जकात

जकात

मौलाना बदीउज्जमां नदवी कासमी

इन हजरात कोे जकात देने से जकात अदा हो जाती हैः- 1. अपने हकीकी, इलाकी, अखयानी, रजाई भाइ बहन को जकात देना जायज है, इसी तरह उनकी औलाद को भी देना जायज है। नोट- हकीकी भाई बहन उनको कहते हैं जिनके मांबाप एक हों। इलाकी भाईबहन उनको कहते हैं कि दोनों का बाप एक हो और मां अलग अलग हो। अखयाफी भाईबहन उनको कहते हैं कि दोनों की मां एक हो और बाप अलग अलग हो। रजाई भाई बहन उनको कहते हैं जिन्होने एक औरत से दूघ पिया हो। 2. अपने चचा, फूफी, को जकात देना जायज है इसी तरह उनकी औलाद को भी देना जायज है। 3. अपने मामूं, खाला को जकात देना जायज है इसी तरह उनकी औलाद को भी देना जायज है। 4. अपने सौतेले मां-बाप को जकात देना जायज है। इसी तरह उनकी औलाद को देना जायज है। 5. अपने ससुर और सास को जकात देना जायज है इसी तरह उनकी औलाद को देना जायज है। 6. मालदार के वाल्दैन जो जकात के मुस्तहक होें उनको जकात देना जायज है। 7. मालदार की बालिग औलाद जो जकात की मुस्तहक हो उनको जकात देना जायज है। 8. मालदार की बीवी जो जकात की मुस्तहक हो उसे जकात देना जायज है। 9. मालदार बीवी के शौहर जो जकात के मुस्तहक हों उनको जकात देना जायज है। 10. अपने दामाद और बहू को जकात देना जायज है। 11. शागिर्द का उस्ताद को और उस्ताद का शागिर्द को जकात देना जायज है। 12. शौहर का अपनी बीवी की ऐसी औलाद हो जकात देना जायज है जो उस के पहले शौहर से हो। 13. बीवी का अपने शौहर की ऐसी औलाद को जकात देना जायज है जो उसकी पहली बीवी से हो। 14. मुसाफिर को जकात देना जायज है जबकि सफर में उसके पास माल न हो अगरचे उसके पास घर में निसाब के बकदर माल मौजूद हो। 15. नाबालिग मोहताज को जकात देना जायज है जबकि उसका बाप साहबे निसाब न हो अगरचे मां साहबे निसाब हो। 16. किसी शख्स की सौ रूपए की आमदनी है और अपना घर भी है लेकिन खर्च तीन सौ का है वह मसरफ जकात है। 17. जिस शख्स की आमदनी काफी है लेकिन वह मकरूज हो और कर्ज अदा न कर सके तो वह भी  मसरफ जकात है। 18. जकात हर उस शख्स को दी जा सकती है जिसके पास मिकदार निसाब से कम हो अगरचे वह शख्स तनदुरूस्त और कमाई करने के काबिल हो।