ट्रम्प का पागलपन और इस्लामी दहशतगर्दी

ट्रम्प का पागलपन और इस्लामी दहशतगर्दी

अमरीका के नए सदर की हैसियत से डोनाल्ड ट्रम्प का मुंतखब किया जाना अमरीकी अवाम पर तो सवाल खड़े ही करता उनकी कामयाबी पूरी दुनिया के लिए एक नया खतरा बन गई है। ट्रम्प एक मामूली घर मंे पैदा हुए थे उनके आबा व अजदाद यूरोप से भाग कर अमरीका जाकर बसे थे। उनकी किस्मत अच्छी थी कि जिस किसी भी व्यापार में उन्होने हाथ लगाया मिट्टी सोना होने वाली कहावत के मुताबिक  उन्हें कामयाबी ही हासिल हुई। बराक ओबामा की तरह वह ज्यादा पढे लिखे नहीं हैं। व्यापार के मामले में अमरीका के चंद सबसे बड़े लोगों में शामिल होने के बाद  उन्हें मुल्क का सदर बनने का शौक पैदा हुआ तो वह उस कुर्सी तक भी पहुच गए। उनके सदर बनाए जाने से आम अमरीकियों पर दो सवाल जरूर खडे़ होते हैं एक यह कि दुनिया का सबसे मुहज्जब (सभ्य), तालीमयाफ्ता और जम्हूरियत पंसद देश होने का दावा करने वाले अमरीका के बेश्तर (अधिकांश) लोग न तो मुहज्जब हैं न पढे लिखे हैं न जम्हूरियत और इंसाफपसंद हैं और न ही अभी तक वह लोग ख्वातीन (महिलाओं) की इज्जत करना सीख पाए हैं।  ट्रम्प के मुुंतखब होने के पीछे एक बड़ी वजह यह भी है कि आज भी अमरीकी लोग किसी खातून को अपने सदर की हैसियत से बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं हैं। आठ साल कब्ल जब हिलेरी क्लिंटन ने सदारती एलक्शन लड़ने का फैसला किया तो अमरीकियों ने उनके मुकाबले एक स्याह फाम (अश्वेत) बराक हुसैन ओबामा को मुंतखब करना ज्यादा मुनासिब समझा और हिलेरी पार्टी के प्राइमरी एलक्शन में ही हार गईं। मुल्क की तारीख तब्दील हो गई और बराक ओबामा आठ साल तक मुल्क के सदर बने रहे। इस बार हिलेरी प्राइमरी एलक्शन में तो जीत गई लेकिन अस्ल एलक्शन में एक गैर सियासी शख्स डोनाल्ड  ट्रम्प के हाथों हार गई। ट्रम्प वैसे ही हैं जैसे कई माफिया सरगना अक्सर एलक्शन जीत लेते हैं।

अमरीका का सदर बनने के बाद डोनाल्ड ट्रम्प ने सात मुल्कों ईरान, इराक, सीरिया, सोमालिया, यमन, सूडान और लीबिया के लोगों के अमरीका जाने पर पाबंदी लगा दी। साथ ही क्रिश्चियन ब्राडकास्ट नेटवर्क को एक लम्बा इण्टरव्यू देते हुए उन्होने कह दिया कि दुनिया भर में अमरीका आने वाले ईसाइयों का वह न सिर्फ यह कि आगे बढकर खैरमकदम (स्वागत) करेंगे बल्कि उनकी हर मुमकिन मदद भी करेगे। उन्होने सऊदी अरब और पाकिस्तान के लोगों के अमरीका आने पर पाबंदी लगाने पर गौर करने के लिए भी कहा है। वह अमरीका के सदर बन गए हैं कम से कम चार साल तक तो उन्हीं की सरकार रहने वाली  है अपने मुल्क के मुबय्यना (कथित) मफाद में उन्हें कोई भी फैसला करने और पालीसी बनाने का पूरा अख्तियार है लेकिन अपने मुल्क की पालीसियां तब्दील करने के इरादे के साथ उन्होने दुनिया में इस्लाम बनाम ईसाईयत का टकराव पैदा करने और इस्लाम को दहशतगर्दी का मजहब करार देेने की जो मुहिम शुरू की है वह अमरीका समेत पूरी दुनिया के लिए इंतेहाई खतरनाक है। अभी तक इस सतह के ओहदों पर बैठे दुनिया भर के जिम्मेदार लोग मुस्लिम दहशतगर्दी तो कहते थे लेकिन इस्लामी दहशतगर्दी किसी ने नहीं कही इंतेहा यह कि फ्रांस में कम से कम तीन बड़े दहशतगर्दी के वाक्ए पेश आए तब भी फ्रांस ने पूरी दुनिया  की तरह यही कहा कि दहशतगर्दी को किसी मजहब से जोड़ा नहीं जाना चाहिए, कोई भी मजहब दहशतगर्दी की तालीम नहीं  देता है और जों लोग दहशतगर्दी में मुलव्विस होते हैं वह सिर्फ दहशतगर्द होते हैं  उनका किसी मजहब से ताल्लुक नहीं होता। हां खुद को बचाने के लिए वह अपने को किसी न किसी मजहब का मानने वाला जरूर बताते हैं। ट्रम्प ने यह हदें भी तोड़ दीं और सीधे इस्लमिक दहशतगर्दी कह दिया।

दहशतगर्दी का जहां तक ताल्लुक है दुनिया में यह काम तो सिर्फ और सिर्फ अमरीका ने ही शुरू किया। हकीकत यह है कि अमरीका से बड़ा दहशतगर्द तो दुनिया मंे आज तक पैदा ही नहीं हुआ। अमरीका ने ही ब्रिटेन के जरिए श्रीलंका में दहशतगर्दी को जनम दिया खुदकुश बम (सुसाइड बाम्बर) बनाने का तजुर्बा तो अमरीका ने ही श्रीलंका के तमिलों पर किया था। उसी के टेªण्ड किए हुए खुदकुश बमों ने राजीव गांधी की जान ले ली थी। अफगानिस्तान से सोवियत यूनियन का कब्जा खत्म कराने के लिए अमरीका ने आधे से ज्यादा अफगानियों और बड़ी तादाद में पाकिस्तानियों को दहशतगर्द बना दिया था। तालिबान किस ने पैदा किए क्या डोनाल्ड ट्रम्प इसका जवाब देंगे। अभी तो रिकार्ड मौजूद है कि पहली बार तालिबान लीडरान ने अमरीका का दौरा किया था तो अमरीकी पार्लियामेंट में उनकी तकरीरे कराई गई थीं। अमरीकी पार्लियामेंट मेम्बरान तालिबान सेे हाथ मिलाने के लिए इतने बेताब दिख रहे थे जैसे वह तालिबान होकर खुदा न खास्ता जीसस क्राइस्ट हों उस वक्त अमरीका ने पाकिस्तानी सदर जनरल जिया उल हक के साथ मिलकर पाकिस्तान में  दहशतगर्द पैदा करने की मुश्तरका (संयुक्त) फैक्ट्री ही लगा ली थी। फैक्ट्री को नाम दिया गया था लाल मस्जिद। लाल मस्जिद की दहशतगर्द फैक्ट्री में पैसा अमरीका का तो भटके और गुमराह किए जा चुके इंसानों का कच्चा माल जनरल लिया उल हक का हुआ करता था। लाल मस्जिद में टेªनिंग हासिल करके जब दहशतगर्दों के जत्थे अफगानिस्तान जाते थे तो उन्हें इस तरह रूखसत किया जाता था जैेसे वह इंसानियत की खिदमत के किसी सबसे बड़े मिशन पर जा रहे हों। लाल मस्जिद में टेªनिंग देने का काम पाकिस्तान और अमरीका दोनों मुल्कों के फौजी ही किया करते थे। जब तालिबान की समझ में आ गया कि अमरीका ने तो उन्हें इस्तेमाल करके अफगानिस्तान के मिनरल्स पर कब्जा करने का मंसूबा बनाया है वह अमरीका के खिलाफ हो गए नतीजा यह कि उन्हें फौरन दहशतगर्द बताकर अमरीका ने उन्हीं को मारना शुरू कर दिया। तीस साल से ज्यादा का वक्त गुजर गया। अफगानिस्तान में अमरीका आज तक अपने ही बनाए हुए मुबय्यना (कथित) दहशतगर्दों से लड़ ही रहा हैं।

ट्रम्प अगर पढना लिखना जानते हों तो रिकार्ड देख लें कि हिन्दुस्तान में दहशतगर्द पैदा करके उनके जरिए गड़बड़ियां कराने के लिए चंद बरस कब्ल डेविड हेडली और तहव्वुर राना को उन्हीं की बदनाम खुफिया एजेसी ने हिन्दुस्तान भेजा था या नहीं। आज खुद को मुसलमान बताकर आईएसआइएस के नाम पर सीरिया से ईराक और आधी अरब दुनिया में दहशतगर्दी करने वालों का बेशुमार असलहा अमरीकी   है या नहीं है? आखिर अमरीका यह असलहा उन लोगों को किस मकसद से सप्लाई कर रहा है? आईएसआईएस में शामिल जो भेड़िए इंसानों को जिबह करने की वहशी हरकतें करते रहते हैं उनमें कितने मुसलमान  हैं और कितने ब्रिटिश व अमरीकी ईसाई हैं जिन्होेने चंद रोज पहले ही  ईसाईयत छोड़कर इस्लाम मजहब कुबूल करने का ड्रामा किया है। ट्रम्प बताएं कि आखिर सीरिया और इराक में किसकी सजिशों पर दहशतगर्दी हो रही है?

दुनिया के सबसे बड़े  दहशतगर्द और तेल व मिनिरल्स समेत दुनिया की सारी दौलत पर कब्जा कर लेने का लालची अमरीका ही तो है जिसने इराकी सदर सद्दाम हुसैन पर इंसानियत तबाह करने वाला हथियार तैयार करने का झूटा इल्जाम लगा कर ब्रिटेन जैसे दुनिया के बेईमानों के साथ मिलकर इराक की ईंट से ईंट बजाने का सबसे बड़ा गुनाह किया। मकसद सिर्फ यह था कि इराक के तेल जखीरोें पर उसे कब्जा करना था। इराक के तेल पर अमरीका का मुकम्मल कब्जा हो गया। अमरीकी दहशतगर्दों ने सदर सद्दाम हुसैन को  फर्जी मुकदमा चला कर फांसी पर लटका दिया और पूरे इराक को खानाजंगी (गृहयुद्ध) की आग में झोंक कर बस तेल की ही चोरी किए जा रहा है। बाद मेें खुद अमरीकी और ब्रिटिश तहकीकाती कमेटी ने दुनिया के सामने रिपोर्ट पेश करके यह भी बता दिया कि सद्दाम हुसैन नेे इंसानियत की तबाही का कोई हथियार बनाया ही नहीं था। महज तेल पर डाका डालने के लिए अमरीका ने सद्दाम हुसैन के साथ करोड़ों इराकियों का कत्ल कर डाला। लाखों इराकी आज भी अमरीकी जेलों में जिंदगी और मौत के दरम्यान जंग कर रहे हैं। इराकी बेगुनाह हैं उन्हें गलत तरीके से जेलों में रखकर हर वक्त गैर इंसानी हरकतों का शिकार बनाया जा रहा है और इंतेहाई खतरनाक अजीयतें (यातनाएं) उन्हें दी जा रही हैं। लेकिन ट्रम्प का अमरीका ग्वाटीं माले बे जैसे अजीयतखाने (यातनागृह) बंद करके उन बेगुनाह इराकियों  को रिहा करने के लिए तैयार नहीं है।

इराक की तरह ही दुनिया के सबसे बड़े दहशतगर्द अमरीका ने लीबिया और उसके हुक्मरां कर्नल मुअम्मर कज्जाफी के साथ भी अपनी दहशतगर्दी दिखाई वजह वही एक है लीबिया में मौजूद बेशुमार तेल और बेशकीमती मिनिरल्स। कर्नल  कज्जाफी ने कोई पच्चीस बरस तक अमरीका के साथ ताल्लुक नहीं रखा। इस दौरान उन्होने अपने मुल्क और अवाम को दुनिया भर के मुल्कों से ज्यादा खुशहाल बना दिया था। कर्नल कज्जाफी के दौर मेें लीबिया के हर शख्स के खाने, कपड़े और मकान यहां तक कि कारों और मोटरसाइकिलों तक का बंदोबस्त सरकार ही किया करती थी। अमरीका ने चालबाज औरतों की तरह  कर्नल कज्जाफी को अपने जाल में फंसाया उन्हें दूसरे मुल्कों के दौरे पर बुलवाना शुरू किया और बमुश्किल दो सालों के अंदर ही उन्हें भी सदर सद्दाम हुसैन की तरह कत्ल कराकर लीबिया को भी खानाजंगी (गृहयुद्ध) की आग में झोक दिया। मिस्र के साथ भी अमरीकी शैतानों ने इसी किस्म का सुलूक किया। तेल और कीमती मिनिरल्स पर कब्जा कर पाने में अमरीका सीरिया और ईरान में ही कामयाबी हासिल नहीं कर सका तो सीरिया में आईएसआईएस पैदा करके पूरे मुल्क में कत्ल व गारत का बाजार गर्म कर रखा है। तकरीबन 38 सालों की कोशिशों के बावजूद अमरीका बस ईरान का कुछ बिगाड़ नहीं सका है। शायद उसका कुछ कर भी नहीं पाएगा। इन तल्ख हकायक के बावजूद अगर ट्रम्प इस्लामी दहशतगर्दी की बात कर रहे हैं तो यकीनन वह अपने दहशतगर्द किरदार का ही मजाहिरा कर रहे हैं। एक सख्त और तल्ख सवाल यह भी जिसका जवाब दुनिया में कोई नहीं दे रहा है वह यह कि अगर अमरीका को अपनी बेपनाह जंगी और मआशी (आर्थिक) ताकत के दम पर पूरी दुनिया में दहशतगर्दी करने और दुनिया की दौलत पर कब्जा करने की छूट है तो अमरीका के तबाह किए हुए इराक, लीबिया समेत दर्जनों मुल्कोें के परेशान लोगों के पास दहशतगर्दी के अलावा दूसरा कौन सा रास्ता है? दुनिया को भी इस सवाल का जवाब देना पड़ेगा।