मुल्क व मिल्लत की सियासत के मुखलिस रहनुमा थे सैयद शहाबुद्दीन

मुल्क व मिल्लत की सियासत के मुखलिस रहनुमा थे सैयद शहाबुद्दीन

मोहम्मद मसूद

सैयद शहाबुद्दीन पिछले कई बरसों से अमली सियासत से दूर रहकर खामोश जिंदगी गुजार रहे थे लेकिन इस बीच में भी उनका लिखने-पढने का सिलसिला जारी था और मिल्ली मसायल पर वह कुछ न कुछ इजहारे ख्याल करते रहते थे। अमली सियासत में सरगर्म न होनेसे उनका जिक्र कम से कम होता गया और एक ऐसी नस्ल जवान हो गई जो नहीं जानती कि सैयद साहब किस कर व फर के आदमी थे और तकरीबन तीन दहाइयों तक मुल्की व मिल्ली मंजरनामे पर छाए हुए थे। पिछली चार मार्च को उनके इंतकाल से इस अहद का खात्मा हो गया जिस में वह सबसे बड़े मुस्लिम सियासी रहनुमा के तौर पर मारूफ और बातचीत का मौजूअ थे।

आजादी के बाद हिन्दुस्तान में मुसलमानों के हालात जैसे भी रहे हों यह कहना सही नहीं होगा कि उनके लिए आवाज उठाने वाले या अम्न की कयादत करने वाले मौजूद नहीं थे। आजादी के फौरन बाद इन मुस्लिम लीडरों ने मुसलमानों के सर पर हाथ रखा और उनके साथ होने वाली नाइंसाफियों की जानिब सरकार का ध्यान खीचा जिन्होंने जंगे आजादी के आखिरी दिनों में मुल्क की तकसीम की पूरी जर्रत के साथ मुखालिफत की थी और खुद अपने लोगों के बीच मतऊन थे और नेशनलिस्ट मुसलमान कहलाते थे। उनमें से ज्यादातर का ताल्लुक जमीयत उलेमा और कांगे्रस से था औ उन लोगों ने उस वक्त मुसलमानोंकी नुसरत की जब तकसीम के बाद इंतेहाई बोहरानी दौर से मुसलमान गुजर रहे थे। इस सिलसिले में मौलाना सैयद हुसैन अहमद मदनी और उनके दोस्तों के अलावा कई लोगों के नाम लिए जा सकते हैं। उन लोगों में जदीद तालीम के रास्ते से जो लोग आगे चलकर उभरे उनमें पहला नाम डाक्टर सैयद महमूद का था जिनकी कयादत में मुस्लिम मजलिस मशावरत का कयाम अमल में आया। डाक्टर सैयद महमूद के बाद डाक्टर अब्दुल जमील फरीदी और फिर बिला शुब्हा सैयद शहाबुद्दीन का नाम लिया जा सकता है। डाक्टर सैयद महमूद का ताल्लुक कांगे्रस से था लेकिन उनके बाद आने वाले डाक्टर फरीदी और शहाबुद्दीन कांग्रेस मुखालिफ रहनुमाओं की सफ में थे। डाक्टर फरीदी का मई 1974 में इंतकाल हुआ और उनके बाद लगता नहीं था कि इस सतह का कोई रहनुमा सामने आएगा। इस कमी को सैयद शहाबुद्दीन ने पूरा किया। वह इंडियन फारेन सर्विसेज की आला सिफारतकार का ओहदा छोड़कर सियासत में आए ओैर उन्होने कई बड़े मामलों मे मिल्ली रहनुमाई का फरीजा अंजाम दिया। वह 1979 से 1996 तक पार्लियामेंट के मेम्बर रहे। पहले राज्य सभा में फिर दो टर्म लोक सभा मेें रहे और मुल्क की नुमायां खिदमात अंजाम देने के साथ और मिल्ली रहनुमाई का फर्ज भी अदा करते रहे। सैयद शहाबुद्दीन इस बात पर जोर देते थे कि मुसलमानों को तहफ्फुज, तालीम और रोटी भी चाहिए और मस्जिद भी। यह उनका उन लोगों को जवाब था जो कहते थे कि मुसलमान का अस्ल मसला जेहालत और गरीबी है और मजहब उनको इस भंवर से निकलने नहीं दे रहा है। दूसरी बात जो अहम है वह यह कि उन्होने डाक्टर सैयद महमूद और डाक्टर फरीदी ही की तरह फिरकावाराना सियासत कभी नहीं की। मुसलमानों के दीनी और मिल्ली पहचान का मामला उठाने के बावजूद और इसके बावजूद कि तंगनजर कौमी मीडिया ने उन्हें एक फिरकापरस्त मुसलमान के बतौर प्रोजेक्ट किया। वह कई गैर मुस्लिम रहनुमाओं के साथ मिलकर अपना काम करते रहे और जिम्मेदार पार्लियामेंट्रियन की हैसियत से उन्हें सराहा भी गया। उनका मानना था कि अगर यह मुल्क इंसाफ की तरफ एक कदम बढाता है तो फितरी तौर पर मुसलमानों की तरफ भी एक कदम बढेगा। बददयानती और गरोही कशमकश का खात्मा होगा तो मुसलमानों के खिलाफ भी तंगनजरी और भेदभाव का खात्मा होगा। सलमान रूशदी की बदनाम जमाना किताब शैतानी आयात पर पाबंदी, शाहबानो केस और बाबरी मस्जिद के सिलसिले मेंउनका नाम बहुत उछाला गया और इसमें शक नहीं कि राजीव गांधी की सरकार के दौरान अपोजीशन में रहते हुए  उन्होने रूशदी की किताब पर पाबंदी लगाने के लिए जद्दोजेहद की और कामयाब रहे। इसी तरह शाह बानो मामले में भी दूसरे मिल्लत के अकाबिरीन के साथ उन्होने सरकार पर दबाव बनाया और राजीव गांधी सरकार ने बिल मंजूर किया। बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमेटी के भी वह रहनुमा थे और इस सिलसिले में उनसे जो बन पड़ा उन्होनेे किया। ऐक्शन कमेटी के दूसरे साथियों से उनके शदीद इख्तिलाफात भी रहे इसमें कई ग्रुप भी बने लेकिन उनके इखलास पर कभी किसी ने शुब्हा जाहिर नहीं किया। 6 दिसम्बर 1992 में बाबरी मस्जिद की शहादत ने उन्हें अंदर से तोड़कर रख दिया और यह मिल्लते इस्लामिया की ऐसी नाकामी थी कि सैयद शहाबुद्दीन जैसी शख्सियत भी इसके बाद पूरी तरह उभर नहीं सकी। उनका सबसे बड़ा कारनमा उनका अपना रिसाला ‘मुस्लिम इंडिया’ था जिसे वह अकेले दम पर लम्बे अर्से तक निकालते रहे और बड़ी जांफशानी और मेहनत से आंकड़े जमा करके मजामीन तैयार करते थे। उसमें मुसलमानों की बदहाली और उनके साथ होने वाली नाइंसाफियों के दस्तावेजी सबूत पेश करते थे। सख्त मुश्किल हालात मंे भी किसी न किसी तरह 2010 तक यह रिसाला निकलता रहा। इसके बाद खराबी सेहत और कई अमराज मे घिरे होने की वजह से उन्हें रिसाला बंद करना पड़ा।

सैयद शहाबुद्दीन 4 मार्च 1935 को रांची में पैदा हुए, 1958 में उन्होनेे इंडियन फारेन सर्विस के अफसर की हैसियत से अपने कैरियर की शुरूआत की और कई मुल्कों में सिफारतकार की खिदमात अंजाम दी। 1978 में आईएफएस से इस्तीफा देकर वह सियासत में आए। कहा जाता है कि साबिक वजीर-ए-आजम चन्द्रशेखर उन्हें सियासत में लाए और उन्हें जनता पार्टी में शामिल किया। चन्द्रशेेखर उस वक्त जनता पार्टी के सदर थे। बाद में 1990 में जब चन्द्रशेखर मुल्क के वजीर-ए-आजम बने तो उन्होने सैयद शहाबुद्दीन को भी वजारत में शामिल होने को कहा लेकिन वह इसपर राजी नहीं हुए औरएक मेम्बर पार्लियामेंट की आजादी के साथ अपना काम करते रहे। वह 1979 से  1984 के बीच राज्यसभा और 1984 से 1989 और 1991 से 1996 तक किशनगंज बिहार से जनता पार्टी और जनता दल के लोक सभा मेम्बर रहे।

तकरीबन तीन दहाइयों तक मुल्क व मिल्लत की सियासत पर छाए रहने वाले सैयद शहाबुद्दीन उधर अर्से से एक तरह गोशा नशीन थे और जो कौमी मीडिया एक जमाने में उनके खिलाफ आग उगलता था वह अब उनका जिक्र भी नहीं करता था। वह जितने बड़े रहनुमा थे उस हिसाब से उनके इंतकाल पर उन्हें उस तरह याद नहीं किया गया जिसके वह बहरहाल मुस्तहक थे। इसकी एक बड़ी वजह तो मुल्क में सियासत और मीडिया दोनों की गिरती हुई सतह है। बहर हाल यह मुसलमानों की जिम्मेदारी है कि उनकी फिक्र से नई नस्ल को रोशनास कराएं और उनकी तहरीरोें को जमा करके मंजरेआम पर लाएं।

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