तहज्जुद की नमाज

तहज्जुद की नमाज

मौलाना यासिर नासिरी

शब बेदारी खुसूसन रात के आखिरी हिस्से में अल्लाह की इबादत में मशगूल रहना और नमाज की अदाएगी अफजल तरीन अमल है और फर्ज नमाजों के बाद इस नमाज का मकाम बेहद बुलंद व बाला है। अल्लाह के कुर्ब का हुसूल इस नमाज के जरिए बड़ी आसानी से होता है। कुरआने करीम में अल्लाह तआला अपने बंदों को जन्नत की बशारत देता है जिसका हाल यह होता है कि उनके पहलू ख्वाबगाहों से जुदा रहते हैं वह अपने रब को उम्मीद और खौफ से पुकारते हैं और हमारी दी हुई चीजों में से खर्च करते हैं। (अल सजदा)

नबी करीम (सल0) को नबुवत के आगाज में ही यह हुक्म दिया गया था कि रात को नमाज में खडे़ रहा कीजिए मगर थोड़ी रात यानी निस्फ रात (कि उसमें  कयाम न कीजिए बल्कि आराम कीजिए) या इस निस्फ से किसी कदर कम कर दीजिए या कुछ बढा दीजिए। (अल मुजम्मिल)

और फिर इस नमाज और शब बेदारी का फायदा यह है कि रात का उठना नफ्स पर काबू पाने के लिए बहुत कारगर और कुरआन ठीक पढने के लिए ज्यादा मौजूं है। (अल मुजम्मिल) यानी उस वक्त दिल व जबान का खूब मेल होता है और जबान से बात बिल्कुल दुरूस्त निकलती है दिमाग यकसू रहता है। दिल मुत्मइन रहता है और अक्ल बेदार रहती है और जबान से निलकने वाली बात तीर निशाने पर लगने के मिसदाक होती है। इसलिए इस हुक्म के मुताबिक अल्लाह के रसूल (सल0) ने शब बेदारी को लाजमी और मामूल बना लिया और रिवायात के मुताबिक आप (सल0) रातों को इतनी लम्बी और ज्यादा इबादतें करते थे कि कयाम की दराजी की वजह से आप (सल0) के पैरों में वारम आ जाता था। फिर आप (सल0) की इत्तबा में सहाबा ने भी शब की इबादत शुरू की और इस इबात की लज्जत व हलावत उनको महसूस हुई कुरआन उन्हीं के जिक्र में कहता है कि वह रातों को कम ही सोते थे और रात के पिछले पहरों में माफी मांगते थे। (अल जारियात)

अहादीस से मालूम होता है कि रात के आखिरी हिस्से अल्लाह ताआला अपनी मखसूस रहीमाना शान के साथ अपने बंदों की तरफ मुतवज्जो होता है और इरशाद फरमाता है कि कौन है जो मुझ से दुआ करे और मैं उसकी दुआ कुबूल करूं कौन है जो मुझ से मांगे और मैं उसे अता करूं कौन हैस जो मुझ से बख्शिश चाहे और मैं उसको बख्श दूं। (बुखारी, मुस्लिम)

जो लोग इस हकीकत पर यकीन रखते हैं उनके लिए इस वक्त सोना मुश्किल हो जाता है और वह उठकर इबादत में मशगूल हो जाते हैं। एक हदीस में नमाजे तहज्जुद की चार खुसूसियात बयान की गई हैं। 1. यह जमाना कदीम से नेक बंदों का तरीका रहा है। 2. यह कुर्बे खुदावंदी का खास जरिया है। 3. यह गुनाहों का कफ्फारा और उनके असरात का इजाला है। 4. यह नमाज बुराई से रोकती है। (जामे तिरमिजी)

कुरआने करीम में बनी करीम (सल0) को मुखातिब करके फरमाया गया है कि आप रात को तहज्जुद पढा कीजिए यह हुक्म आपके लिए जायद और मखसूस है बईद नहीं कि आप का रब आप को मकामे महमूद पर फायज कर दे। मकामे महमूदा आलमे आखिरत और जन्नत का आलातरीन मकाम है। यह आयत वाजेह कर रही है कि मकामे महमूद और नमाजे तहज्जुद में खास रब्त है इसलिए जो बंदे नमाजे तहज्जुद का एहतमाम करते हैं उन्हें किसी न किसी दर्जे मंे मकामे महमूद में नबी करीम (सल0) की रफाकत की सआदत जरूर नसीब होगी।

इमाम इब्ने अल कीम ने लिखा है कि चार चीजें फरावानी रिज्क का बाइस होती हैं। 1. रात की नमाज 2.आखिर शब में कसरत से इस्तगफार 3. सदकात व खैरात की पाबंदी 4. दिन के शुरू व आखिरी हिस्से में जिक्र का एहतमाम।