राहुल को कांग्रेस बदहाल पंसद है

राहुल को कांग्रेस बदहाल पंसद है

लखनऊ! अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और कांगे्रस का उत्तर प्रदेश मंे असम्बली एलक्शन से पहले गठजोड़ कर लिया 29 जनवरी को अखिलेश और राहुल गांद्दी ने मुश्तरका प्रेस कांफ्रेंस करके इस नए गठजोड़ का एलान किया। नारा दिया गया ‘यूपी को यह साथ पसंद है’। जमीनी हकीकत से बेखबर हवा मंे उड़ने वाले कांगे्रसियों और अखिलेेश के समाजवादियों ने बगलें बजाना शुरू कर दिया कि बस अब तो यह दोनों मिलकर उत्तर प्रदेश फतेह कर लेगें और अखिलेश दुबारा प्रदेश के चीफ मिनिस्टर बनेंगे।

जिस दिन लखनऊ में राहुल गांद्दी एक होटल में बैठकर अखिलेश यादव के साथ अपनी पार्टी के गठजोड़ को गंगा-जमुना का संगम बता रहे थे ठीक उसी वक्त लखनऊ से हजारों किलोमीटर के फासले पर बंगलौर में 84 साल के सीनियर कांगे्रस लीडर एस एम कृष्णा यह कह कर पार्टी छोड़ने का एलान कर रहे थे कि अब कांग्रेस को अवाम पर असर रखने वाले लीडरों की नहीं मैनेजरों की जरूरत है। एसएम कृष्णा कर्नाटक कांग्रेस के रियासती सदर 1999 से 2004 तक वजीर-ए-आला और उसके बाद मरकज में वजीर रह चुके हैं। कर्नाटक के बोकालिंगा तबकांे में एसएम कृष्णा का गहरा असर है। अगले साल कर्नाटक असम्बली का एलक्शन होना है कृष्णा का पार्टी छोड़ना पार्टी को मंहगा पड़ सकता है।

भले ही राहुल गांद्दी और अखिलेश यादव की तस्वीरों के साथ ‘यूपी को यह साथ पसंद है’ जैसा नारा लिखकर दोनों एक दूसरे के साथ गले मिले हों अगर इस गठजोड़ और उससे पहले के सियासी हालात पर एक नजर डाली जाए तो ऐसा महसूस होता है कि इस वक्त ‘राहुल को कांगे्रस बर्बाद पसंद है’ का नारा ही मुनासिब तरीन नारा है। गुजिश्ता तकरीबन  एक साल से राहुल गांद्दी की पहल पर ही प्रदेश भर के कांग्रेसी वर्कर्स जिस अंदाज में जोश व खरोश के साथ सड़कों पर निकल कर पार्टी को जिंदा करने का काम किया था अगर कांगे्रस अकेले एलक्शन मैदान में उतरती तो शायद अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के बराबर है 60 से 80 तक सीटें जीत सकती थी। गठजोड़ में अखिलेश ने जो 105 सीटें कांग्रेस कोे दी उनमें सेे भी 26 पर अपने उम्मीदवार भी उतार दिए हैं। यह गठजोड़ करते वक्त कांगे्रस लीडरान ने 2009 के लोक सभा एलक्शन पर भी गौर नहीं किया। उस वक्त मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी के साथ कांगे्रस के गठजोड़ की कोशिश हुई थी मुलायम किसी भी हालत में कांगे्रस को 18.20 से ज्यादा सीटें देने के लिए तैयार नहीं हुए थे। कांगे्रस 25.30 सीटों तक मानने के लिए तैयार थी लेकिन मुलायम सिंह यादव 25 सीटें देने के लिए भी तैयार नहीं हुए। दोनो अलग-अलग एलक्शन मैदान में उतरे तो समाजवदी पार्टी ने 23 और कंाग्रेस 21 सीटें जीत लीं। फीरोजाबाद लोक सभा हलके के बाई एलक्शन में राज बब्बर ने जीतकर कांगे्रस की सीटंे समाजवादी के बराबर 22 पर पहुचा दी थीं।

मौजूदा गठजोड़ की जो भी बातचीत कांगे्रस और समाजवादी पार्टी के दरम्यान हुई उसके लिए बताया गया कि राहुल गांद्दी के साथ प्लाण्ट किए गए नरेन्द्र मोदी के पुराने वफादार प्रशांत किशोर जैसे मैनेजर और प्रियंका गांद्दी के नुमाइदे बताए जाने वाले द्दीरज श्रीवास्तव ने ही अखिलेश और उनकी टीम के साथ सारी बातचीत की। यह दोनोें सियासी लोग नहीं हैं। इसीलिए आद्दी-अद्दूरी बातचीत की बुनियाद पर ही समझौते का महल खड़ा करा दिया जो एक ही झटके में गिर कर तबाह हो सकता है। एसएम कृष्णा के मुताबिक पार्टी ने पुराने सियासतदानांे के बजाए मैनेजरों पर ज्यादा भरोसा किया। मैनेजरों ने यह तो तय कर लिया कि अखिलेश की समाजवादी पार्टी 224 सीटों पर और कंाग्रेस 105 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करेंगी लेकिन यह सीटें कौन-कौन सी होंगी यह तय नहीं किया । शायद बातचीत करने वाले मैनेजरों को पता भी नहीं था कि सीटों की शिनाख्त पहले ही करके बातचीत को आगे बढ़ाया जाना चाहिए था। नतीजा यह हुआ कि सोनिया गांद्दी की रायबरेली और राहुल की अमेठी लोक सभा सीटों की दस असम्बली सीटों का फैसला आखिरी वक्त तक नहीं हो सका। समाजवादी पार्टी ने 224 उम्मीदवार खड़े कर दिए यानी अपने हिस्से से 27 ज्यादा, उन्हें भी आखिरी वक्त तक हटाया नहीं गया।

जिन अहम सीटों पर समाजवादी पार्टी ने आखिरी वक्त में पर्चा नामजदगी दाखिल कराया उनमें बरेली शहर, बिजनौर जिले की चांदपुर, लखीमपुर जिले की पलिया, मुजफ्फरनगर की पुरकाजी, अलीगढ की  कोल, मथुरा की बल्देव के अलावा अमेठी, रायबरेली की ऊंचाहार और गौरीगंज सीटें शामिल हैं। पुरकाजी से कांग्रेस के दीपक कुमार उम्मीदवार हैं वहां समाजवादी पार्टी की उमा किरण आ गईं, कोल अलीगढ से कांगे्रस के विवेक बंसल के सामने समाजवादी पार्टी के अज्जू इसहाक, मथुरा की बल्देव सीट से कांगे्रस के विनेश सोनवाल के सामने समाजवादी पार्टी के रणवीर सिंह द्दनगर तो पलिया से कंाग्रेस के सैफ अली नकवी के खिलाफ समाजवादी पार्टी के अनीता यादव मैदान में थीं। अमेठी से समाजवादी पार्टी के गायत्री प्रजापति, ऊंचाहार से मनोज कुमार पाण्डेय और गौरीगंज से राकेश प्रताप सिंह उम्मीदवार के तौर पर आखिरी वक्त तक बने रहे।

कांग्रेस की तरफ से किसी सियासी समझबूझ वाले लीडर के बजाए मैनेजरों ने अखिलेश से सीटों की बातचीत की तो अखिलेश के पीछे बैठे शातिर दिमाग रामगोपाल वगैरह ने कांग्रेस मैनेजरों को एक चैथाई रिजर्व सीटों समेत वही तमाम सीटें थमा दीं जहां समाजवादी और कांगेे्रस दोनों का जीत पाना बहुत मुश्किल काम है। लखनऊ की कैण्ट, रामपुर की स्वारटांडा, सहारनपुर की देवबंद सीटें पिछली बार कांग्रेस के पास थीं इस बार बातचीत के दौरान ही तीनों पर समाजवादी पार्टी ने अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए। तीनों पर उम्मीदवार ऐसे जिनके हटने का कोई सवाल नहीं। रामपुर की स्वारटांडा से आजम खान के बेटे अब्दुल्लाह को कैण्ट लखनऊ से मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अपर्णना यादव और देवबंद से कांग्रेस के ही जीते हुए मुआविया अली को तोड़कर समाजवादी पार्टी ने अपना  उम्मीदवार बना दिया।

अगर मैनेजरों के हाथ में यह काम न होकर किसी सियासतदां के हाथों में होता तो समझोते की बातचीत में सबसे पहले कांग्रेस पिछले एलक्शन में जीती हुई अपनी सीटों के साथ वह सीटें भी ले लेती जहां पार्टी के उम्मीदवार दूसरे नम्बर पर थे। इन दोनांे तरह की सीटों के बाद यह देखा जाता कि किस सीट पर किस पार्टी का ज्यादा फायदा इस वक्त हो सकता है। मैनेजरों ने 105 की गिनती पर ही समझौता कर लिया। यह दीगर बात है कि आम लोगों खुसूसन मुसलमानों में कांग्रेस का रूझान ज्यादा होने की वजह से कांगे्रस के अब भी 30 से चालीस तक सीटें जीतने की पूरी उम्मीद है। अखिलेश यादव भी 70 से 80 तक सीटंे ही जीत पाएंगे। अगर कांगे्रस अलग अकेले लड़ती तो 80 से 90 तक सीटें खुद ही जीत सकती थी। वजह यह है कि इस बार उत्तर प्रदेश में किसी भी पार्टी की कोई लहर नहीं है।

राहुल गांद्दी की खाट सभाओं बलिया से दिल्ली तक यात्रा 27 साल यूपी बेहाल नारे के तहत जिले जिले में पार्टी के प्रोग्रामों आखिर में राहुल संदेश यात्राएं और जिला सतह की मीटिंगों में कांग्रेेस वर्कर्स, लीडरों और असम्बली एलक्शन लड़ने के ख्वाहिशमंद लीडरान ने दस हजार से दस लाख रूपए तक पार्टी पर खर्च कर दिए बरेली के एक शख्स ने तो शुरू से आखिर तक तकरीबन तीस लाख रूपए पार्टी के प्रोग्रामों पर खर्च कर दिए। आखिर मंे राहुल गांद्दी ने अखिलेश के साथ महज 105 सीटे लेकर गठजोड़ कर लिया। मतलब यह कि एक ही झटके मंे तीन चैथाई सीटों के वर्कर्स और लीडरान को घर बिठा दिया गया। 2019 के लोक सभा एलक्शन के लिए पार्टी को डेढ साल बाद से ही मैदान में उतरना पड़ेगा जिन तीन चैथाई वर्कर्स और लीडरान को इस वक्त मायूस करके घर बिठा दिया गया है डेढ साल बाद ही वह दुबारा पार्टी के लिए क्यों कैसे और किस उम्मीद से मैदान में उतरेेंगे? अखिलेश यादव 2019 तक कांगे्रस और राहुल गंाद्दी के साथ ही रहेंगे इसकी भी कोई गारण्टी नहीं है। इसकी दो वजहें हैं एक यह कि ‘जो न हुआ अपने बाप का वह क्या होगा आपका’ दूसरे आरएसएस हामी मीडिया ने अखिलेश के इतनी हवा भर दी है कि 2019 में वह खुद ही वजीर-ए-आजम बनने का ख्वाब देखने लगे हैं। उन्हें यह कहकर चढाया गया है कि 2019 में इलाकाई पार्टियों की मिली जुली सरकार बनेगी उसमें उन्हीं का चेहरा सबसे आगे रहेगा और वह मुल्क के वजीर-ए-आजम बन जाएंगे।