राहुल-अखिलेश गठजोड़ में चालाकियां

राहुल-अखिलेश गठजोड़ में चालाकियां

लखनऊ! समाजवादी पार्टी के लीडर अखिलेश यादव और कांग्रेस के नायब सदर राहुल गांधी के दरम्यान भले ही इंतखाबी गठजोड़ हो गया है सुनने में अच्छा लगने वाला नारा भी दोंनो की तस्वीरों के साथ चस्पा कर दिया गया जिसमें लिखा था ‘यूपी को यह साथ पसंद है’। शहरों तक महदूद (सीमित) हो चुके मीडिया ने इस गठजोड़ की तारीफों में खूब ढोल भी पीट दिया। फौरन ही एक एजेंसी ने अपने सर्वे का नतीजा भी आम कर दिया और कहा कि अखिलेश-राहुल गठजोड़ को 403 में से 197 से 202 तक सीटें मिलेंगी। अब सवाल यह है कि क्या पार्टियों की तरह दोनों लीडरान के दिल भी मिल गए हैं? क्या सिर्फ सत्ता और ओहदे के लिए अपने वालिद और चचा तक को ठुकराने वाले अखिलेश यादव असम्बली एलक्शन में कांगे्रस से भरपूर फायदा उठाने के बाद राहुल गांधी, कांगे्रस और उसके साथ किए गए गठजोड़ के लिए भी वफादार रहेंगे। दोनों लीडरान की मुश्तरका प्रेस कांफ्रेस देखकर तो ऐसा नहीं लगता कि दोनों एक साथ ज्यादा दिनों तक रह सकंेगे। मीडिया नुमाइंदों ने कई बार अखिलेश यादव से सीधा सवाल किया कि जिस तरह राहुल गांधी ने 2017 के एलक्शन में आपको अगला चीफ मिनिस्टर प्रोजेेक्ट करके समझौता किया है क्या आप भी उन्हें 2019 में प्राइम मिनिस्टर की तरह प्रोजेक्ट करके एलक्शन लड़ेंगे? अखिलेश ने इस सवाल का जवाब नहीं दिया। वह साफ जवाब दे भी नहीं सकते थे क्योंकि चुनाव निशान और पार्टी की लड़ाई अपने वालिद से जीतने के बाद वह गरूर (घमण्ड) के पहाड़ पर चढ चुके हैं। अब तो वह खुद ही 2019 में मुल्क का वजीर-ए-आजम बनने का ख्वाब देखने लगे हैं। आरएसएस और बीजेपी के एजेण्ट उनके इर्द-गिर्द जमा हंै उन्होने अखिलेश के दिमाग में यह खन्नास भर दिया है कि 2019 मंे इलाकाई  पार्टियों की मखलूत (मिलीजुली) सरकार बनेंगी उसके लिए उनसे बेहतर चेहरा किसी दूसरे का है ही नहीं। अखिलेश इस झांसे में आ भी चुके दिखते हैं।

मुसलमानों से धोकाः-अखिलेश यादव ने सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम वोटों के लिए कांगे्रस के साथ गठजोड़ किया है। पहले तो उन्होेने अपने मेनिफेस्टो में मुसलमानों की फलाह व बहबूद (कल्याण) के लिए कोई वादा नहीं किया। राहुल के साथ उनकी मुश्तरका प्रेस कांफ्रेंस में साफ सवाल हुए कि अगली बार भी सरकार बनने की सूरत में मुसलमानों के सिलसिले में उनका क्या एजेण्डा है? इस सवाल  का उन्होनेे जवाब तक देना मुनासिब नहीं समझा। वह जवाब दे भी नहीं सकते क्योंकि अपने चचेरे चचा रामगोपाल यादव की हिदायत पर ही पाच साल की सरकार के दौरान  उन्होने मुसलमानों को सिर्फ बेवकूफ बनाया है उनके लिए कोई ठोस काम नहीं किए। वह मुसलमानों के वोट तो लेना चाहते हैं लेकिन अपने वालिद मुलायम सिंह यादव की तरह खुद को मुसलमानों का हामी और हमदर्द होने का मैसेज नहीं देना चाहते। वह इस गलतफहमी में भी हैं कि उत्तर प्रदेश के सवर्णों में भी वही सबसे ज्यादा मकबूल (लोकप्रिय) हो चुके हैं।

अखिलेश यादव मुस्लिम मुखालिफ हैं, मुसलमानों को सिर्फ धोके में रखते हैं यह बात तो खुद उनके वालिद मुलायम सिंह यादव ही बड़ी सफाई के साथ चंद दिन पहले कह चुके हैं। मुलायम सिंह यादव ने तो यह भी बता दिया कि उन्होने एक मुसलमान आफीसर (रिजवान अहमद) को डीजी पुलिस बनवा दिया था तो अखिलेश यादव को उनका यह फैसला इतना नागवार गुजरा था कि छः महीनों तक अखिलेश ने उनसे मुलाकात नहीं की थी। अब अखिलेश के वालिद के दिए हुए इस सर्टीफिकेट के बाद किसी के कुछ कहने सुनने की जरूरत नहीं है।

राहुल गांधी ने अखिलेश यादव के साथ मुश्तरका प्रेस कांफ्रेंस करके दोनों पार्टियों के इंतखाबी गठजोड़ का एलान कर दिया। अखिलेश ने फौरन ही चालाकी दिखाते हुए लखनऊ मंे ही राहुल को रोड शो करने के लिए तैयार कर लिया। यह रोड शो काफी कामयाब भी रहा। इस रोड शो से पहले और बाद में अखिलेश अलग-अलग जिलों का दौरा भी कर रहे हैं। खबर लिखे जाने तक वह लखीमपुर और बुलंदशहर समेत तकरीबन एक दर्जन जिलांे का दौरा कर चुके थे। हर जिले में उन्होने सिर्फ उन्हीं असम्बली हलकांे में अवामी मीटिंग की जिन असम्बली हलकांे में उनके अपने उम्मीदवार मैदान में थे। लखीमपुर जिले की दो सीटें पलिया और मोहमदी कांगे्रस के हिस्से में हैं इसी तरह बुलंदशहर की स्याना और खुर्जा सीटों पर कांगे्रस के  उम्मीदवार हैं। इन हलकों मंे मीटिंग करने की जरूरत उन्होनेे नहीं समझी। अगर दोनों पार्टियां मिलकर एलक्शन लड़ रही हैं तो फिर सिर्फ अपने ही उम्मीदवारों के लिए मीटिंग करने और कांग्रेस उम्मीदवारों को नजर अंदाज करने का क्या मतलब है?

राहुल गांधी को शायद अखिलेश यादव की चालाकियांे का अंदाजा पहले ही हो चुका था इसीलिए मुश्तरका प्रेस कंाफ्रेस को उन्होने मुकम्मल तौर पर अपने ही कण्ट्रोल मंे रखा। इस हकीकत के बावजूद कि लखनऊ के मीडिया नुमाइंदों को खुद अखिलेश यादव और उनके तर्जुमान वजीर राजेन्द्र चैधरी बहुत अच्छी तरह से जानते और पहचानते हेैं वह दोनों लखनऊ के मीडिया नुमाइंदों मे किस की क्या अहमियत है इस बात से भी बखूबी वाकिफ हैं। इसके बावजूद राहुल गांधी और उनकी पार्टी के लोगों ने प्रेस कांफ्रेंस कण्डक्ट करने का काम राजेन्द्र चैधरी या समाजवादी पार्टी के किसी दूसरे शख्स के हाथों में नहीं दिया। यह काम दिल्ली से आए कांगे्रस मीडिया डिपार्टमेंट के चीफ सुरजेवाला के हाथों मंे ही रखा। दूसरे सवालात और जवाब के दौरान अचानक राहुल गांधी ने माइक अपनी तरफ किया और बीएसपी सुप्रीमो मायावती व पार्टी कायम करने वाले मरहूम कांशीराम की तारीफें शुरू कर दीं तो बराबर में बैठे अखिलेश यादव के चेहरे का रंग ही तब्दील हो गया।

अखिलेश यादव को अपने बराबर बिठाकर राहुल गांधी ने कहा कि वह मायावती की जाती तौर पर बहुत इज्जत करते हैं वह कांशीराम साहब से भी मिलते रहे हैं उनकी भी वह बहुत इज्जत व एहतराम (सम्मान) करते थे। राहुल ने कहा कि मायावती दूसरों (बीजेपी लीडरों) की तरह समाज, प्रदेश और देश मंेे नफरत फैलाने और तकसीम करने का काम नहीं करती हैं वह यह काम कर भी नहीं सकती हैं। उनकी इसी खूबी की वजह से हम उनका  एहतराम (सम्मान) और इज्जत करते हैं। अब हालात ऐसे हैं कि वह हमारे गठजोड़ मंे शामिल नहीं हो सकतीं। इसके बावजूद फिरकापरस्त ताकतों को रोकने में वह भी हमेशा मजबूती केसाथ खड़ी नजर आती हैं। अखिलेश यादव को इस बात का जर्रा बराबर गुमान भी नहीं था कि उनके बराबर बैठ कर राहुल इस तरह मायावती की तारीफें शुरू कर  देंगे। इससे पहले जब एक मीडिया नुमाइंदे ने यह कहते हुए सवाल किया था कि अखिलेश आप तो मायावती को बुआ कहते रहे हैं अगर इस गठजोड़ वह भी शामिल होती तो शायद गठजोड़ में ज्यादा ताकतवर होता अखिलेश ने कहा था अब काफी दिनों से मैं उन्हंे बुआ नहीं कहता हूं। अखिलेश इतना कह कर ही खामोश हो गए थे।

इस गठजोड़ को फौरन ही एक बड़ा झटका उस वक्त लग गया था जब अखिलेश के वालिद मुलायम सिंह यादव ने उसी दिन शाम को दिल्ली पहुचकर एलान कर दिया था कि वह इस गठजोड़ के खिलाफ हैं। उन्होने अपने पुराने साथियों से कहा कि वह कांगे्रस  उम्मीदवारों के खिलाफ आजाद या लोकदल के उम्मीदवार की हैसियत से एलक्शन मैदान में उतरें। मुलायम सिंह यादव ने कहा कि अखिलेश ने उनके नजदीकियांे  को टिकट नहीं दिए हैं। वह लोग घर में तो नहीं बैठ सकते वह एलक्शन लड़ेगे और जरूरत हुई तो अपने लोगों के लिए वोट मांगने मैं खुद भी कई हलकों का दौरा करूंगा। खबर है कि मुलायम को ज्यादा नाराजगी इस वजह से है कि कांग्रेस के साथ गठजोड़ करने से पहले अखिलेश ने  उनसे मश्विरा नहीं किया और मुश्तरका प्रेस कांफ्रेंस व रोड शो के बाद अखिलेश अपने साथ राहुल को लेकर उनसे आशीर्दवाद लेने नहीं गए। अखिलेश यादव और राहुल गांधी कितनी भी मेहनत क्यों न कर लें अगर मुलायम सिंह यादव ने कुछ जिलों का दौरा गठजोड़ उम्मीदवारों के खिलाफ कर लिया तो वह इस गठजोड़ का खेल खराब कर सकते हैं। अखिलेश अभी सत्ता में थे पार्टी का नाम और इंतखाबी निशान साइकिल उनको मिल गई इसलिए मौकापरस्तों और मफादपरस्तों की भीड़ वक्ती तौर पर भले ही उनकी तरफ चली गई हो गांवों में अभी भी बड़ी तादाद में वर्कर और वोटर्स मुलायम सिंह यादव की तरफ ही हैं। अब मुलायम सिंह यादव की नाराजगी ग्यारह मार्च के बाद नई पार्टी बनाने का शिवपाल यादव का एलान और उन मुस्लिम वोटर्स के साथ अखिलेश की जानिब से धोकेबाजी इन वजूहात के पेशेनजर यह कह पाना बहुत मुश्किल है कि अखिलेश-राहुल गठजोड़ उत्तर प्रदेश में कोई बड़ी कामयाबी हासिल करके अखिलेेश के दुबारा सत्ता में आने का रास्ता हमवार कर सकेंगे।

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