जीएसटी ने उड़ाई व्यापारियों की नींदें

जीएसटी ने उड़ाई व्यापारियों की नींदें

नई दिल्ली! 30 जून और एक जुलाई की दरम्यानी रात में जीएसटी नाफिज करने का जश्न वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने पार्लियामेंट के खुसूसी एजलास मंे मनाकर खुद चाहे जितना फख्र महसूस किया हो  औेर इत्मीनान की सांस ली हो उनके इस फैसले से उनके अपने गुजरात समेत पूरे मुल्क के ताजिरों के नींदें हराम हो गई हैं। कपड़ा बनाने के मुल्क के सबसे बड़े मरकज सूरत के बाजार कई दिनों से बंद है। कपड़ा ताजिरों का कहना है कि जीएसटी की वजह से उनका सारा कारोबार ठप हो जाएगा और हिन्दुस्तानी बाजार पर चीन जैसे मुल्कों का कब्जा हो जाएगा। सूरत के ताजिरों का कहना है कि सिंथेटिक धातों पर अलग से जीएसटी लगाया गया और तैयार कपडे़ पर अलग से टैक्स की यह दोहरी मार कपड़ा सनअत बर्दाश्त नहीं कर पाएगी। सूरत के ताजिरों को उस वक्त जबरदस्त धक्का लगा था जब पुलिस ने उनपर जरायम पेशा लोगों की तरफ लाठी चार्ज किया गया। कई ताजिरों ने नाराज होते हुए कहा कि उन्हें पहली बार यह एहसास हो रहा है कि वोट और चंदे के जरिए नरेन्द्र मोदी को सियासी एतबार से मजबूत करके उन्होेने बड़ी गलती की। सूरत से बीजेपी के लोक सभा मेम्बर और मकामी मेम्बर असम्बली ने ताजिरों को यकीन दिलाया कि वह उनके मसले को हल करांएगे लेकिन मरकजी फाइनंेस मिनिस्टर अरूण जेटली ने साफ कह दिया है कि जीएसटी पर कोई बात तीन महीने के बाद ही की जाएगी।

जीएसटी लांच प्रोग्राम से खिताब करते हुए वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने गुड्स एंड सर्विस टैक्स की खूबियां और फायदे गिनाए इससे सवा सौ करोड़ आबादी में यही पैगाम गया कि इस टैक्स को नाफिज करने मंे काफी ताखीर हो गई और यह वक्त पर लागू हो गया होता तो आज मुल्क की मआशी हालत बिल्कुल मुख्तलिफ होती। जीएसटी के निफाज में ताखीर की जो वजहंेे थीं उनमंे सबसे अहम यही है कि सबसे ज्यादा मुखालिफत गुजरात से हुई थी उस वक्त नरेन्द्र मोदी ही गुजरात के वजीर-ए-आला थे। 30 जून-एक जुलाई की आधी रात में हुए जीएसटी लांच के प्रोग्राम मंे वजीर-ए-आजम ने कहा कि पार्लियामंेट का सेट्रल हाल इसबात का गवाह है कि यहां पर पहली बार आईनसाज कौंसिल की पहली मीटिंग हुई थी। उस वक्त पंडित जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, डाक्टर भीम राव अम्बेडकर, मौलाना अबुल कलाम आजाद पहली सफ मंे बैठे थे। फिर उसके बाद पार्लियामंेट के इसी सेट्रल हाल में 14 और 15 अगस्त को आधी रात में आजादी का जश्न मनाया गया था। पार्लियामेंट के इस इंतेहाई अहम खुसूसी एजलास को आजाद हिन्दुस्तान के पहले वजीर-ए-आजम पंडित जवाहर लाल नेहरू ने ‘ट्रस्ट विद डिस्टीनी’ के नाम से मशहूर तारीखी तकरीर की थी। सेट्रल हाल इसके अलावा दोबार और आधी रात के खुसूसी एजलास का गवाह बना था। 1972 में आजादी के 25 साल मुकम्मल होेने पर फिर 1997 में आजादी के पचास साल मुकम्मल होने पर। इन तीनों एजलास में मुल्क को आजादी दिलाने वाली कांगे्रस पार्टी ने पूरी सरगर्मी के साथ अपनी मौजूदगी दर्ज कराई थी। मगर पार्लियामेंट के सेट्रल हाल के आधी रात के चैथे प्रोग्राम में कांग्रेस ने शिरकत ही नहीे की क्योेकि उसका सीधा एतराज था कि जीएसटी के निफाज के लिए खुसूसी एजलास बुलाया गया है इसके लिए आधी अधूरी तैयारी की गई है इससे लोगों को आसानी कम और जहमत और दिक्कत ज्यादा होगी। इसमें कोई शुब्हा नहीं कि जीएसटी आजादी के बाद मुल्क में टैक्स ढाचे के एतबार से सबसे बडी तब्दीली है लेकिन इसे मुल्क की आजादी के बराबर का दर्जा दिए जाने की कोशिश को दुरूस्त नहीं कहा जा सकता। लेकिन सरकार के रवैए से ऐसा लगता है कि जीएसटी के निफाज के मौके को इसी तरह की तकरीब की शक्ल देने की कोशिश की जैसा कि 15 अगस्त 1947 को हुआ था, ठीक आधी रात को। उस वक्त मुल्क को खिताब करने वाले नेहरू थे जबकि 30 जून और एक जुलाई 2017 की आधी रात में पार्लियामंेट के खुसूसी एजलास को खिताब करने वाले नरेन्द्र मोदी थे। जीएसटी को सदर जम्हूरिया, नायब सदर जम्हूरिया, लोक सभा स्पीकर और तमाम वजीरों की मौजूदगी मंे लांच किया गया। बेशक जीएसटी का लांच मुल्क के लिए एक मौका हो सकता है और इसे किस तरह मुनअकिद किया जाए यह तय करने का हक सरकार को ही था। लेकिन जीएसटी को किसी भी जाविए से मुल्क की आजादी के हमपल्ला नहीं रखा जा सकता। कांग्रेस और अपोजीशन पार्टियों का एतराज बिल्कुल जायज था। जीएसटी के लांच के लिए आजादी की तकरीब की तरह जिस तरह नकल की गई वह आजादी का मजाक उडाने जैसा है। आजादी के लिए मुल्क के लाखों लोगों ने सालो साल तकलीफे बरदाश्त की बडी तादाद जेलों की सलाखों के पीछे पहुचाई गई लाठियां गोलियां खाईं फांसी पर चढे। मुल्क की आजादी की जद्दोजेहद और कुर्बानियों के खत्म न होने वाली दास्तान है। एक टैक्स निजाम का नाफिज किया जाना मुल्क के आजाद होने जैसा वाक्या क्योंकर हो सकता है। जीएसटी के बारे में ज्यादा से ज्यादा यही कहा जा सकता है कि टैक्स निजाम के लिहाज से यह मुल्क में अब तक का सबसे अहम मौका था। मगर इसे मआशी तारीख का भी सबसे बडा फैसला नहीं कहा जा सकात। जमींदारी एबूलेशन और बैंकों का नेशनलाइजेशन मुल्क की मआशी तारीख के बड़े फैसले थे और अगर नर्मकारी के लिहाज से गौर करें तो 1991 के मआशी इस्लाहात की शुरूआत भी निहायत अहम फैसला है लेकिन तब भी उस वक्त की सरकार ने 15 अगस्त की नकल उतारने की जरूरत नहीं समझी। मजहकाखेज बात यह है कि जिन्होनेे बरसों से जीएसटी की मुखालिफत में कोई कसर नहीं छोडी थी आज वही इसकी सबसे ज्यादा तारीफ व तहसीन में लगे हुए है। जीएसटी के ताल्लुक से मरकजी सरकार की तरफ से मुल्क के तमाम अखबारात में एक जुलाई को जो इश्तेहार शाया कराया गया है उसमंे यह कहा गया है कि एक मुल्क, एक टैक्स, एक बाजार से एक नए हिन्दुस्तान की तामीर होगी। इस टैक्स की बहुत सी खूबियों को गिनाते हुए यह भी कहा गया है कि इससे राष्ट्रवाद और यकजहती के जज्बे को मजबूती मिलेगी। एक टैक्स निजाम से राष्ट्रवाद और यकजहती को कैसे फरोग मिलेगा। यह समझ से परे है। इस नुक्ता ए नजर से दुरूस्त लगता है कि मौजूदा मरकजी सरकार जो भी काम कर रही है वह दावा यही कर रही है कि राष्ट्रवाद को मजबूती और बढावा दिया जा रहा है। बीजेपी सरकार भले ही जीएसटी के बेशुमार फायदे गिना रही हो आज भी बहुत बडी तादाद में लोग इसके तयीं खदशात और अंदेशों में मुब्तला है। खासकर मुल्क के करोड़ो छोटे और खुदरा कारोबारी। बीजेपी ने उन्ही के मफाद के तहफ्फुज का हवाला देकर यूपीए सरकार के वक्त किराना कारोबार मंे एफडीआई की तजवीज की सडक से लेकर पार्लियामेंट तक जबरदस्त मुखालिफत की थी। अंजामकार सरकार को अपने कदम पीछे खीचने पर मजबूर होना पडा था। लेकिन आज बीजेपी के एकतेदार में इसी तबके को अपनी आवाज अरबाबे एक्तेदार तक पहुचाने के लिए चीखना चिल्लाना पड रहा है और उनकी कोई सुनने वाला नहीं है।

जीएसटी के खिलाफ पूरे मुल्क मे हडताल और बंद का सिलसिला अभी जारी है कई जगहों पर तो बेकाबू भीड को तितर बितर करने के लिए भी लाठी चार्ज तक करना पड रहा है। सरकार यह मान कर चल रही  है कि लोगों का गुस्सा कुछ दिनों में कम होगा और हालात मामूल पर आ जाएंगे। अब देखने वाली बात है कि लोगांेे का गुस्सा थमने में कितने वक्त की दरकार है। फिलहाल कारोबारी अपने को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। कई कारोबार तो बंद होने और बडी तादाद में बेरोजगार हो जाने का खतरा पैदा हो गया है।