यूपी उत्तराखण्ड को मोदी की बात पंसद है

यूपी उत्तराखण्ड को मोदी की बात पंसद है

”वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने भले ही अस्ल मुद्दों को नजर अंदाज करके गैर जरूरी मुद्दों को उठाया हो, आम लोगों मंे अभी भी उनकी 2014 जैसी मकबूलियत बरकरार दिखी। श्मशान, कब्रस्तान, होली,  रमजान पर बिजली जैसी बातें करके वोटों को पोलराइज करने में उन्हें कामयाबी मिली। पोलराइजेशन कराने में दूसरी पार्टियों ने भी भरपूर तआवुन (सहयोग) किया। इन सबके बावजूद यह नतीजे बीजेपी के लिए तारीखी तो समाजवादी, कांग्रेस और बीएसपी के लिए शर्मनाक रहे हैं।“

 

”अखिलेश यादव और राहुल गांधी के गठजोड़, मायावती के मुस्लिम ढिढोरे और मुसलमानों के मुबय्यना (कथित) दाढी वाले ठेकेदारों की बयानबाजी ने प्रदेश के हिन्दू समाज मंे जात-पात और फिरकों की दीवारें तोड़ दीं। हर जात के लोग बीजेपी के हामी हो गए। मुस्लिम ठेकेदारों की अपीलों का असर मुसलमानों पर तो पड़ा नहीं इन बयानात ने हिन्दुओं को पोलराइज कर दिया।“

 

” अब यह बात भी आम हो चुकी है कि अखिलेश के चचा रामगोपाल यादव और कांगे्रस के नए ठेकेदार बने प्रशांत किशोर ने भी समाजवादी पार्टी और कांगे्रस को तबाह कराने की सुपारी ली थी। दोनों अपने मंसूबों में कामयाब हुए दिखते हैं। अगर कांग्रेस और अखिलेश का गठजोड़ न होता तो गैरबीजेपी वोटों की इतनी बुरी तकसीम न होती। मायावती की इतनी बुरी शिकस्त भी न होती। बीएसपी की कमजोरी का फायदा भी बीजेपी को मिला।“

 

 

लखनऊ! उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड के लोगों पर वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी की बात चल गई। यूपी को अखिलेश और राहुल गंाधी का साथ पसंद है का नारा नहीं चला बल्कि यह चल गया कि ‘उत्तरप्रदेश और उत्तराखण्ड को नरेन्द्र मोदी की बात पसंद है।’ मोदी की बातों का इतना असर हुआ कि उत्तर प्रदेश में तमाम गैर मुस्लिम आबादी मुत्तहिद हो गई दिखी। इंतेहा यह है कि अखिलेश की अपनी बिरादरी के आधे से ज्यादा यादव भी मुस्लिम मुखालिफ लहर मेें बहकर भारतीय जनता पार्टी की जानिब चले गए। उत्तर प्रदेश की तारीख में अब तक तीन बार ही किसी पार्टी को तीन सौ से ज्यादा सीटंे मिली हैं।। सबसे पहले 1952 में पहले असम्बली एलक्शन में पंडित जवाहर लाल नेहरू की कयादत में कांगे्रस ने 388 सीटें जीती थीं जो एक न टूटने वाला रिकार्ड है। दूसरी बार 1977 में इमरजेंसी के बाद हुए एलक्शन मंे जनता पार्टी ने 352 सीटंें जीती थीं। जनता पार्टी नाकाम हुई 1980 में मिडटर्म एलक्शन हुए तो कांगे्रस ने 309 सीटें जीती थीं। अब नरेन्द्र मोदी की कयादत मंे भारतीय जनता पार्टी ने 312 सीटें जीत कर तीसरा बड़ा रिकार्ड कायम किया है। अब यह भी साफ हो चुका है कि प्रदेश की हर जात हर तबके के हिन्दुओं को बीजेपी के हक में करने के लिए अखिलेश यादव के चचा रामगोपाल यादव और राहुल गांधी की कांग्रेस के नए ठेकेदार प्रशांत किशोर ने बीजेपी सेे सुपारी ली थी वह दोनों अपने मंसूबे में पूरी तरह कामयाब रहे है। अखिलेश और राहुल गंाधी के दरम्यान गठजोड़ की बात आखिरी दौर में थी तभी जदीद मरकज ने अपने 22-28 जनवरी 2017 के शुमारे मंे लीड खबर शाया कर दी थी कि इस गठजोड़ से बीजेपी को फायदा होगा। (देखें बाक्स) हुआ भी ठीक वैसा ही। पूरी एलक्शन कम्पेन में वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी या उनकी पार्टी के दीगर लीडरान ने अस्ल मुद्दों पर ज्यादा बात भी नहीं की। इसके बावजूद प्रदेश कि हिन्दू आबादी इस ख्याल से बीजेपी के पीछे खड़ी हो गई कि अखिलेश राहुल और मायावती ने मुसलमानों की मदद से नरेन्द्र मोदी की सिर्फ तौहीन करने की गरज से बीजेपी को हराने का मंसूबा बनाया है। यह लहर अंदर खाने पूरे उत्तर प्रदेश में ऐसी चली कि चार-पांच सालों से थानों के इंचार्ज बनकर हर तरह का फायदा उठाने वाले पुलिस इंस्पेक्टर्स के कुन्बों तक ने बीजेपी को ही वोट दे दिया। बुरी तरह हारने के बाद अखिलेश यादव ने अवाम के फैसले का इस्तकबाल करते हुए कहा कि जम्हूरियत में कभी कभी यह भी होता है कि लोग समझाने के बजाए बहकाने से वोट दे देते हैं। अखिलेश से भी ज्यादा बुरी तरह हारने वाली बहुजन समाज पार्टी की चीफ मायावती ने एलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों पर सवाल उठाया है। अखिलेश ने कहा कि अगर उन्होने एलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों की शिकायत की है तो सरकार को उसकी तहकीकात करानी चाहिए। वैसे तो मोदी की बीजेपी के जीतने का सारा क्रेडिट नरेन्द्र मोदी को ही है लेकिन दोनों प्रदेशों के हिन्दू वोटरों का एक जुट होना भी इसकी एक बड़ी वजह रहा है। जो भी हो उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांगे्रेस की यह इंतेहाई शर्मनाक शिकस्त है। इन तीनों  पार्टियों की लीडरशिप ने कई बहुत ही भयानक गलतियां की है। इन तीनों पार्टियों की लीडरशिप में न सिर्फ गरूर दिखा बल्कि इन लीडरान ने हकीकत पर कभी गौर करना तक मुनासिब नहीं समझा।

उत्तर प्रदेश के हिन्दू तबकों को मुत्तहिद करने में अखिलेश यादव और राहुल गांधी के गठजोड़ का एक बड़ा रोल रहा तो मायावती ने भी मुसलमानों का खूब ढिढोरा पीटा। आखिर में अहमद बुखारी, आमिर रशादी, कल्बे जवाद और लखनऊ के इमाम ईदगाह खालिद रशीद फरंगी महली की बीएसपी और समाजवादी पार्टी की खुली हिमायत ने भी समाज में जहर घोलने का ही काम किया। अलग-अलग एलक्शनों में अलग-अलग पार्टियों से पैसे खाकर उनकी हिमायत का एलान करने वाले इन मुबैयना (कथित) मुस्लिम मजहबी लीडरान की अपील का मुसलमानों मे तो कोई असर हुआ नहीं लेकिन इन लोगों की बयानबाजी ने हर जात व हर तबके के हिन्दू वोटरोें को मुत्तहिद जरूर कर दिया। अब बीजेपी सदर अमित शाह और उनकी पार्टी के दीगर लोग कुछ भी कहें इस तारीखी (ऐतिहासिक) जीत की अस्ल वजह कम से कम  उत्तर प्रदेश में तो वोटरों का पोलराइजेशन ही रहा है।

जिस तरह 2014 के लोकसभा एलक्शन के नतीजों का अंदाजा किसी को नहीं हुआ था और नरेन्द्र मोदी की पार्टी को 80 मंे से 73 सीटें मिल गई थीं उसी तरह अब असम्बली एलक्शन मंे भी बीजेपी लीडरान समेत किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि असम्बली की 403 सीटांें में से बीजेपी और उसकी साथी पार्टियां मिलकर 325 सीटें जीत लेगी। अखिलेश की बरसरेएक्तेदार (सत्ताधारी) समाजवादी पार्टी 47 पर, बीएसपी 19 पर और कांगे्रस 7 सीटांे पर सिमट जाएगी। अगर अखिलेश और मायावती इन नतीजों से हैरत में हैं तो बीजेपी के भी कई लीडर हैरतजदा दिखे। उन्हें यह तो उम्मीद थी कि बीजेपी अक्सरियत हासिल  करके सरकार बना लेगी। जिसके लिए 202 सीटों की जरूरत होती हैं। लेकिन 325 सीटें आ जाएंगी यह किसी ने सोचा भी नहीं था। 2014 के लोक सभा एलक्शन मंे नरेन्द्र मोदी को उत्तर प्रदेश से 43 फीसद वोट मिले थे अब असम्बली एलक्शन में भी बीजेपी ने 43 फीसद वोट हासिल किए है। इस तरह बीजेपी चैदह सालों बाद धूमधाम के साथ उत्तर प्रदेश की सत्ता मंे वापसी की है। बीजेपी लीडरान कहते हैं कि भगवान राम को भी चैदह साल का वनवास मिला था अब हम भी चैदह साल बाद वापस आए हैं तो प्रदेश में राम राज कायम करेंगे।

एलक्शन नतीजे आने के फौरन बाद बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) पर ही सवाल उठाया और कहा कि यह कैसे मुमकिन है कि मुस्लिम मोहल्लांे के वोट भी बीजेपी के हक में चले गए।  उन्होने कहा कि कई जगहों से शिकायतें मिली थीं कि मशीन का बटन चाहे किसी निशान का दबाया गया हो वोट बीजेपी उम्मीदवार के हक में ही जाता था। उन्होने इसकी तहकीकात कराने का मतालबा किया तो बाद में मीडिया से बात करते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि अगर एक पार्टी की बड़ी लीडर ने कोई सवाल उठाया है तो उसकी तहकीकात होनी चाहिए। वैसे तो मायावती पुर एतमाद (आत्मविश्वासी)  दिख रहीं थीं लेकिन नतीजों से उनका परेशान होना लाजमी हैै। बहुजन समाज पार्टी  1985 में पहली बार असम्बली का एलक्शन लड़ी थीं तब उसके जितने उम्मीदवार जीतकर असम्बली पहुचे थे 32 साल बाद पार्टी फिर धूमकर उसी जगह पहंुच चुकी है। 19 मेम्बरान असम्बली की ताकत पर न तो मायावती राजसभा पहुंच सकती हैं और न ही वह किसी को एमएलसी बनवा सकती हैं। उत्तर प्रदेश से राज्य सभा के एक उम्मीदवार को जीतने के लिए 38 तो एमएलसी के लिए 33 वोटों की जरूरत होती है। 2012 में एलक्शन हारने के बाद मायावती राज्य सभा चली गई थीं तकरीबन अब से तकरीबन एक साल बाद 2  अप्रैल 2018 को उनका राज्य सभा का टर्म खत्म हो रहा है। उन्हें इसकी भी फिक्र होना लाजमी है।

 

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