अखिलेश, माया को अपनों ने ठुकराया

अखिलेश, माया को अपनों ने ठुकराया

”यादव अक्सरियती सीटों पर अखिलेश के उम्मीदवार हार गए, 86 रिजर्व सीटों में से मायावती की बीएसपी को सिर्फ एक सीट पर कामयाबी मिली इसका क्या मतलब है, इन दोनों को अपनी बिरादरी के वोट भी नहीं मिले। दूसरी तरफ मुस्लिम अक्सरियत वाली चारों सीटें समाजवादी पार्टी ने जीती हैं। मतलब यह कि फिरकापरस्त ताकतों और बीजेपी को रोकने का ठेका मुसलमानों के सर ही मढ दिया गया। एलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों में गड़बड़ी के मायावती के इल्जाम में भी काफी दम है।”

 

”खुशामदियों, सत्ता के लालची दलालों में घिर कर अखिलेश को पता ही नहीं चला कि उनके वालिद मुलायम सिंह यादव ने पार्टी का जमीनी सतह पर जो मजबूत तानाबाना तैयार किया था वह उनके पैरों के नीचे से खिसक गया। अखिलेश, रामगोपाल और उनके बेजमीन साथियों के हाथांे मुलायम और शिवपाल की तौहीन पार्टी के गांव-गांव तक फैले वर्कर्स को पसंद नहीं आई उन्होने अखिलेश को सबक सिखा दिया।“

 

”अपनी सरकार के आखिरी दो सालों में अखिलेश पूरी तरह से रामगोपाल की कयादत में आरएसएस हामी गरोह और बीजेपी नवाज मीडिया से घिरे रहे। झूटी तारीफ कर-कर के उन्हीं गरोहों ने अखिलेश के गुरूर (घमण्ड) को इतना बढा दिया कि वह पार्टी और उन्हें चीफ मिनिस्टर बनाने वाले अपने वालिद की तौहीन करने का गुनाह कर बैठे। रामगोपाल आखिर तक अखिलेश को नरेन्द्र मोदी के बराबर का लीडर बताते रहे और तबाह कर दिया।“

 

लखनऊ! ‘जिन पे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे’ लखनऊ के एक बड़े शायर ने बरसों पहले यह शेअर कहा था तब शायद शायर को अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि उनका यह शेअर 2017 के असम्बली एलक्शन में समाजवादी पार्टी के नए सदर अखिलेश यादव और बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती पर बिल्कुल फिट हो जाएगा। नरेन्द्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश की 403 सीटंें सिर्फ इसलिए जीत लीं कि अखिलेश की पार्टी को उनकी अपनी यादव बिरादरी और मायावती की पार्टी को उनकी अपनी दलित बिरादरी के लोगों ने ठुकरा दिया। दोनों ही बिरादरियों ने इस बार पहले की तरह समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को वोट नहीं दिया। यादवों और दलितों की एक बड़ी तादादा ने इस बार मोदी के जादू में फंस कर भारतीय जनता पार्टी को ही वोट दिए। इसका सबूत यह है प्रदेश में जसवंत नगर, गुन्नौर, एटा सदर, सहसवान, शिकोहाबाद, भरथना, बिधूना और दिबियापुर ऐसी सीटें हैं जहां यादव की आबादी बहुत ज्यादा है यह सीटे शुरू से ही मुलायम सिंह और उनकी पार्टी का मजबूत गढ समझी जाती हैं। नौ ऐसी सीटों में इस बार सिर्फ दो जसवंत नगर और सहसवान ही समाजवादी पार्टी जीत सकी है बाकी सभी बीजेपी के हक में गई हैं। इन दो मे भी जसवंत नगर में शिवपाल यादव अपने दम पर जीते हैं। दूसरी तरफ संभल, रामपुर और स्वार टांडा सीटें ऐसी हैं जहंा मुस्लिम आबादी बहुत ज्यादा है तो यह तीनों सीटें समाजवादी पार्टी जीती है। रामपुर में मोहम्मद आजम खान और स्वार टांडा में उनका ही बेटा अब्दुल्लाह आजम मैदान में थे। आजम खान ने एक लाख दो हजार एक सौ वोट हासिल करके 45 हजार के मार्जिन से जीत हासिल की तो उनके बेटे अब्दुल्लाह ने पहला एलक्शन लड़ कर अपने वालिद को भी पीछे छोड़ दिया। अब्दुल्लाह ने एक लाख छः हजार चार सौ तैंतालीस वोट लेकर 53 हजार से भी ज्यादा वोटों के मार्जिन से जीत हासिल की। अब्दुल्लाह प्रदेश के सबसे कम उम्र के मेम्बर असम्बली बने हैं। रामपुर जिले की तीसरी सीट चमरौव्वा पर भी आजम खान का असर दिखा। उनके बनाए हुए उम्मीदवार नसीर खान वहां से जीते हैं। चैथी सीट मिलक के यादव अगर बीजेपी में न चले जाते तो आजम खान उसे भी जिता लेते। आजम खान के ही टिकट दिलाए हुए बिलारी से मोहम्मद फहीम और इसौली सुल्तानपुर से अबरार अहमद भी जीत कर असम्बली पहुंचे हैं। संभल में साबिक लोक सभा और असम्बली मेम्बर रहे मजबूत मुस्लिम लीडर शफीकउर्रहमान बर्क ने अपने पोते जियाउर्रहमान को असदउद्दीन ओवैसी की पार्टी से मैदान में उतारा था उन्हें साठ हजार चार सौ छब्बीस वोट मिले लेकिन मुसलमानों की अक्सरियत समाजवादी पार्टी के साथ चट्टान की तरह खड़ी रही तो अखिलेश के कैबिनेट वजीर नवाब इकबाल महमूद ने उन्नीस हजार दो सौ अड़तालीस वोट हासिल करके तकरीबन उन्नीस हजार वोटों से संभल जीत लिया। वहां बीजेपी उम्मीदवार तीसरे नम्बर पर आया। इसी तरह प्रदेश में शेडयूल कास्ट और शेडयूल ट्राइब्स के लिए रिजर्व 86 सीटों में से भारतीय जनता पार्टी और उसकी साथी अपना दल व भारतीय समाज पार्टी ने 77 सीटों पर कब्जा कर लिया। 73 सीटंेे अकेले बीजेपी ने तीन अपना दल ने और एक भासपा ने जीती हैं। सभी 86 रिजर्व सीटों पर मुसलमानों और दलित मिलकर तकरीबन सत्तर फीसद होते हैं। मुसलमानों ने बीजेपी को वोट नहीं दिया। इसका मतलब तो यही है कि या तो दलित बीजेपी में चले गए या मायावती के इल्जाम के मुताबिक वोटिंग मशीनों के जरिए बेईमानी की गई। यह नतीजे बताते हैं कि फिरकापरस्त ताकतों को रोकने की जिम्मेदारी अकेले मुसलमानों पर ही डाल दी गई।

अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी की इतनी बुरी शिकस्त की वैसे तो कई वजहें हैं लेकिन अस्ल वजह दो हैं। एक यह कि पंाच सालों तक वह आरएसएस के एजेण्ट मीडिया के चंगुल में फंसे रहे। मीडिया का यह गरोह अखिलेश को यह समझाता रहा कि इस वक्त प्रदेश ही नहीं पूरे देश में उनसे ज्यादा चमकता सियासी चेहरा सिर्फ वहीं हैं। इस आरएसएस गरोह ने आखिरी डेढ साल में अखिलेश को पूरी तरह अपनी मुट्ठी में कर लिया उन्हें बरगला कर सियासी एतबार से तबाह भी किया और इतना मगरूर (घमण्डी) बना दिया कि अखिलेश सबकुछ भूल गए। गरूर में ही अखिलेश अपने वालिद मुलायम सिंह यादव और चचा शिवपाल यादव तक को अवामी तौर पर बेइज्जत करने का गुनाह तक कर बैठे। आरएसएस के साजिशी मीडिया गरोह ने अखिलेश को खूब ठगने का भी काम किया। उनके अखबारात और टीवी चैनलों पर अखिलेश ने सैकड़ों करोड़ रूपए भी लुटाए। रामगोपाल ने अखिलेश के गुरूर में हर वक्त इजाफा करने का ही काम किया। आखिर में तो यहां तक कह दिया कि उनका अखिलेश अब वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी के बराबर खड़ा दिखाई देने लगा है।

अखिलेश की दूसरी बड़ी गलती बल्कि गुनाह (पाप) यह रहा कि रामगोपाल यादव के बहकावे मंे आकर उन्होेने अपने वालिद मुलायम सिंह यादव और पार्टी के चाणक्य कहे जाने वाले शिवपाल यादव की सरेआम तौहीन कर डाली। कोई दो दर्जन बेजमीन और लफंगे टाइप नौजवानों के चक्कर में पड़कर अखिलेश इस हकीकत को समझ नहीं पाए कि साइकिल पर सवार होकर या पैदल चलकर लखनऊ आकर अखिलेश के नाम पर सैकड़ों करोड़ के मालिक बने गरोह और सत्ता के लालची लोग तो मुलायम सिंह और शिवपाल यादव कोे छोड़ कर उनके साथ आ गए हैं लेकिन पार्टी की जमीनी मशीनरी और वोटर्स को पोलिंग बूथों तक ले जाने वाले गांव-गांव तक फैले समाजवादी वर्कर तो मुलायम और शिवपाल के साथ ही रह गए हैं। पार्टी की जो जमीनी फोर्स पच्चीस सालों से मुलायम सिंह यादव को अपना अस्ल मसीहा मानती थी वह अखिलेश से इतना ज्यादा नाराज हो गई कि उसने यही तय कर लिया कि अब अखिलेश को सबक सिखाना है। ‘जो न हुआ अपने बाप का वह क्या होगा आपका’? यह नारा भी जमीनी समाजवादियों में खूब चला। इधर गरूर (घमण्ड) में चूर अखिलेश की आंखों पर आरएसएस मीडिया का वह चश्मा चढा रहा कि उनसे ज्यादा मकबूल (लोकप्रिय) लीडर तो अब दूसरा कोई है ही नहीं।

कई जिलों से अब यह खबरें भी मिल रही हैं कि अखिलेश यादव को गुमराह करने के लिए आरएसएस और बीजेपी के चालाक लोग अपने लोगों को अखिलेश की रैलियों, पब्लिक मीटिंगों और रोडशोज में भेजकर भीड़ बढवाते और अखिलेश की हिमायत में नारेबाजी कराते थे। अपने गरूर में डूबे अखिलेश और उनके इर्दगिर्द जमा मौकापरस्तों की भीड़ सियासी मुखालिफीन की यह चाल भी समझ नहीं सके और हवा में उड़ते रहे। यह लोग किसी भी तरह यह मानने को तैयार नहीं थे कि अखिलेश की समाजवादी पार्टी तीसरे नम्बर पर पहुंच चुकी है। वह सब इसी गलतफहमी में रहे कि अखिलेश तो बड़ी धूम-धाम के साथ सत्ता मंे वापस आ रहे हैं।

यह कहना भी गलत न होगा कि रामगोपाल यादव की कयादत में आरएसएस एजेण्टों के चक्कर में पड़कर अखिलेश यादव एलक्शन हारे नहीं हैं बल्कि उन्होने सियासी खुदकुशी की है। वह मुलायम सिंह यादव नहीं हैं जिन्होंने अपने दम पर सियासत की उन बुलंदियों को छू लिया था कि 1989 से 2016 तक मुलायम सिंह यादव का नाम लिए बगैर मुल्क की सियासत पर होने वाली कोई बहस मुकम्मल ही नहीं हुई। कोई कुदरती करिश्मा हो जाए तो दीगर बात है वर्ना अखिलेश को अब सत्ता में वापसी करने मंे बीसों साल लग जाएंगे। पहली बार अमली तौरपर सियासी मैदान में उतर कर अपने शौहर का हाथ बटाने वाली अखिलेश यादव की लोक सभा मेम्बर बीवी डिम्पल यादव ने यह अंदाजा तो लगा लिया था कि कुछ लोगों ने साजिश रची थी कि पार्टी पर कब्जा कर लें। पब्लिक मीटिंगों में उन्होेने अपनी पार्टी के नौजवानों को मुखातिब करके कहा भी कि कुछ लोगों ने ऐसी साजिश रची थी कि आप के भैय्या यानी अखिलेश के हाथ से सायकिल (चुनाव निशान) और पार्टी दोनों चली जाती उनके पास बस सायकिल की चाबी और आप की भाभी ही रह पाती। सियासत में तजुर्बा कम होने की वजह से डिम्पल भी अपने शौहर अखिलेश की तरह यह नहीं समझ सकीं कि यह साजिश किसी और ने नहीं जिन पर उन्होंने दुनिया में सबसे ज्यादा भरोसा किया उन्हीं रामगोपाल यादव ने आरएसएस और बीजेपी के साथ साठगाठ करके रची है। एलक्शन के नतीजों से अब साबित हुआ है कि सायकिल और पार्टी तो तबाह हो गई भैय्या अखिलेश के पास ‘चाभी और भाभी’ ही बचीं हैं।

अखिलेश की समाजवादी पार्टी और राहुल गांधी की कांगे्रस को हराने में एक और शख्स ने बहुत अहम किरदार अदा किया वह हैं नरेन्द्र मोदी और आरएसएस के पुराने नमक ख्वार मुबय्यना (कथित) मैनेजमेंट एक्सपर्ट प्रशांत किशोर जिन्होने इन दोनों को आखिरी वक्त में अपने जाल में फंसा कर दोनों की पार्टियों का गठजोड़ करा दिया। इन दोनों का गठजोड़ होते ही प्रदेश के अवाम में एक मैसेज यह चला गया कि अखिलेश यादव और राहुल गांधी मिलकर मुसलमानों की मदद से राष्ट्रभक्त वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी को हराना और उनकी तौहीन करना  चाहते हैं। नतीजा यह हुआ कि मुस्लिम वोट तो अखिलेश-राहुल गठजोड़ और बहुजन समाज पार्टी के दरम्यान तकसीम हो गया। दूसरी तरफ आरएसएस और बीजेपी ने गैरमुस्लिम वोटों को पोलराइज कर लिया। अगर समाजवादी, कांगे्रस और बहुजन समाज पार्टी पहले की तरह अलग-अलग ही लड़ी होतीं तो तीनों की इतनी बुरी हालत भी न होती और बीजेपी को 325सीटें जीतने का रिकार्ड बनाने का मौका भी न मिलता। अपने गुरूर (घमण्ड) में चूर होकर अखिलेश यादव ने और भी कई बड़ी गलतियां कीं उनकी तफसील आइंदा के शुमारों (अंकों) में देने की कोशिश की जाएगी।

मायावतीः बीएसपी की इतनी बुरी हालत होगी और उसे 403 में से सिर्फ उन्नीस सीटें ही मिलेंगी इसका अंदाजा तो शायद नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को भी नहीं लगा होगा। प्रदेश की 86 रिजर्व सीटों और बीएसपी का गढ समझे जाने वाले इलाकों में मायावती की पार्टी का जो बुरा हश्र हुआ है उसकी दो ही वजहंे दिखती हैं। एक मायावती का डिक्टेटराना रवैय्या और अपने वोटरों से अलग-थलग रहना। दूसरा उनका यह इल्जाम कि उन्हें हराने के लिए मरकजी सत्ता में बैठी बीजेपी के जरिए एलेक्ट्रनिक वोटिंग मशीनों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी करना। वैसे दोनों ही वजहों में काफी हद तक दम दिखता है। पहला यह कि मायावती अभी तक इस गलतफहमी का शिकार हैं कि वह किसी से मिलें या न मिलें उनके एक इशारे पर दलित तबका खुसूसन उनकी अपनी जाटव बिरादरी के लोग कुछ भी कर गुजरेंगी। मुमकिन है इस एलक्शन में उनकी अपनी जाटव बिरादरी उनके साथ रही हो लेकिन छोटी-छोेटी जातों में बंटे बैकवर्ड तबके और पासी समाज जैसी जातों के वोटर कुछ सीटों के अलावा उनसे बहुत दूर जा चुके हैं। इस हकीकत का अंदाजा लगा पाने में मायावती भी नाकाम रहीं या जानबूझ कर उन्होेने इस पर गौर नहीं किया।

मायावती के इस इल्जाम में भी काफी दम दिखता है कि एलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों में गड़बड़ी करके उन्हें हराया गया है। एलक्शन कमीशन समेत जो लोग मायावती के इल्जाम को झुटलाने  में यह कह रहे हैं कि मशीनों में किसी भी किस्म की गड़बड़ी मुमकिन ही नहीं है। वह गलतबयानी कर रहे हैं। आज मुल्क और दुनिया एलेक्ट्रानिक्स के मैदान में इतना आगे बढ चुके हैं कि कुछ भी मुमकिन है। यह दलील भी गलत है कि अगर मशीनों में गड़बड़ी की गुंजाइश होती तो उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड के अलावा पंजाब, गोवा और मणिपुर में भी बीजेपी यह काम कर सकती थी। उन प्रदेशों में इसलिए ऐसा नहीं कराया गया होगा कि उन प्रदेशों की सियासी अहमियत उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड जैसी नहीं है। पंजाब में दस साल से अकाली-बीजेपी सरकार काफी बदनाम हो चुकी थी बाकी दोनों प्रदेशों का कोई अहम रोल नहीं है।