चीफ जस्टिस ने आपसी बातचीत से अयोध्या मसला हल करने का दिया मश्विरा – राम मंदिर का रास्ता खुला

चीफ जस्टिस ने आपसी बातचीत से अयोध्या मसला हल करने का दिया मश्विरा – राम मंदिर का रास्ता खुला

”वजीर-ए-आजम मोदी और वजीर-ए-आला आदित्य नाथ योगी किसी भी कीमत पर 2019 के लोकसभा एलक्शन से पहले राम मंदिर तामीर का काम शुरू कराना चाहते हैं। अगर आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी सुप्रीम कोर्ट के मश्विरे के मुताबिक बातचीत के जरिए समझौते के लिए तैयार न हुए तो इन्हें अलग-थलग करके दर्जन भर मुस्लिम तंजीमे और खुदसाख्ता मुस्लिम मजहबी लीडरान समझौते के लिए तैयार बैठे हैं।“

 

”इससे पहले आपसी बातचीत की कोशिशें नाकाम होने के पीछे अस्ल वजहे यह थीं कि उस वक्त की सरकारें कमजोर हुआ करती थीं अब मरकज़ में मोदी और उत्तर प्रदेश में आदित्यनाथ योगी की मजबूत सरकारें हैं और दोनो मंदिर की तामीर चाहते हैं इसलिए अब अदालत के बाहर होने वाले समझौते की कामयाबी की उम्मीदें ज्यादा हैं योगी ने हर तरह के तआवुन का एलान कर ही दिया है।“

 

”अगर अदालत के बाहर कोई समझौता होता है तो मंदिर तो उसी जगह बनेगा जहां मूर्तियां रखी हैं। मस्जिद के लिए सरकार सरयू पार जगह दे सकती है। बातचीत कामयाब हुई तो मंदिर और फैजाबाद ग्रैण्ड ट्रक रोड के दरमियान भी मस्जिद बन सकती है खबरों के मुताबिक सरकार अयोध्या की तमाम मस्जिदों की मरम्मत और रंगाई पुताई की इजाजत भी दे सकती है। इन मस्जिदों की सालों से पुताई तक नहीं हुई है।“

 

हिसाम सिद्दीकी

नई दिल्ली। मुल्क के चीफ जस्टिस जे.एस. खेहर ने अयोध्या मसला आपसी बातचीत के जरिए हल करने के लिए दोनो फरीकैन को मश्विरा दिया है साथ ही यह भी पेशकश की है कि अगर जरूरत पड़ी तो वह खुद इस बातचीत में सालिसी (मध्यस्थता) करने के लिए तैयार हैं। सीनियर आर.एस.एस. स्वयं सेवक और बीजेपी के राज्यसभा मेम्बर सुब्रामणियम स्वामी की एक दरख्वास्त पर समाअत (सुनवाई) के दौरान जस्टिस खेहर ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद और राम मंदिर के तनाजे (विवाद) को आस्था से जुड़ा एक इंतेहाई हस्सास (संवेदनशील) मामला करार देते हुए कहा कि इसको आपसी बातचीत के जरिए ही हल किया जाना चाहिए। जस्टिस खेहर ने भले ही मुल्क में अम्न व अमान और हिन्दू मुसलमानों के दरमियान कशीदगी खत्म करने के मकसद से यह मश्विरा दिया है, हकीकत यह है कि इस मश्विरे ने अयोध्या में आलीशान राम मंदिर की तामीर का रास्ता साफ कर दिया है। जदीद मरकज़ को मिली इत्तेला के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी खुसूसन वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी की कई मुसलमान तंजीमों और ग्रुपों से बातचीत हो चुकी है अगर अयोध्या मुकदमे का अहम फरीक आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड ने अदालत से बाहर बातचीत के जरिए यह मसला हल करने में शिरकत न की तो पर्सनल लाॅ बोर्ड को अलग थलग करके बाकी तकरीबन एक दर्जन छोटी बड़ी मुस्लिम तंजीमों के साथ विश्व हिन्दू परिषद और हिन्दू महासभा का समझौता करा कर मंदिर की तामीर का काम शुरू करा दिया जाएगा। बाखबर जराए के मुताबिक जिन बुनियादों पर समझौता कराने की कोशिश हो रही है उनमें पहला फार्मूला खुद सुब्रामणियम स्वामी ने पेश कर दिया है कि जिस जगह पर आरजी (मेक शिफ्ट) मंदिर है उस जगह पर मंदिर की तामीर हो जाए और सरयू नदी की दूसरी तरफ एक बड़ी मस्जिद बनवा दी जाए। एक फार्मूला यह भी जेरे गौर है कि मंदिर तो उसी जगह बने और मस्जिद बनाने के लिए मंदिर व गोरखपुर हाई-वे के दरमियान जगह दे दी जाए। इसी के साथ अयोध्या की तमाम खस्ताहाल मस्जिदों की मरम्मत और रंगाई पुताई का काम करा दिया जाए। फिलहाल पुरानी मस्जिदों की मरम्मत और पुताई का काम कई सालों से बंद है। फार्मूला कोई भी तय हो खबरों के मुताबिक वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी 2019 के लोकसभा एलक्शन से पहले मंदिर तामीर शुरू कराना चाहते है। अजीब बात है कि सुप्रीम कोर्ट के मश्विरे की मुखालिफत में सबसे पहले हिन्दू महासभा और निर्मोही अखाड़ा ही सामने आया। इनके बाद जमीयत उलेमा-ए-हिन्द और मुकदमे के अस्ल फरीक मरहूम हाशिम अंसारी के बेटे इकबाल अंसारी के वकील और एक्शन कमेटी के कन्वीनर व मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड के मेम्बर जफरयाब जीलानी भी आ गए। पर्सनल लाॅ बोर्ड के जनरल सेक्रेटरी मौलाना वली रहमानी ने चीफ जस्टिस के मश्विरे का खैरमकदम करते हुए कहा कि अगर बातचीत से मसला हल हो जाए तो सबसे ज्यादा खुशी उन्हे ही होगी।

अदालत के बाहर बातचीत के जरिए अयोध्या में राम मंदिर तामीर का इस वक्त सबसे ज्यादा माकूल माहौल है। इससे पहले मंदिर तामीर का क्रेडिट लेने के लिए कम से कम आद्दा दर्जन हिन्दू तंजीमे मैदान में थी। हर बार बातचीत के दौरान कोई न कोई तंजीम अड़ंगा लगाकर बातचीत का रास्ता रोक दिया करती थी। अब ऊपर नरेन्द्र मोदी और नीचे आदित्यनाथ योगी की जोड़ी के सामने किसी भी तंजीम की कोई अहमियत या हैसियत ही नहीं रह गई है। आर.एस.एस. के सबसे बड़े नुमाइंदा नरेन्द्र मोदी बन गए हैं तो हिन्दू महासभा में आदित्यनाथ योगी का कद सबसे बड़ा हो गया है। यह दोनो ही चाहेंगे कि सुप्रीम कोर्ट के            चीफ जस्टिस के मश्विरे के मुताबिक कुछ लेकर तो कुछ देकर समझौता हो सकता है। यह लोग मस्जिद के लिए सरयू के पार जमीन देते है या मंदिर और हाई-वे के दरमियान देते है इस पर कोई हिन्दू तंजीम सवाल नहीं उठा सकेगी। आम हिन्दुओं में मस्जिद कहीं भी बन रही हो इसका कोई असर नहीं पड़ने वाला उन्हें तो सिर्फ इतना चाहिए कि मंदिर की तामीर शुरू हो गई। खुद नरेन्द्र मोदी और योगी दोनो ही दुनिया की सतह पर यह दिखाना चाहते हैं कि उनकी जो मुस्लिम और इस्लाम मुखालिफ तस्वीर (छवि) है वह गलत है वह दोनो तो सबको साथ लेकर चलने में यकीन करते हैं। वैसे भी मंदिर मसला बार-बार उठाने के पीछे इन लोगों का असल मकसद तो सत्ता हासिल करने का ही था। अब दोनो का ही देश और प्रदेश की सत्ता पर मजबूत कब्जा हो चुका है इसलिए दोनो का रवैया तब्दील होना जरूरी हो गया है। आखिर मुसलमानों के खिलाफ इंतेहाई खतरनाक और जहरीली तकरीरे करने के लिए मशहूर योगी चीफ मिनिस्टर बनने के बाद कह रहे है कि वह दंगा फसाद नहीं होने देंगे।

चीफ जस्टिस आॅफ इण्डिया के मश्विरे का अस्ल फायदा मंदिर की वकालत करने वालों को ही होने वाला है कि मुल्क के मौजूदा हालात में मुसलमानों की एक बड़ी जमाअत ऐसी सामने आ चुकी है जो किसी भी सूरत में वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी और उत्तर प्रदेश के वजीर-ए-आला आदित्यनाथ योगी की नजरों में अपने लिए जगह बनाने के लिए उतावला दिखती है। असम्बली एलक्शन से ठीक पहले मुस्लिम (बाकी पेज दो पर) वोटों के तकरीबन सबसे बड़े सौदागर दिल्ली जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी ने सबसे पहले इस मश्विरे का खैरमकदम करते हुए बयान दिया कि इस मसले को अदालत से बाहर हल करने की कोशिश की जानी चाहिए। आर.एस.एस. के ज्वाइण्ट जनरल सेक्रेटरी दत्तात्रेय होसबोले ने भी इस मश्विरे का खैरमकदम करते हुए कहा कि आर.एस.एस. ने हमेशा ही अदालत के बाहर इस मसले के हल की हिमायत की है। साथ ही उन्होंने यह भी कह दिया कि इसका फैसला द्दर्म संसद के जरिए किया जाना चाहिए क्योंकि वही लोग हैं जिन्होंने जन्मभूमि मंदिर आन्दोलन को मुत्तहिद करके ताकतवर बनाया और अदालत भी गए। इस मामले के एक अहम फरीक निर्मोही अखाड़े के वकील सुशील जैन ने इस मश्विरे पर सख्त एतराज करते हुए कहा कि सुब्रामणियम स्वामी ने इस मामले के किसी भी फरीक (पक्षकार) को इत्तेला दिए बगैर ही इस केस में दखल देने का काम किया है। इस लिए उनकी किसी भी कार्रवाई के साथ खड़े नहीं हो सकते इसी तरह हिन्दू महासभा के एक छोटे ग्रुप की नुमाइंदगी करने वाले वकील हरिशंकर जैन ने कहा कि समझौते का तो कोई सवाल ही नहीं है। अयोध्या की जमीन ‘रामलला विराजमान’ की है। जमीन देवता में जम (सन्निहित) होती है इसलिए देवता की जमीन का समझौता कोई इंसान कैसे कर सकता है। उन्होंने कहा कि पहले भी कई बार समझौते की कोशिशे हो चुकी है जो नाकाम रही इसलिए अब समझौते की बातचीत का कोई जवाज (औचित्य) नहीं है।

आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड के जनरल सेक्रेटरी मौलाना मोहम्मद वली रहमानी ने कहा कि अदालत की बात अच्छी है अगर मसले का हल बातचीत से निकल जाए तो यह बहुत अच्छी बात होगी और सबके लिए खुशकिस्मती की बात होगी। अदालत में मस्जिद की पैरवी करने वाले एडवोकेट और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के कन्वीनर जफरयाब जीलानी का कहना है कि अगर चीफ जस्टिस सालसी (मध्यस्थता) करे तो हम बातचीत के लिए तैयार है अगर वह किसी टीम को नामजद करते है तो भी हम इसके लिए तैयार है, लेकिन अदालत के बाहर कोई समझौता मुमकिन नहीं है। पीस फाउण्डेशन आॅफ इण्डिया के चीफ मुफ्ती एजाज अरशद कासमी का कहना है कि पूरे मामले की सुप्रीम कोर्ट का कोई सीनियर जस्टिस सालसी करे तो ही कोई हल मुमकिन है और अच्छा भी यही होगा। जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के मौलाना अरशद मदनी ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का मश्विरा काबिले कबूल नही है। पहले भी छः-सात बार बातचीत हो चुकी है जो बेसूद रही। उन्होंने कहा कि बाबरी मस्जिद हमारे अकीदे (आस्था) और मिल्कियत का मामला है जिससे मुसलमान किसी भी कीमत पर खुद को अलग नहीं कर सकता है। इस मुकदमे के सबसे पुराने मुद्दई रहे हाशिम अंसारी मरहूम के बेटे और वारिस इकबाल अंसारी के वकील एम.आर. शमशाद ने कहा है कि मस्जिद के लिए किसी दूसरी जगह जमीन ले ली जाए इसे समझौता तो नहीं कहा जा सकता। आर.एस.एस. के मौलाना कहे जाने वाले आल इण्डिया इमाम तंजीम के खुदसाख्ता सदर उमैर अहमद इलियासी ने कहा है कि अगर दोनो तरफ के लोग आपस में बैठ कर इस मसले को सुलझा लें तो इससे बेहतर बात और कोई नहीं हो सकती है। उन्होंने कहा कि बातचीत के जरिए इस मसले का हल देश और मआशरे (समाज) के लिए बहुत ही अच्छी बात होगी। इससे पूरी दुनिया में एक अच्छा मैसेज जाएगा। वैसे मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड को अलग करके अगर मोदी सरकार ने बातचीत के जरिए समझौता कराने की कोशिश की तो किसी भी समझौते पर दस्तखत करने वालों में उमैर इलियासी पहले शख्स होंगे।

अदालत के बाहर किसी भी समझौते की मुखालिफत जो मुसलमान कर रहे है। दरअस्ल अयोध्या मसले में तो वह किसी भी समझौते के लिए तैयार हैं लेकिन उन्हें खदशा इस बात का है कि अगर बाबरी मस्जिद का दावा उन्होंने छोड़ दिया तो यह सिलसिला आगे बढ़ते बढ़ते शायद मुल्क की तमाम तारीखी मसाजिद तक पहुंच जाएगा। आखिर हिन्दू तबके की जानिब से यह गारण्टी कौन देगा कि अयोध्या के बाद इस किस्म का दावा दूसरी मसाजिद पर नहीं किया जाएगा?

ऐसा नहीं है कि इस मसले को आपसी बातचीत के जरिए हल करने की कोशिशें नहीं हुई 1985 से अब तक तकरीबन दस बार सुलह समझौते की कोशिशें हो चुकी है। सिर्फ एक बार चन्द्रशेखर सरकार में बात आखिरी मरहले तक पहुंची थी लेकिन चन्द्र शेखर सरकार गिर गई वर्ना उस वक्त यह मसला हल हो जाता। उस वक्त बीजेपी के सीनियर लीडर और राजस्थान के वजीर-ए-आला भैरो सिंह शेखावत ने भी यह मसला बातचीत के जरिए हल कराने में काबिले जिक्र रोल अदा किया था। अगर चन्द्रशेखर सरकार दो-तीन महीने और चल जाती तो यह मसला हल हो जाता। शेखावत के अलावा सुबोद्दकान्त सहाय ने भी इस मामले में काफी मेहनत की थी। चन्द्रशेखर ने सुबोद्द कान्त सहाय की कयादत में ही समझौता कमेटी की तश्कील (गठन) करायी थी। शेखावत की मौजूदगी में अशोक सिंघल तक कानून के मुताबिक बात करने के लिए मजबूर रहते थे आस्था की बात नहीं करते थे।

इससे पहले मरकजी सरकारों की जानिब से समझौते की जितनी भी कोशिशें हुई इन सभी के नाकाम होने की एक बड़ी वजह यह भी थी कि 1985 में एक राजीव गांद्दी के अलावा बाकी सरकारें मजबूत नहीं थी। राजीव गांद्दी ने तो पूरी ईमानदारी से मसला हल कराने की पहल की थी, लेकिन वह इसलिए नाकाम रहे थे कि उनके इंटरनल सिक्योरिटी वजीर अरूण नेहरू थे जो आर.एस.एस. से मिलकर काम कर रहे थे। आखिर अरूण नेहरू ने छः फरवरी 1986 को फैजाबाद के डिस्ट्रिकट जज पाण्डे को मैनेज करके मस्जिद के गेट पर पड़ा ताला खुलवा ही दिया था। 1986 में उस वक्त मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड के सदर मरहूम मौलाना अबुल हसन अली नदवी (अली मियां) और कांचिकाम कोटि पीठ के शंकराचार्या के दरमियान इस सिलसिले में कई दौर की मीटिंगें हुई उस वक्त आन्द्द्रा प्रदेश के गवर्नर कृष्णाकान्त, बिहार के गवर्नर मरहूम मोहम्मद यूनुस सलीम और मौलाना अली मियां के साथी मौलाना अब्दुल करीम पारिख समेत दीगर कई जिम्मेदार लोगों ने उस वक्त की बातचीत में अहम रोल अदा किया था, लेकिन दिल्ली के मौलाना और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के एक सरगर्म लीडर दो लोगों की जिद की वजह से वह समझौता नहीं हो पाया था। समझौते की कोशिश में उस वक्त जितने भी लोग शामिल थे एक के अलावा अब दूसरा कोई दुनिया में नहीं है। सभी का इंतकाल हो चुका है अगर कुछ लोग जिंदा होते तो हम इस खबर में यह भी लिखते कि समझौते पर दस्तखत करने के लिए किस मौलाना ने कृष्णकान्त से पैंतीस लाख रूपये मांगे थे। उनका मतालबा सुनकर कृष्णकान्त इतने सदमे में पड़ गए थे कि किसी से मुलाकात किए बगैर वह खामोशी से हैदराबाद वापस चले गए थे और तकरीबन एक हफ्ते तक किसी से मुलाकात और बातचीत नहीं की थी।

अब सूरते हाल पूरी तरह से तब्दील हो चुकी है अब मरकज़ में मोदी और प्रदेश में आदित्यनाथ योगी की मजबूत सरकारें है। ऐसी सूरत में सुप्रीम कोर्ट ने आपसी समझौते का मश्विरा दिया है तो ऐसा लगता है कि बातचीत से कोई हल निकल सकता है। वजीर-ए-आला आदित्यनाथ ने भी नर्म रवैय्या अख्तियार कर रखा है। उन्होंने कहा है कि अगर आपस में कोई समझौता होता है तो उनकी सरकार हर मुमकिन तआवुन (सहयोग) करने के लिए तैयार है। उन्होंने यह भी कहा है कि अब उत्तर प्रदेश में वह कोई दंगा फसाद नहीं होने देंगे। किसी भी समझौते में सरकार क्या तआवुन कर सकती है। यही न कि प्रदेश में अम्न व अमान कायम रखे और समझौते के मुताबिक मंदिर और मस्जिद के लिए जमीने फराहम कराकर उन पर मुताल्लिका फरीक (पक्ष) को कब्जे में देकर मंदिर और मस्जिद की तंजीर का रास्ता साफ करें।

 

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