सियासत में हाशिए पर पहुंच गई एमएनएस

सियासत में हाशिए पर पहुंच गई एमएनएस

मुंबई। बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने जब नौ मार्च 2006 में शिवसेना छोड़कर ‘महाराष्ट्र नव निर्माण सेना’ (एमएनएस) के नाम से अपनी अलग पार्टी बनाई थी, तो उनके जारेह तेवरों की वजह से शिवसेना से जुड़े मराठी लोगों को उनमें बाल ठाकरे का अक्स नजर आया था और वह बहुत तेजी से महाराष्ट्र की सियासत के उफक पर उभरी थी। लेकिन बहुत जल्द अपनी सियासत की वजह से राज ठाकरे ने अपना मकाम खो दिया। कट्टर हिन्दुत्व की सियासत से ज्यादा उन्होंने इलाकाई (क्षेत्रीय) सियासत पर जोर दिया और उत्तर भारतियों खुसूसन बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों को महाराष्ट्र से बाहर निकालने की मुहिम चलाई। लेकिन इस वजह से उन्होंने मराठियों खुसूसन मराठी नौजवानों के बीच अपना वकार खो दिया। नतीजा यह कि 2009 में 13 असम्बली सीटे जीतने वाली एमएनएस 2014 में एक सीट तक सिमट गई। 2012 के बीएमसी एलक्शन में 28 सीटें जीतने वाली एमएनएस पिछले दिनो हुए बीएमसी चुनाव में सात सीटों पर सिमट गई। यह आंकड़े बताते है कि महाराष्ट्र की सियासत में राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस हाशिए पर पहुंच गई है।

राज ठाकरे जब शिवसेना में थे तो उन्हें बाल ठाकरे का सियासी वारिस समझा जा रहा था खुद राज ठाकरे भी ऐसा महसूस करने लगे थे यह देखकर बाल ठाकरे ने अपने बेटे उद्धव ठाकरे को सियासत में बढ़ावा देना शुरू कर दिया। जिस पर उद्धव और राज के रिश्ते खराब हो गए और उन्होंने 9 मार्च 2006 को अपनी अलग पार्टी एमएनएस बना ली। इस पार्टी को उन्होंने शिवसेना के मुताबादिल (विकल्प) बनाने की कोशिश की मगर वह उसमें नाकाम रहे। हालांकि नई पार्टी बनाने के बाद हुए बीएमसी के एलक्शन में 7 सीटें जीत कर ठीक-ठाक शुरूआत की थी। उसके बाद 2008 में उन्होंने उत्तर भारतियों को महाराष्ट्र से बाहर निकालने की मुहिम छेड़ी और उनकी पार्टी के गुण्डो ने खूब हंगामा किया। रेलवे के इम्तेहान देने आए बिहारी स्टूडेन्ट्स से मारपीट की और शिवसैनिक मराठियों में अपनी जगह बनाई जिसका फायदा उन्हें 2009 में हुए महाराष्ट्र असम्बली के चुनाव में मिला और महाराष्ट्र की 228 असम्बली सीटो में उनकी पार्टी 13 सीटे जीतने में कामयाब रही जबकि 24 सीटों पर वह दूसरे नम्बर पर रही। एमएनएस ने शिवसेना और बीजेपी का इतना वोट काट लिया कि उसका सरकार बनाने का ख्वाब टूट गया। 2009 में राज ठाकरे की पार्टी ने मुंबई में छः नासिक में 3, थाणे में 2, पुणे और कन्नाड (औरंगाबाद) में एक-एक असम्बली सीट जीती थी।

राज ठाकरे इसके बाद मराठियों में अपने आपको एक संजीदा लीडर नहीं बना पाए। उनकी सारी सियासत कट्टर हिन्दुत्व और इलाकाई असबियत (क्षेत्रीय भेदभाव) तक ही महदूद रही जिसे नौजवान मराठियों ने नकार दिया। सियासी तजजिया निगार प्रकाश बल का कहना था कि राज ठाकरे मराठी नौजवानों के बदलते नजरिए को समझ नहीं पाए जो तंगनजरी और तंगजेहन से ऊपर उठ चुका था। उसने राज ठाकरे की पार्टी को संजीदगी से लेना बंद कर दिया। दूसरे उनकी पार्टी के वर्करों की हरकते और राज ठाकरे की तकरीरे उन्हें सियासतदां से ज्यादा गुण्डा बनाकर पेश करती रही जिसकी वजह से मराठी मानुष ने उन्हे नजर अंदाज करना शुरू कर दिया क्योंकि राज ठाकरे के पास कट्टर हिन्दुत्व तो था मगर मराठी लोगों की तरक्की का कोई मंसूबा उनके पास नहीं था। नतीजा अवाम ने उन्हें सियासी तौर पर संजीदगी से लेना बंद कर दिया जिसका नतीजा यह हुआ कि 2014 के एलक्शन में 228 मेम्बरान वाली महाराष्ट्र असम्बली में राज ठाकरे का सिर्फ एक मेम्बर असम्बली शरद सोनावेन है, इसके बाद 2017 के बीएसपी एलक्शन में उनकी और बुरी हालत हुई। मुंबई महानगर पालिका की 227 सीटों में से एमएनएस ने 2012 में 28 जीती थी जो 2017 में कम होकर 7 रह गई। पुणे में 29 सीटे जीती थी तो इस बार 2 ही जीत सकी, नागपुर में 2 जीती थी इस बार एक भी नहीं, थाने में 7 जीती थी इस बार खाता भी नहीं खुल सका, पिपरी चिचवाड़ में 4 जीती थी इस बार एक भी नहीं, यही हाल सोलापुर और अकोला में हुआ जहां उनकी पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। यह आंकड़े बताते है कि राज ठाकरे की पार्टी की इस वक्त महाराष्ट्र की सियासत में क्या हैसियत है।