आजाद हिन्द फौज का आखिरी सिपाही ना रहा

आजाद हिन्द फौज का आखिरी सिपाही ना रहा

”नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के मुहाफिज कर्नल निजामउद्दीन का 117 साल की उग्र मंे इंतकाल“

 

आजमगढ! नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के ड्राइवर व बाडीगार्ड रहे आजाद हिन्द फौज के मजबूत सिपाही  निजाम उद्दीन जिन्हें सुभाष चन्द्र बोस कर्नल कहते थे नहीं रहे। 117 साल की उम्र में उनका इंतकाल 6 फरवरी को उनके आबाई वतन ठकवा में हो गया। उन्हें गांव के नजदीक ही कब्रस्तान में सुपुर्दे खाक किया गया। उनकी बीवी अजबुन्निशां की उम्र 107 बरस है। कर्नल निजाम उद्दीन उर्फ सैफुद्दीन इतनी उम्र होने के बावजूद सियासत के लिए बेदार जेहन रखते थे। वह न सिर्फ 2016 में अपना और अपनी बीवी का खाता खुलवाने वाले सबसे उम्रदराज बल्कि सबसे उम्रदराज वोटर भी बने। वोटरों को बेदार करने के लिए जनवरी में जिला इंतजामिया ने उनका एक आडियो पैगाम भी रिकार्ड किया था। वह नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फौज के आखिरी सिपाही थे। निजाम उद्दीन भी दूसरे कई लोगों की तरह चयह मानने को तैयार नहीं थे कि सुभाष चन्द्र बोस की हवाई हादसे में मौत हो गई थी।

लोक सभा चुनाव के दौरान चूंकि नरेन्द्र मोदी हर तरह की ड्रामेबाजी कर रहे थे उसी के तहत 8 मई 2014 को रोहनिया में अपनी चुनावी रैली की शुरूआत   नरेन्द्र मोदी ने कर्नल निजाम उद्दीन के पैर छूकर की थी और कहा था कि कर्नल उन्हें 80 किलोमीटर दूर से चलकर आशीर्वाद देने आए हैं। लेकिन उस दिन के बाद से उन्होने  कर्नल निजाम उद्दीन की कोई खबरगीरी करना तो दूर कर्नल निजाम उद्दीन के इंतकाल पर उनके घर पहुचकर उनकी तदफीन में शामिल होना भी जरूरी नहीं समझा। यही नहीं उन्होेने किसी तरह का कोई ताजियती पैगाम भी नहीं भेजा। बीजेपी के उत्तर प्रदेश इंचार्ज ओम प्रकाश माथुर और प्रदेश सदर केशव मौर्या ने जरूर अपने ताजियती पैगाम में उनके इंतकाल को नाकाबिले तलाफी नुक्सान बताया। कर्नल निजाम उद्दीन का नाम पिछले साल ही सबसे उम्रदराज वोटर में शामिल किया गया था उनकी ख्वाहिश कि वह 2017 के असम्बली एलक्शन में वोट डालते अधूरी रह गई। उन्होने जनवरी में रिकार्ड एक आडियो पैगाम के जरिए सभी लोगों से वोट डालने की अपील की थी। इससे पता चलता है कि उनको मुल्क की कितनी फिक्र थी। उनके बेटों अनवर और अकरम ने बताया कि उनके वालिद की तदफीन के मौके पर मकामी सियासतदां और जिला व पुलिस इंतजामिया के अफसरान ही शरीक हुए चुनाव में मसरूफ किसी बड़े लीडर ने उनके वालिद के इंतकाल के बाद घर आना तो दूर ताजियत करने की भी जहमत गवारा नहीं की।

मुबारकपुर गांव के ठकवा मे जनवरी 1900 में पैदा होने वाले निजामउद्दीन मुल्क की आजादी के ख्वाहां थे और इसीलिए वह नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फौज में शामिल हो गए। अपनी दिलेरी और वफादारी की बदौलत उन्होने बहुत जल्द सुभाष चन्द्र बोस से कुर्बत हासिल कर ली जो इस कदर बढ गई कि सुभाष चन्द्र बोस जिन दो-चार लोगों पर सबसे ज्यादा भरोसा करते थे निजामउद्दीन उनमें से एक थे। निजामउद्दीन की दिलेरी और वफादारी से सुभाष चन्द्र बोस इतना मुतास्सिर थे कि उन्हें अपना राजदार, बाडी गार्ड और ड्राइवर बना लिया था। निजाम उद्दीन ही वह शख्स थे जिन्होेने आखिरी बार सुभाष चन्द्र बोस को देखा था और वह नेताजी को  गुमनामी बाबा से जोड़ने वाली अहम  कड़ी थे। निजाम उद्दीन  का कहना था कि 18 अगस्त 1945 को ताई होलू हवाई हादसे मेें  नेताजी की मौत होने की कहानी ख्याली है क्योंकि 20 अगस्त 1945 को उन्होनेे खुद नेताजी को म्यामांर की सितांग नदी के किनारे पर छोड़ा था।

पिछले दिनांे नेताजी की परपोती राज्य श्री चैधरी ने निजाम उद्दहल से मुलाकात करके अपने परदादा सुभाष चन्द्र बोस के बारे में जानना चाहा तो निजाम उद्दीन ने उनसे कहा कि  वह कभी भी उस मुलाकात को भूल नहीं सकते। उन्होने राज्य श्री को बताया था कि बर्मा-थाईलैण्ड के बार्डर पर सीतांग नदी के पास कार से उतारा था वह खुद भी उनके साथ जाना चाहते थे मगर नेताजी ने यह कहकर वापस भेज दिया था कि अब  आजाद भारत में मुलाकात होगी। उसके बाद से नेताजी से उनकी कोई मुलाकात नहीं हुई। मरते दम तक  उनके पास आजाद हिन्द फौज का आई कार्ड था। यह बात बहुत कम लोग  जानते हैं कि निजाम उद्दीन को कर्नल का लकब (उपाधि) खुद नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने दिया था। इस वाक्ए के बारे में बताया जाता है कि वह 1944 में ब्रिटिश आर्मी के खिलाफ बर्मा (अब म्यामांर) में लड़ रहे थे। एक जंगल में लड़ाई के दौरान नेताजी को बचाने के दौरान निजाम उद्दीन अंग्रेजों की गोल से जख्मी हो गए थे। उस वक्त डाक्टर लक्ष्मी सहगल ने चाकू गर्म करके उन्हें बेहोश किए बगैर उनकी पीठ से गोली निकाली थी। तब जिस हिम्मत के साथ उन्होनेे दर्द बर्दाश्त किया था उसे देखते हुए अपने इस जाबांज सिपाही को कर्नल के नाम से मुखातिब किया था। कर्नल निजाम उद्दीन वह आखिरी शख्स थे जो आजाद हिन्द फौज से जुड़े थे। अब उनके बाद आजाद हिन्द  फौज और नेताजी का कोई भी साथी नहीं बचा है।

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