असीमानन्द छूटे, संघियों की दहशतगर्दी साबित

असीमानन्द छूटे, संघियों की दहशतगर्दी साबित

जयपुर। मुल्क में नरेन्द्र मोदी की सरकार आने के बाद नेशनल इनवेस्टीगेशन एजेन्सी (एनआईए) की कमजोर पैरवी और गवाहान के बयान तब्दील कराकर समझौता एक्सप्रेस और अजमेर दरगाह में हुए बम धमाकों के मुकदमात में आर.एस.एस. के सीनियर लीडर नवकुमार सरकार उर्फ असीमानन्द को भले ही बचा लिया गया हो, देवेन्द्र गुप्ता, भावेश पटेल और मकतूल सुनील जोशी को सीबीआई के स्पेशल जज दिनेश गुप्ता ने अजमेर बम धमाके का मुजरिम करार देकर साबित कर दिया कि मुल्क में हो रहे दहशतगर्दी के वाक्यात में आर.एस.एस. कुन्बे के हिन्दुत्ववादी दहशतगर्द भी शामिल रहते हैं। सुनील जोशी को उन्हीं के साथी आर.एस.एस. प्रचारकों ने मध्य प्रदेश के देवास में कई साल पहले कत्ल कर दिया था, भावेश पटेल और देवेन्द्र गुप्ता दोनो आर.एस.एस. के सीनियर प्रचारक हैं। इन दोनो को क्या सजा दी जाए यह फैसला अदालत आइन्दा 16 मार्च को करेगी।

असीमानन्द बेगुनाह साबित नहीं हुए हैं उन्हें अदालत ने शक का फायदा देते हुए तकनीकी बुनियादों पर रिहा करने का फैसला किया है। असीमानन्द 18 फरवरी 2007 को समझौता एक्सप्रेस में हुए बम धमाके में भी मुल्जिम हैं जिसमें तकरीबन 75 मुसाफिर मारे गए थे। हैदराबाद की मक्का मस्जिद में हुए धमाके में भी वह मुल्जिम हैं। वह दिसम्बर 2010 में गिरफ्तार हुए तभी से जेल में हैं। समझौता एक्सप्रेस मामले में उन्हें जमानत मिल चुकी है। उन्हीं के बयान के बाद मक्का मस्जिद धमाके में गिरफ्तार बेगुनाह मुसलमानों को हैदराबाद की अदालत ने बाइज्जत बरी कर दिया था।

अजमेर दरगाह के अहाता-ए-नूर में 11 अक्टूबर 2007 को ठीक अफ्तार के वक्त एक बम धमाका हुआ था जिसमें दो रोजादारों की मौके पर ही मौत हो गई थी और एक शख्स की अस्पताल में मौत हुई थी। बीस से ज्यादा लोग जख्मी हुए थे। इस मामले की तहकीकात राजस्थान एटीएस को सौंपी गई थी, लेकिन बाद में तहकीकात एटीएस से लेकर एनआईए को देदी गई थी। एनआईए ने इस मामले में तीन सप्लीमेन्ट्री चार्जशीटे पेश की, जो 149 गवाह एनआईए ने पेश किए उनमें बेश्तर ऐसे निकले जिन्होंने असीमानन्द के खिलाफ दिए अपने बयान या तो तब्दील कर दिए या असल बयान से मुकर गए। कहते हैं इसके लिए आर.एस.एस. कुन्बे ने अपनी पूरी ताकत लगा दी। क्योंकि असीमानंद के खिलाफ सिर्फ अजमेर धमाके में ही गवाह नहीं मुकरे बल्कि समझौता एक्सप्रेस मामले में भी उनके खिलाफ गवाहों ने अपने बयान बदल दिए। अदालत कोई भी फैसला गवाही की बुनियाद पर करती है। अगर अदालत में बैठे जज को पता हो कि फला शख्स ही असल मुजरिम है लेकिन उसके खिलाफ कोई गवाह न हो तो भी जज ऐसे शख्स को सजा नहीं देता। असीमानंद के मामले में भी कुछ ऐसा ही दिखता है।

असीमानंद ने 18 दिसम्बर 2010 को दिल्ली के जज दीपक डबास के सामने दफा 164 के तहत जो बयान दर्ज कराया था, उसमें उन्होंने अपना जुर्म कुबूल किया था। उनका बयान जब दर्ज किया गया उस वक्त जज के साथ सिर्फ उनका स्टेनो और असीमानंद ही अंदर थे। इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता कि उन पर दबाव डालकर उनका बयान दर्ज कराया गया। अपने बयान में उन्होंने कहा कि 2002 में मंदिरों में बम धमाके हुए, जिसमें मुसलमानों के नाम आए, उन धमाकों ने मुझे बेचैन कर दिया। उसने बताया कि इस बारे में मैंने भारत भाई, प्रज्ञा सिंह और सुनील जोशी से जब बात की तो मेरी समझ में आया कि इन लोगों के भी ख्यालात मेरे ही जैसे है। इसके बाद 2006 में काशी के संकट मोचन मंदिर पर हुए हमले ने मुझे बेचैन कर दिया। असीमानंद ने अपने बयान में कहा कि काशी मंदिर में धमाके के बाद 2006 में भारत भाई, प्रज्ञा सिंह और सुनील जोशी शबरी धाम आए। यही तय हुआ कि इन धमाकों का जवाब देना चाहिए। मीटिंग के दौरान तय हुआ कि सुनील जोशी और भारत भाई झारखण्ड जाएंगे जहां से वह कुछ सिम कार्ड और पिस्टल वगैरह खरीदेंगे। असीमानंद ने बताया कि उसने उन लोगों को मश्विरा दिया कि गोरखपुर और आगरा भी चले जाना गोरखपुर जाकर आदित्यनाथ से मिलना और आगरा में राजेश्वर सिंह से मिलना और इस बारे में बात करना। मैंने यह सामान लाने के लिए सुनील जोशी को 25 हजार रूपए भी दिए थे, इसके बाद अप्रैल 2006 में दोनो लोग इसी काम के लिए निकल लिए।

इसके बाद अगली मीटिंग में सुनील जोशी, भारत भाई, प्रज्ञा सिंह और असीमानंद मिले। इस मीटिंग में तय हुआ कि मालेगांव में 80 फीसद मुसलमान रहते है इसीलिए यही से काम शुरू करे और पहला बम यही रखा जाए। इसके बाद असीमानंद ने कहा कि आजादी के बाद निजाम हैदराबाद ने पाकिस्तान जाने का फैसला किया था, इसलिए हैदराबाद को सबक सिखाने के लिए उसकी तारीखी मक्का मस्जिद में भी धमाका करना चाहिए। असीमानंद ने यह भी बताया कि उन लोगों ने तय किया कि चूंकि अजमेर की दरगाह में हिन्दू भी बड़ी तादाद में जाते है इसलिए एक बम वहां रखना चाहिए धमाके के बाद हिन्दू डर जाएंगे और वहां नहीं जाएंगे। असीमानंद ने जज को यह भी बताया कि उसने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में भी बम रखने का मश्विरा दिया था क्योंकि वहां पर जवान मुस्लिम लड़के होंगे। उसने बताया कि सभी लोगों ने उसका मश्विरा मान लिया और तय हुआ कि चारो जगहों पर बम धमाका किया जाएगा। इसके बाद सुनील जोशी ने चारो जगहों की रेकी की जिम्मेदारी ली साथ ही कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच चलने वाली समझौता एक्सप्रेस में सिर्फ पाकिस्तानी ही सफर करते है इसलिए समझौता एक्सप्रेस में भी धमाका करना चाहिए। इस धमाके की जिम्मेदारी भी खुद सुनील जोशी ने ली। सुनील जोशी ने बताया कि उसे झारखण्ड से हथियार तो मिल गए मगर आदित्यनाथ और राजेन्द्र सिंह से कोई मदद नहीं मिली। उसके दफा-164 के तहत दर्ज कराए गए इस इकबालिया बयान के बावजूद अदालत को वह बेकुसूर लगा और उसे छोड़ दिया गया।

अजमेर अदालत ने जिस भावेश पटेल और देवेन्द्र गुप्ता को इस धमाके के लिए कुसूरवार माना है वह दोनो ही आर.एस.एस. के फुल टाइमर (कुल वक्ती) प्रचारक है। तीसरा मुजरिम सुनील जोशी तो आरएसएस के काफी बड़े लीडरों में शामिल था। मध्य प्रदेश के देवास में उसको 2008 में कत्ल कर दिया गया था, जिसमें आर.एस.एस. की जेल में बंद साध्वी कही जाने वाली प्रज्ञा सिंह को भी कातिलों में शामिल बताया गया है। इस तरह इस फैसले से इतना तो तय हो गया कि बम धमाके और दहशतगर्दी करने में आर.एस.एस. के लोग भी आगे आगे रहते हैं।