इंसेफ्लाइटिस पर काबू पाना – योगी सरकार के लिए बड़ा चैलेंज

इंसेफ्लाइटिस पर काबू पाना – योगी सरकार के लिए बड़ा चैलेंज

लखनऊ! पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपनी मजबूत पकड़ रखने वाले योगी आदित्यनाथ जब उत्तर प्रदेश के वजीर-ए-आला बने तो पूर्वांचल के लोगों को यह उम्मीद बंधी कि अब उनके इलाके के मसायल दूर हो जाएंगे। पूर्वी उत्तर प्रदेश के दो सबसे अहम मसले है। एक सैलाब का तो दूसरा इंसेफ्लाइटिस की बीमारी का। पूर्वांचल में हर साल सैकड़ों बच्चे इस खतरनाक बीमारी का शिकार होकर मौत के मुंह मंे पहुंच जाते हैं। अभी अप्रैल का महीना चल रहा है मगर अभी से इस बीमारी ने अपनी खूनी दस्तक दे दी है। जनवरी से अभी तक तकरीबन दो सौ मरीज इंसेफ्लाइटिस की बीमारी के सामने आए हैं। जिसमें पचास के करीब लोगों की मौत हो चुकी है। इस बीमारी की खौफनाकी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले 12 साल में तकरीबन साढे आठ हजार लोगों की मौत हो चुकी है। जिसमें अक्सरियत बच्चों की है। इस बीमारी पर काबू पाना योगी सरकार के लिए सबसे बड़ा चैलेंज होगा।

मच्छरों के जरिए इंसानों मेें फैलने वाली बीमारी इंसेफ्लाइटिस कितनी खतरनाक है इसका अंदाजा इसी से होता है कि इस बीमारी की जद में आने वाला मरीज अगर बच भी जाता है तो भी वह पूरी तरह ठीक नहीं होता है। वह दिमागी या जिस्मानी तौर पर माजूर हो जाता है। छोटे बच्चों पर यह बीमारी ज्यादा ताकत से हमला करती है जिसके नतीजे में बच्चों की मौत  हो जाती है जो बच्चे बीमारी से बचा भी लिए जाते हैं वह भी पूरी  जिंदगी के लिए माजूर हो जाते हैं। एक्यूट  इंसेफ्लाइटिस सिन्ड्रोम (एईएस) और जापानी इंसेफ्लाइटिस (जेई) की बीमारी में मरीज के दिमाग की झिल्ली में सूजन आ जाती है जिसकी वजह से उसके बुखार आ जाता है इसीलिए इसे दिमागी बुखार भी कहा जाता है। इंसेफ्लाइटिस का कहर हर साल पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों खुसूसन बच्चों पर टूटता है। लिहाजा इंसेफ्लाइटिस के कहर से पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों को बचाना योगी सरकार के लिए किसी बड़े चैलेज से कम नहीं होगा।

यह बीमारी कितनी खौफनाक शक्ल अख्तियार कर चुकी है इसका अंदाजा सिर्फ इस बात से होता है कि अब इस बीमारी का असर साल भर नजर आता है। पहले मई-जून से इस बीमारी की शुरूआत होती  थी अक्टूबर-नवम्बर से इस बीमारी का असर खत्म होने लगता था लेकिन अभी अप्रैल का महीना चल रहा है और तकरीबन 50 लोगों को इंसेफ्लाइटिस की बीमारी निगल चुकी है।

इंसेफ्लाइटिस की रोकथाम की कोशिशें कागज पर ज्यादा नजर आती हैं अमली तौर पर कम ही काम होता है।  यही वजह है कि करोड़ो रूपए खर्च करने के बावजूद इंसेफ्लाइटिस का असर कम होने के बजाए बढता ही नजर आता है। इस बीमारी की रोकथाम के लिए टीकाकारी सबसे अहम तरीका है। मगर मोहकमा सेहत में फैले करप्शन की वजह से कागजों पर नब्बे फीसद से ज्यादा टीकाकारी करना दिखाया गया जबकि असलियत यह है कि कहीं भी पचास से साठ फीसद तक से ज्यादा टीकाकारी नहीं हुई। दूसरी वजह अफसरों और मुलाजिमों के जरिए टीकों की कोल्ड चेन को दुरूस्त न कर पाना है। इस वजह से लगने के बावजूद भी टीके  बेअसर रहते हैं। इस वजह से टीकों के असर का फीसद तीस-चालीस फीसद ही रहता है। मोहकमा सेहत ने इंसेफ्लाइटिस  की बीमारी से बच्चों को बचाने के लिए टीकाकारी मुहिम चलाई थी मगर मुलाजमीन और अफसरान की लापरवाई की वजह से कभी भी निशाने को पूरा नहीं कर सका बल्कि साल दर साल वह अपने मकसद में पिछड़ता ही रहा।

इंसेफ्लाइटिस से बचाने के लिए टीके आम तौर पर फरवरी-मार्च में लगाए गए जाते थे मगर इस काम में इतनी कोताही बरती गई कि अब इंसेफ्लाइटिस का वायरस न सिर्फ मजबूत हो गया बल्कि अब वह साल भर एक्टिव रहता है यही वजह है कि अप्रैल के महीने में ही दौ सौ से करीब इंसेफ्लाइटिस के मरीज सामने आ चुके हैं। बल्कि तकरीबन 50 लोगों की मौत भी हो चुकी है। इंसेफ्लाइटिस के असर वाले 34 जिलों में 15 साल के बच्चोें के लिए 2006 से 2010 तक जो टीकाकारी की मुहिम चलाई गई वह अफसरान की लापरवाई की नज्र हो गई। देवरिया, कुशीनगर, लखीमपुर खीरी, गोरखपुर, महाराजगंज, सिद्धार्थनगर और  महाराजगंज में चलाई गई 2006 में 99.97 फीसद टीकाकारी का दावा कागजों पर किया गया। जबकि  जनवरी से अब तक चार महीनों में 36 मरीज देवरिया में, गोरखपुर में 25 मरीज और लखीमपुर में 7 मरीज सामने आए। इनमें देवरिया में 5, कुशीनगर में 7, महाराजगंज में 7 और गोरखपुर में 12 लोगों की मौत हो चुकी है।

बाकी जिलों में भी  इसी तरह जमीनी सतह के बजाए कागजों पर ही टीकाकारी की मुहिम चलाई गई। 2007 में अम्बेडकर नगर, बहराइच, बस्ती, बलरामपुर, बाराबंकी, मऊ, गोण्डा, सीतापुर, रायबरेली, श्रावस्ती, सहारनपुर में 96 फीसद टीकाकारी का तो 2008 में आजमगढ, बलिया, फैजाबाद, सुल्तानपुर, हरदोई, लखनऊ, बरेली, उन्नाव और मुजफ्फरनगर में मोहकमा सेहत के अफसरों ने कमाल कर दिया और 100.95 फीसद टीकाकारी का दावा किया जबकि 2009 मंे इलाहाबाद, फतेहपुर, कानपुर, जौनपुर, गाजीपुर, प्रतापगढ और शाहजहांपुर में 84.70 फीसद 2010 में गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर, बस्ती, महाराजगंज वगैरह में 99.02 फीसद का दावा किया गया। इसके बावजूद इन अजला से इंसेफ्लाइटिस के मरीजों का मिलना टीकाकारी मुहिम पर सवालिया निशान तो लगाता ही है।

मोहकमा सेहत और उसके मुलाजिमीन की लापरवाई का अंदाजा इन आकंड़ों से बखूबी हो जाता है। ऐसे में अगर वजीर-ए-आला योगी आदित्यनाथ को इंसेफ्लाइटिस पर काबू पाना है तो इसके लिए इन अफसरान को ठीक करना होगा वैसे लगता है कि वजीर-ए-आला आदित्यनाथ योगी को भी इसका अंदाजा रहा होगा तभी उन्होने हलफ लेते ही मोहकमा सेहत को सुधारने की बात कही थी। इंसेफ्लाइटिस का सबसे खतरनाक हमला 2005 में हुआ था जब 1600 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी। उसके बाद से भी हर साल तकरीबन 500 मौतों का औसत रहा है। मोहकमा सेहत  अपनी लापरवाई छुपाने के लिए आंकड़ों में हेरफेर करता रहता है। पिछले साल राजधानी लखनऊ में 500 के करीब लोग डेंगू की बीमारी का शिकार होकर मरे मगर मोहकमा सेहत के अफसरान की हठधर्मी का आलम यह था कि अदालत की कई बार डांट खाने के बावजूद अफसरान ने सौ मौते भी नहीं मानी थी। ऐसे अफसरान के होते हुए योगी आदित्यनाथ प्रदेश खुसूसन पूर्वांचल के लोगों को इंसेफ्लाइटिस के कहर से कैसे बचाएंगे यही अहम सवाल है।

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