हिन्दुआंे को समझने की जरूरत

हिन्दुआंे को समझने की जरूरत

मुल्क में नरेन्द्र मोदी की सरकार आने के बाद से हिन्दू समाज के कुछ लोगों मंे एक अजीब सी जेहनियत पैदा हो गई वह यह कि जैसे उन्होने मुल्क के मुसलमानों को हरा कर मोदी को मुल्क की सबसे बड़ी कुर्सी पर बिठाया हो उसी वक्त आरएसएस के कुछ जिम्मेदार लोगांें ने बयान देते हुए कहा भी था कि एक हजार साल बाद देश मेें खालिस हिन्दू सरकार कायम हुई है। अब उत्तर प्रदेश में आदित्यनाथ योगी के वजीर-ए-आला बनने के बाद कट्टरपंथियों की यह जेहनियत और भी ज्यादा मजबूत होती नजर आई है। गौरक्षक दल हो, हिन्दू सेना हो, हिन्दू युवा वाहिनी हो या हिन्दू बहन-बेटी बचाव कमेटी तरह-तरह के नामों से हिन्दू समाज में कुछ अजीब किस्म के लोग पैदा हो गए हैं। इन लोगों को न तो संविधान की फिक्र है न कानून की न अदालतों की न समाजी यकजहती की और न इस बात की कि इन लोगों की हरकतों की वजह से दुनिया में मुल्क का सर किस हद तक झुकता है। इन लोगों को साबिक वजीर-ए-आजम और सीनियर स्वयं सेवक पंडित अटल बिहारी वाजपेयी की वह बातें भी याद नहीं रहती जो उन्होने 2002 में गुजरात में इंसानियत के कत्लेआम के दौरान अहमदाबाद में कही थी कत्लेआम के दौरान ही उनका विदेश दौरा शुरू हो रहा था। अहमदाबाद के रिलीफ कैम्पों का दौरा करने के बाद उन्होने कहा था कि गुजरात के वाक्यात ने हमारे माथे पर जो ‘कलंक’ लगाया है समझ में नहीं आ रहा है कि मैं कौन सा चेहरा लेकर दुनिया के सामने जाऊं। उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी ने यह बात किसी सियासी मकसद से नहीं कही थी। उन्होने दुनिया देख रखी थी उन्हें बखूबी इस बात का अंदाजा था कि मुल्क के किसी भी कोने में अगर गुजरात जैसे वाक्यात पेश आते हैं तो दुनिया की नजर में मुल्क की तस्वीर (छवि) पर कितना बुरा असर पड़ता है। उन्हें मुल्क की तस्वीर की फिक्र थी। आज की लीडरशिप में वाजपेयी जैसे जज्बात मुल्क के लिए नहीं हैं इसके सबूत गुजिश्ता तीन सालों में बार-बार मुल्क और दुनिया के सामने आए हैं।

आज जगह-जगह पर कुछ लोग हिन्दुत्व की ताकत का मजाहिरा करते दिखते हैं। वह भी किस पर? हर तरह से कमजोर और महज सोलह-अट्ठारह फीसद मुसलमानों पर अक्सर यह ताकत गौकुशी के बहाने दिखाई जाती है। हम नहीं कहते खुद वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी कह चुके हैं कि गौरक्षकों के नाम पर जो लोग सड़कों पर सरगर्म दिखते हैं उनमें अस्सी फीसद क्रिमिनल्स और जरायम पेशा अनासिर हैं। वह दिन में सड़कों पर गौरक्षा के बहाने हंगामे करते हैं तो रातों में उनके धंधे कुछ और होते हैं। वजीर-ए-आजम मोदी का यह बयान उनके अपने प्रदेश गुजरात के ऊना में दलितों की सरेआम पिटाई का वीडियो वायरल होने के बाद आया था। अब एक सौ तीस करोड़ के अजीम (महान) मुल्क के ताकतवर वजीर-ए-आजम को खुद ही बताना चाहिए कि क्या उनका यह बयान भी महज जुमलेबाजी थी। ऊना में गौरक्षकों के हाथों सरेआम दलितों की पिटाई का वीडियो वायरल होने के बाद वजीर-ए-आजम मोदी को जितना गुस्सा आया था और उनका दिल जिस हद तक तड़पा था अब राजस्थान में गौरक्षकों के बहाने नए किस्म के दहशतगर्दों (आतंकियों) का वह वीडियो देखकर उनका दिल क्यों नहीं तड़पा जिसमें दिख रहा है कि किस तरह गाय के नाम पर दहशतगर्दी करने वालों ने एक निहत्थे मवेशी व्यापारी और डेयरी फार्म चलाने वाले पहलू खान को सड़क पर पीट-पीट कर मार डाला और उनके दीगर चार साथियों को मार-मार कर अधमरा कर दिया। मुसलमानों पर इस किस्म के हमलों का यह कोई पहला वीडियो नहीं है। इससे पहले भी कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो चुके हैं। तो क्या यह मान लिया जाए कि वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी के ‘सबका साथ, सबका विकास’ नारे में मुसलमान शामिल नहीं हैं? अगर हैं तो इतने खतरनाक और दिल दहलाने वाले वीडियो सामने आने के बाद भी मुताल्लिका प्रदेश सरकारें ऐेसी कोई सख्त कार्रवाई मुजरिमों के खिलाफ क्यों नहीं करती जिससे सबक सीख कर दूसरे गुण्डे इस किस्म की दहशतगर्दाना कार्रवाई करने की हिम्मत न कर सके। रियासती सरकारों के इस ढुलमुल रवैय्ये पर वजीर-ए-आजम मोदी की खामोशी भी आम मुसलमानों के जेहनों में तरह-तरह के सवाल पैदा करती है।

चन्द रोज पहले तक पंजाब में बीजेपी और अकाली दल की मिलीजुली सरकार थी तब पंजाब में, राजस्थान में, हरियाणा में, मध्यप्रदेश में, गुजरात  में और झारखण्ड मे भारतीय जनता पार्टी सरकारें हैं। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी सरकार के दौरान ग्रेटर नोएडा के दादरी के पास के गंाव में अखलाक को गाय के गोश्त के बहाने पीट-पीट कर कत्ल करने का सिलसिला शुरू हुआ था, भारतीय जनता पार्टी की सरकारों वाले प्रदेशों में वह सिलसिला मुसलसल जारी है। वजीर-ए-आजम मोदी गौरक्षकों के बहाने कानून हाथ में लेने वालों को क्रिमिनल बता चुके हैं उसके बाद मुख्तलिफ टीवी चैनल्स के स्टिंग आप्रेशनों के जरिए बार-बार साबित हो चुका है कि गौरक्षा के नाम पर जो लोग गुण्डई करते फिरते हैं उन्हें गाय की न तो फिक्र है और न ही हमदर्दी यह तो उनका एक ऐसा मुजरिमाना धंधा है जिसमें लगता कुछ नहीं है और आमदनी बहुत ज्यादा हो जाती है। फिर ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त तरीन कार्रवाई क्यांे नहीं होती है क्या वजीर-ए-आजम मोदी अवामी तौर पर जो कुछ कहते हैं हकीकत का उससे कोई ताल्लुक नहीं होता है। अंदर खाने क्या वह भी ऐसे लोगों को पसंद करते हैं जो गुण्डे गाय के बहाने मुसलमानों को सड़कों पर ही मौत के घाट उतारने के लिए उतावले रहते हैं। गौरक्षा के नाम पर दहशतगर्दी करने वालों को गाय से कोई हमदर्दी नहीं है अगर होती तो यह लोग कभी इन लागों के घरों पर भी धरना देने या मजाहिरा करने जरूर जाते जो लोग शहरों में गाय पालते हैं शाम को दूध दुह कर गायों को कू़ड़ा करकट और पालीथिन खाकर जिंदगी गुजारने के लिए सड़कों पर लावारिस छोड़ देते हैं। इन दहशतगर्दों को कभी भी किसी गौशाला में जाकर गायों की खिदमत करते भी नहीं देखा गया है।

हमने अपने इस मजमून का उनवान (शीर्षक) दिया है ‘हिन्दुओं को भी समझने की जरूरत’। हमें अच्छी तरह मालूम है कि गौरक्षकों के नाम पर दहशतगर्दी करने वालों की तादाद हिन्दू आबादी की एक फीसद के बराबर भी नहीं है। इसी तरह उनकी हिंसक कार्रवाइयों पर खुश होने और फख्र महसूस करने वालों की तादाद भी बमुश्किल पन्द्रह से बीस फीसद ही होगी। अस्सी फीसद हिन्दू तबका इस किस्म की हरकतों को पसंद तो नहीं करता लेकिन इस किस्म की हरकतों के खिलाफ खुल कर खड़ा भी नहीं होता यह बहुत ही खतरनाके सूरतेहाल है हमें और उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश में कानून हाथ लेने वालों  को छूट मिलती रही तो वह दिन दूर नहीं जब उनके निशाने पर मुसलमान नहीं होंगे बल्कि वह हिन्दू होंगे जो खुलकर उनकी दहशतगर्दी की हिमायत नहीं करेंगे। वह मुट्ठी भर हिन्दू भी अच्छी तरह समझ लें जो इन दहशतगर्दोें की कार्रवाइयों पर खुश होते हैं और फख्र महसूस करते हैं। वह लोग अपने लिए ही जहर बोने का काम कर रहे हैं। तेइस मार्च को दिल्ली हवाई अड्डे पर खड़े एयर इंडिया के जहाज से छः अप्रैल तक पार्लियामेंट में जो कुछ हुआ वह हमारी बात की तस्दीक करने के लिए काफी है। महाराष्ट्र में शिवसेना पूरी तरह बेलगाम होकर कानून अपने हाथों में लेने का काम करती रहती है। अब शिवसेना के लोगों के हौसले इतने बढ चुके हैं कि पब्लिक और कमजोर मुसलमान तो दूर उसके अनन्तगीते जैसे मरकजी वजीर अपने ही साथी सिविल  एविएशन वजीर अशोक गजपति राजू को लोक सभा की कार्रवाई के दौरान ही पीटने के लिए झपटने की हिम्मत दिखा रहे हैं। मुल्क की पार्लियामंेट की तारीख का शायद यह सबसे बड़ा शर्मनाक वाक्या था कि कोई वजीर दूसरे वजीर पर झपट पड़े और होम मिनिस्टर राजनाथ सिंह, अनन्त कुमार और स्मृति ईरानी को बीच में आकर वजीर को बचाना पड़े। इतने शर्मनाक वाक्ए पर भी वजीर-ए-आजम मोदी खामोश ही रहे।

दहशतगर्दाना और कानून अपने हाथों में लेने वालों की शर्मनाक हरकतों पर खुश होने वाले हिन्दुुओं को इस बात पर संजीदगी से गौर करना चाहिए कि शिवसेना के लोक सभा मेम्बर रवीन्द्र गायकवाड ने एयर इंडिया के जिस मैनेजर की चप्पलों से पिटाई की वह कोई मुसलमान नहीं बल्कि सुकुमार नाम का एक सीधा-सादा हिन्दू ही था। इस मामले पर हंगामा मचा तो छः अप्रैल को शिवसेना कोटे से मोदी के वजीर अनन्त गीते जिस वजीर को पीटने की गरज से झपटे थे वह भी कोई मुसलमान नहीं अशोक गजपति राजू नाम के एक तमीजदार और शरीफ हिन्दू ही हैं। उन्हेें बचाने के लिए जिन मरकजी वजीरों को सामने आना पड़ा वह तीनों भी मुसलमान नहीं हैं। अनन्त गीते और रविन्द्र गायकवाड वगैरह भी आज के गौरक्षकों की तरह मुंबई और महाराष्ट्र में कानून हाथों में लेने का काम एक लम्बी मुद्दत से करते आए हैं। अगर इनकी हरकतों पर महाराष्ट्र और मुंबई के कुछ हिन्दुओं ने खुश होने और हिन्दू तबके की अक्सरियत ने खामोश होने का रवैय्या अख्तियार न किया होता तो शायद इनके हौसले इतने बुलंद भी न हो पाते कि लोक सभा की कार्रवाई के दौरान अपनी ही सरकार के साथी वजीर पर झपटने और एयर इंडिया के जहाज में मैनेजर को चप्पलों से पीटने की हिम्मत यह आज न कर पाते। जरा संजीदगी से गौर कीजिए कि हिन्दू, मुस्लिम और मजहब के नाम पर हम अपने मुल्क को कहां ले जा रहे हैं। यह बहुत ही खतरनाक रास्ता है जो आखिर में खानाजंगी (गृहयुद्ध) और तबाही की तरफ ही जाता है।