औलाद अता फरमा दे।

हजरत इब्राहीम (अलै0) की दो बीवियां थीं। उनमेसे एक का नाम सारा और दूसरी का नाम हाजरा था। हजरत सारा पहली बीवी थीं और उनसे कोई औलाद नहीं हुई थी। तब हजरत इब्राहीम (अलै0) ने हजरत हाजरा से शादी की। मशहूर है कि हजरत हाजरा लौंडी थीं लेकिन अल्लामा मंसूरपुरी ने अपनी सीरत की किताब रहमतुल आलमीन में तहकीक करके यह साबित किया है कि वह लौंडी नहीं बल्कि आजाद खातून थीं और फिरऔन की बेटी थीं। हजरत इब्राहीम (अलै0) ने उनसे निकाहज किया और फिर उनसे सबसे पहले हजरत इसमाईल (अलै0) पैदा हुए। उस वक्त हजरत इब्राहीम (अलै0) की उम्र छियासी साल थी। हजरत इसहाक (अलै0) हजरत इसमाईल (अलै0) से चैदह साल छोटे थे। जिस वक्त वह हजरत सारा से पैदा हुए हजरत इब्राहीम (अलै0) की उम्र सौ साल थी। इस बात पर अहले किताब और अहले इस्लाम दोनों मुत्तफिक हैं।

हजरत इब्राहीम (अलै0) हिजरत फरमाकर फिलिस्तीन आ गए थे। आप की जाए कयाम या मरकजे दावत जिबरून थी। जिसे आज कल खलील के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि यह दुनिया का कदीम तरीन शहर है। हजरत इब्राहीम (अलै0) ने हजरत हाजरा और हजरत इसमाईल (अलै0) को सुनसान वादी यानी मक्का मे आबाद किया और हजरत इस्हाक जो हजरत इसमाईल के चैदह साल बाद पैदा हुए उन्हें और उनकी वालिदा हजरत सारा को कुनआन में बसाया। वह इन दोनांे इलाकों के बीच जिबरून में रहे और दोनों ही जगहों पर बराबर जाते थे।

यहां पर यह बात काबिले जिक्र है कि जब हजरत इब्राहीम (अलै0) हजरत हाजरा और इसमाईल (अलै0) को एक ऐसी वादी में छोड़ा जहां न पानी था न सब्जा न आदम न आदमजाद तो हजरत हाजरा ने उनसे सवाल किया कि आप हमें यहां क्यों छोड़ कर जा रहे हैं। हजरत इब्राहीम (अलै0) खामोश रहे। जब उन्होने पूछा कि क्या यह अल्लाह का हुक्म है तो जवाब दिया कि हां। तब उस अजीम मरतबत साबिरा औरत ने कहा कि अगर यह अल्लाह का हुक्म है तो अल्लाह हमें जाया नहीं फरमाएगा। हजरत इब्राहीम (अलै0) फिलिस्तीन से मक्का बराबर हजरत हाजरा और हजरत इसमाईल के पास तशरीफ लाते थे। हजरत इसमाईल शफीक और मोहब्बत करने वाले बाप और मां की निगरानी मंे परवरिश पाते रहे और उम्र के तेरहवें साल में दाखिल हुए तो हजरत इब्राहीम (अलै0) ने एक ख्वाब देखा।

हजरत इब्राहीम (अलै0) ने ख्वाब देखा कि वह अपने बेटे को जिबह कर रहे हैं और यह मालूम हुआ कि अम्बिया (अलै0) के ख्वाब वहि होते हैं और यह ख्वाब कभी तो सुबह की तरह रौशन होते हैं और कभी तमसीली रंग में होते हैं। जो ख्वाब तमसीली रंग में होते हैं वह मोहताज ताबीर व तावील होते हैं। हजरत इब्राहीम (अलै0) का ख्वाब भी मोहताज ताबीर व तावील था क्योंकि उसमें उन्हें अल्लाह ने यह हुक्म नहीं दिया था कि तुम अपने बेटे को जिबह कर दो। बल्कि उन्हें यह ख्वाब दिखाया गया था कि वह अपने बेटे को जिबह कर रहे हैं। हजरत इब्राहीम (अलै0) ने उस ख्वाब की ताबीर यह समझी कि उन्हें हजरत इसमाईल को अल्लाह की राह में जिबह कर देना है। जबकि अल्लाह ने उस ख्वाब के जरिए उनका इम्तेहान लिया था कि वह हुक्म को किस अंदाज मंें बजा लाते है। मकसूद बेेटे की कुर्बानी नहीं थी बल्कि हजरत इब्राहीम (अलै0) के तस्लीम व रजा का इम्तेहान था जिसमंे वह कामयाब हुए। कुरआन मजीद ने इस वाक्ए को सूरा साफात में तफसील के साथ बयान किया है।

‘और इब्राहीम ने कहा- मैं अपने रब की तरफ जाता हूं वही मेरी रहनुमाई करेगा ऐ परवरदिगार! मुझे एक बेटा अता कर जो सालेहीन में से हो। (इस दुआ के जवाब में) हमने उसका एक हलीम (बुर्दबार) लडके की बशारत दी। वह लडका जब उसके साथ दौड़ धूप करने की उम्र को पहुच गया तो (एक रोज) इब्राहीम ने उससे कहा बेटा मैं ख्वाब मंे देखता हूं कि मैं तुझे जिबह कर रहा हूं। अब तू बता तेरा क्या ख्याल है? उसने कहा अब्बा जान! जो कुछ आप को हुक्म दिया जा रहा है उसे कर डालिए आप इनशाअल्लाह मुझे साबिरों में से पाएंगे। आखिर को जब उन दोनों ने सरतस्लीम खम कर दिया औैर इब्राहीम ने बेटे को माथे के बल गिरा दिया और हमने निदा दी कि ऐ इब्राहीम! तुने ख्वाब सच कर दिखाया। हम नेकी करने वालों को ऐसी ही जजा देते हैं। यकीनन यह एक खुली आजमाइश थी हमने एक बडी कुर्बानी फिदिया में देकर उसे बच्चे को छुड़ा लिया और उसकी तरीफ व तौसीफ हमेशा के लिए बाद की नस्लों में छोड़ दी। सलाम है इब्राहीम पर।  हम नेकी करने वालों को ऐसी ही जजा देते हैं यकीनन वह हमारे मोमिन बंदों में से था और हमने उसे इस्हाक की बशारत दी एक नबी सालेहीन में से।’ (अल सफ्फात-99-112)

एक बाप के लिए अपने अजीज बेटे को जिबह करना कितना मुश्किल काम था। हजरत इब्राहीम (अलै0) को अपने बेटे इस्माईल से बे इंतेहा मोहब्बत थी। क्योंकि वह बुढापे में पैदा हुए थे। वह उनकी दुआ की कुबूलियत में हुए थे। तब ही तो उन्होने उनका नाम ही ‘कुबूलियते दुआ’ रख दिया था। इस्माईल का मायनी व मतलब ही यह है कि ‘अल्लाह ने दुआ सुन ली’। अब ऐसे बेटे की कुर्बानी मांगी जा रही है जो इकलौता है। दुआए सहर है, बुढापे का सहारा और चश्म व चिराग है और किसी दूसरे बेटे की पैदाइश की उम्मीद भी दूर-दूर तक नहीं है। कितना बडा और सख्त इम्तेहान था मगर हुक्मे इलाही के आगे बाप और बेटे दोनों झुक गए और लब्बैक-लब्बैक अल्लाहुम्म लब्बैक हाजिर हूं हाजिर हूं ऐ अल्लाह मैं हाजिर हंू कहते हुए अपने खालिक व मालिक के हुक्म को पूरा करने की तैयारी मंे लग गए।

शफीक और बेइंतेहा मोहब्बत करने वाला बाप अपने ख्वाब को अपने अजीज बेटे पर जाहिर करता है और कुर्बान जाइए उस इल्तजा पर कि जिस को कुर्बान होना है उसी से पूछा जाता है कि तुम्हें कुर्बान कर दूं और बेटा भी इतना वफा शिआर और फरमाबरदार कि अपनी जान हथेली पर रख करपेश करता है कि लीजिए इसे कुर्बान कर दीजिए। हुक्मे अलाही है तो फिर बेचूं चरा इसपर अमल कीजिए। इनशा अल्लाह आप मुझे साबिर और साबित कदम पाएंगंे।

बूढा बाप जिसकी उम्र तकरीबन निनान्वे साल है और महबूब बेटा जिसकी उम्र तेरह साल है आगे पीछे हुक्मे इलाही पर अमल पैरा होने के लिए मरवा की जानिब चल पडते है। बाप ख्वाब की ताबीर को अमली शक्ल देना चाहता है और बेटा हुक्मे इलाही पर कुर्बान हुआ चाहता है। बाप ने बेटे को पेशानी के बल लिटा दिया है। पूरी कायनात इस मंजरको देख कर थम गई होगी। हजरत इब्राहीम (अलै0) के हाथ  में तेज छुरी है बेटे की गर्दन के नीचे छुरी ले जाकर फेरना ही चाहते हैं कि शहंशाहे कायनात ने पुकारा। इब्राहीम बस ख्वाब की ताबीर मुकम्मल हुई। तुमने ख्वाब को सच कर दिखाया। हुक्मे खुदावंदी पूरा  हुआ। पूरी कायनात ने इत्मीनान का सांस लिया होगा। पूरी इंसानी तारीख ऐसा कोई वाक्या पेश करने से कासिर है। अल्लाह तआला ने इस वाक्ए को रहती दुनिया तक के लिए यादगार बना दिया और हजरत इस्माईल  के बदले जन्नत से लाया गया मेढा जिबह किया गया। रिवायात से मालूम होता है कि उस मेंढे के सींग बहुत अर्स तक खाना काबा में महफूज थे। इम्तेहान में कामयाबी के बाद अल्लाह तआला ने हजरत इब्राहीम (अलै0) को हजरत इस्हाक की बशारत सुनाई और उनकी नबुवत की भी खबर दी और इस्हाक के बेटे याकूब की भी खुशखबरी सुनाई। यानी इस्हाक होंगे और उनके यहां भी बेटा होगा। उसका नाम भी अल्लाह ने रख दिया कि वह याकूब हांेगे। एक साथ बेटे और पोते की बशारत।

कुर्बानी के वाक्ए को अल्लाह तआला ने एक अजीम इम्तेहान और आजमाइश करार दिया है। यह दरअस्ल अल्लाह की तरफ से हजरत इब्राहीम (अलै0) की तारीफ व तौसीफ की गई है कि वाकई यह एक मुश्किल इम्तेहान था। बेटे की कुर्बानी के लिए तैयार हो जाना और कुर्बानी के लिए उसे पेशानी के बल लिटा देना कोई मामूली काम नहीं था बल्कि यह एक सख्त आजमाइश थी सब्र की ईमान की और अल्लाह की जात पर मुकम्मल एतमाद और भरोसे की और इम्तेहान था खुद को अल्लाह के आगे झुका देने और पूरे तौर से अपने आप को हवाले कर देने का। और इस बात में कि अल्लाह की राह में अजीज से अजीज और महबूब से महबूब चीज को भी कुर्बान कर दिया जाए। हजरत इब्राहीम (अलै0) और हजरत इस्माईल (अलै0) ने इसमें कामयाबी हासिल की और वह मुस्तहक ठहरे कि अल्लाह की तरफ से ‘तुमने ख्वाब सच कर दिखाया’ के शानदार अल्फाज से उन्हें शाबाशी दी जाए।

अल्लाह तआला ने हजरत इब्राहीम (अलै0) व हजरत इस्माईल (अलै0) की कुर्बानी के इस वाक्ए को नस्ल दर नस्ल बाकी रखा। हजरत इस्माईल (अलै0) की औलाद यानी अरबों में इसी वाक्ए की यादगार के तौर पर मनासिके हज में कुर्बानी की जाती रही और आज तक यह मनासिके हज का एक हिस्सा है। और कयामत तक यह सुन्नत बाकी रहेगी। बडी कुर्बानी करार देने की वजह यही है कि कयामत तक के लिए शरीअत में यह सुन्नत कायम कर दी गई कि दस जिलहिज्जा को तमाम मुसलमान दुनिया भर में जानवर कुर्बान करके अपनी जांनिसारी और वफादारी का सबूत दें और इस अजीम वाक्ए की याद ताजा करते रहें।