जीएसएलवी मार्क-3, डी-1 का कामयाब लांच – स्पेस मंे हिन्दुस्तान का बेमिसाल कारनामा

जीएसएलवी मार्क-3, डी-1 का कामयाब लांच – स्पेस मंे हिन्दुस्तान का बेमिसाल कारनामा

नई दिल्ली! हिन्दुस्तान स्पेस शोबे मंे नित नई बुलंदियों को चूमता हुआ बहुत तेजी से आगे बढता जा रहा है। 5 जून को हिन्दुस्तान ने अपने स्पेस मिशन मंे एक नए दौर का आगाज कर दिया जब उसने जीएसएलवी मार्क-3, डी-1 राकेट को लांच करने मंे कामयाबी हासिल की। अब तक के मुल्क के सबसे ताकतवर और सबसे भारी राकेट जीएसएलवी मार्क-3 को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर के दूसरे लांच पैड से स्पेस के लिए रवाना किया और सोलह मिनट के अंदर जी सेट-19 को आर्बिट में कायम करने मंे कामयाबी हासिल की।

वजन के एतबार से जीएसएलवी मार्क-3, डी-1 अबतक का सबसे भारी भरकम है जिसका वजन छः सौ चालीस टन है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें पूरी तरह से देसी क्रायोजेनिक इंजन लगा है। इसकी तकनीकी पूरी तरह से मुल्क में ही तैयार की गई है इसको लांच करने के लिए दूसरे मुल्क से किसी भी तरह की मदद नहीं ली गई है। बरसों की कोशिशें पांच जून 2017 को शाम पाच बजकर अट्ठाइस मिनट पर उस वक्त कामयाब हुई जब इसे स्पेस के लिए छोड़ा गया। स्पेस मंे यह कामयाबी हासिल करने के बाद हिन्दुस्तान अमरीका, रूस और चीन के बाद चैथा मुल्क बन गया जिसने खालिस देसी तकनीक से यह कारनामा अंजाम दिया।

जीएसएलवी मार्क-3, डी-1 के कामयाब लांच के बाद इसरो के चेयर मैन एस एस करण कुमार ने कहा कि हिन्दुस्तान के लिए कम्युनिकेशन सेटेलाइट के साथ किया जाने वाला यह एक बड़ा और निहायत अहम तजुर्बा है। जीएसएलवी मार्क-3 के कामयाब लांच पर सदर-ए-जम्हूरिया प्रणव मुखर्जी ने इसरो को मुबारकबाद देते हुए कहा कि मुल्क में पूरी तरह से तैयार किए गए राकेट पर फख्र करने का वक्त है। उन्होने कहा कि इस मिशन में शामिल सभी साइंसादानों, इंजीनियरों और टेक्नीशियनों को अपनी नेक ख्वाहिशात पेश करता हूं। उम्मीद है कि इसरो आने वाले वक्त में भी अपनी कामयाबियों का दौर यूं ही  जारी रखेगा। जबकि वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने राकेट की कामयाब लांचिंग पर इसरो के साइंसदानों को मुबारकबाद दी। उन्होने कहा कि इस कामयाबी के बाद हिन्दुस्तान अगली पीढी के सेटेलाइट बनाने की सिम्त में खडा हो गया है। कांगे्रस सदर सोनिया गांधी ने कहा कि इसरो अपनी बेहतरीन रिवायत को जारी रखे हुए है। साइंसदानों ने एक बार फिर मुल्क के वकार में चार चांद लगाए है। इसरो के साबिक चेयरमैन और मौजूदा मुशीर राधा कृष्णन ने कहा कि यह लांच मील का पत्थर है क्योकि हिन्दुस्तान को 2.3 टन से ज्यादा वजन के कम्युनिकेशन सेटेलाइट की लांचिंग के लिए अब तक गैर मुल्क जाना पडता था। अब जीएसएलवी मार्क-3 की कामयाबी से हमने खुद की सलाहियत हासिल कर ली है।

जीएसएलवी इसरो का सेटेलाइट लांच वेहीकिल है जिसका पूरा नाम ज्योसेक्रोनिस सेटेलाइट लांच वेहीकिल है। इस राकेट को इसरो ने तैयार किया है। इसके जरिए 2001 से अब तक ग्यारह बार सेटेलाइट स्पेस में भेजे जा चुके है। आखिरी उडान में पंाच मई 2017 को यह जी सेट-9  को लेकर रवाना हुआ था। इसरो का पीएसएलवी 1993 में पहले लांच मंे नाकाम हो गया था। तब से अबतक 39 लांच कामयाब रहे है। जीएसएलवी मार्क-वी भी 2001 में पहले लांच मे नाकाम हो गया था तब से लेकर अबतक ग्यारह लांच हुए हैं जिसमें से आधे कामयाब रहे है। तीन टन से ज्यादा वजन किसी हाथी के बराबर तीन हजार तीन सौ सोलह किलोग्राम, साफ्ट और बनावट के हिसाब से हिन्दुस्तान में बना यह सबसे बडा सेटेलाइट है। पहली बार नए तरीके  की मल्टीपल फ्रीक्वेसी बीम का तजुर्बा, हीट पाइप, फाइबर आप्टिक जाइरो, माइक्रो-मैकेनिकल सिस्टम एक्सलेरोमीटर से लैस है और पहली बार इसमें कोई रिस्पांडर नहीं है। जीएसएलवी मार्क-3, डी-1 का वजन छः सौ चालीस टन है। ऊंचाई करीब बयालीस मीटर, इसका वजन पंाच पूरी तरह से भरे बोइंग जम्बो हवाईजहाजो या दो सौ हाथियों के वजन के बराबर है। इसी लिए इसे ‘फैट ब्वाय’ सेटेलाइट कहा जा रहा है। इस सेटेलाइट के लांच से जो फायदे होंगे उनमें सबसे अहम तो यही है कि पहले भेजे गए सेटेलाइट का असरदार डाटा फी सेकण्ड एक गीगाबाइट है और यह अकेला ही पुराने किस्म के छः से सात कम्युनिकेशन सेटेलाइट के बराबर काम करेगा।

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