नोटबंदी से मुल्क को नुक्सान, फिर भी इसकी कामयाबी और कैशलेस इण्डिया पर ही सारा जोर – झूटे वादों का पुलिंदा है जेटली बजट

नोटबंदी से मुल्क को नुक्सान, फिर भी इसकी कामयाबी और कैशलेस इण्डिया पर ही सारा जोर – झूटे वादों का पुलिंदा है जेटली बजट

”हेल्थ सेक्टर के बजट में कोई इजाफा नहीं, सवा सौ करोड़ के मुल्क के लिए सिर्फ दो आल इंडिया इंस्टीट्यूट कायम करने का एलान, दवाओं की अनाप-शनाप और आसमान छूती कीमतों को कण्ट्रोल करने की कोई ठोस पहल नहीं। गांवों की पैसठ फीसद आबादी के लिए पैथालोजी और जांच सेंटर जैसी सहूलतों पर गौर भी नहीं किया गया। मेडिकल की सीटों में इजाफा करने के बजाए पोस्ट ग्रेजूएशन स्पेशलाइजेशन कोर्स में 5 हजार सीटों का इजाफा किया गया।“

 

”जेटली के बजट में वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी के कभी पूरे न हो सके वादों और फर्जी बयानबाजी के अलावा कोई ठोस बात नहीं। उत्तर प्रदेश, उत्तरखण्ड समेत पांच प्रदेश असम्बलियों के एलक्शन को मुतास्सिर करने की जेटली की नाकाम कोशिशें। देहातों में रहने वालों और दलितों के बजट मंे इजाफा करके दोनों को बेवकूफ बनाकर वोट लेने की कोशिश।“

 

”काश्तकारों की पैदावार की मुनाफाबख्श कीमतें (सपोर्ट प्राइस) दिए जाने पर कोई गौर नहीं किया गया। गन्ने की कीमतों मे इजाफे का वादा भी मोदी भूल गए। गांवों में इंफ्रास्ट्रक्चर का जिक्र लेकिन गरीब मजदूरों और गैर मुनज्जम शोबों (असंगठित क्षेत्रों) के लिए मोदी सरकार कुछ भी करने को तैयार नहीं। उल्टे कैशलेस होने के लिए गांव वालों पर खुसूसी जोर डाला गया।“

 

नई दिल्ली! वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी के कभी न पूरे होने वाले वादों की तरह ही उनके फाइनेंस मिनिस्टर अरूण जेटली ने भी आइंदा माली साल (वित्तीय वर्ष)2017-18 का बजट पेश किया है। कांगे्रस समेत सभी अपोजीशन पार्टियों को एतराज था कि चार फरवरी से आठ मार्च तक पांच रियासती असम्बलियों उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, पंजाब, गोवा और अरूणाचल प्रदेश के एलक्शन होने हैं इसलिए बजट 8 मार्च के बाद पेश किया जाए ताकि मोदी सरकार बजट के जरिए दी जाने वाली रियायतों के जरिए इन प्रदेशों के वोटर्स को मुतास्सिर न कर सकंे। मोदी ने अपोजीशन का यह मश्विरा तस्लीम नहीं किया और  पहली फरवरी को ही बजट पेश कर दिया। याद रहे कि 2012 में भी ऐसी ही सूरतेहाल थी तब बीजेंपी अपोजीशन में थी। बीजेपी के मतालबे पर उस वक्त की मनमोहन सिंह सरकार ने बजट को तेरह दिन आगे बढा दिया था। नोटबंदी समेत अपने तमाम फैसलों की वजह से अवाम में साख खो चुके नरेन्द्र मोदी के फाइनेंस मिनिस्टर जेटली ने जो बजट पहली फरवरी को पेश किया उसमें मुल्क के देही इलाकों (ग्रामीण क्षेत्रों) पर बहुत जोर दिया गया है। इस बजट को भले ही आरएसएस कुन्बे ने भारत बनाम इण्डिया करार देते हुए दावे किए हैं कि यह इण्डिया (शहरों) का नहीं भारत (गांवों) का बजट है। अवाम पर इसका कोई खास असर पड़ने वाला नहीं है। बजट के जरिए वोट हासिल करने की बदनियती के बावजूद मोदी शायद अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सकंेगे क्योंकि नोटबंदी से गांवों के लोगोें को हो रही परेशानियों को हल करने की कोई ठोस पेशकश सरकार नहीं कर पाई है। गांवों में अस्ल मसला पीने के पानी, अस्पतालों, इलाज, तालीम और एक्तेसादी तहफ्फुज (आर्थिक सुरक्षा) का है। इन मसायल पर मोदी सरकार के बजट में कोई जोर नहीं है। वैसे तो हेल्थ के बजट मंे इजाफा किया गया है लेकिन देहातों में रहने वालों के फायदे के काम नहीं बताए गए हैं। एक सौ पच्चीस करोड़ के मुल्क मेें सिर्फ दो आल इंडिया इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंसेज झारखण्ड और गुजरात में बनाने का वादा सरकर ने किया है। इस बजट में कहा गया है कि दो-तीन साल के अंदर नोटबंदी से पैदा हुई दुश्वारियों को खत्म कर दिया जाएगा और नोटबंदी के फायदे आम लोगों को मिलने लगेगे। सवाल यह है कि पहले से ही कमर तुड़वाए बैठे देहातों के लोग क्या करेंगे। अरूण जेटली बजट में नोटबंदी को सही और फायदे का फैसला ठहराने की कोशिश करते दिखे। साथ ही डिजिटल इंडिया और कैशलेस इंडिया पर जोर देते रहे खुद सरकार ने तस्लीम किया है कि पूरे मुल्क में बिजली पहुचाने में तकरीबन दो साल का वक्त लगेगा। नोटबंदी की वजह से पटरी से उतर चुके बैंकिंग सिस्टम को ठीक करने का जिक्र तक इस बजट में नहीं है। गांवों में बिजली पहुचाने में दो साल लगेंगे तब तक मुल्क के देहातों मंे रहने वाली सत्तर फीसद आबादी अपना काम कैसे चलाएगी। इसका कोई जिक्र नहीं हैं। झूट का आलम यह कि 31 जनवरी को आए एकनामिक सर्वे में नोटबंदी से नुक्सान होने की बात कही गई लेकिन अगले ही दिन अरूण जेटली यही कहते रहे कि नोटबंदी मुल्क के लिए बहुत मुफीद साबित हो रही है।

इण्डियन रेलवे दुनिया का सबसे बड़ा रेलवे सिस्टम है। मोदी सरकार आने के बाद से टेªन हादसों में बेशुमार इजाफा हुआ है। टेªनें शहरों के साथ-साथ मुल्क के गांवों को भी जोड़ती हैं। सरकार ने एक लाख करोड़ का बंदोबस्त खुसूसी हिफाजत फण्ड के तौर पर किया है। लेकिन यह रकम पांच सालों के लिए हैं। यानी हर साल रेलवे सेफ्टी पर सिर्फ बीस लाख करोड़ ही खर्च किया जाएगा। रेलवे का कुल बजट एक लाख 31 हजार करोड़ ही रखा गया है। इतनी रकम से ज्यादा रकम तो बडौदा से मुंबई तक बनने वाले बुलेट टेªन रूट पर ही खर्च होने का तखमीना है। रेलवे यूनियन के ओहदेदारान का साफ कहना है कि मोदी सरकार इण्डियन रेलवेज को प्राइवेट सेक्टर और कारपोरेट घरानों को सौपना चाहते हैं। इसीलिए रेल बजट को अलग से लाने के बजाए मुल्क के आम बजट में ही शामिल कर दिया गया। अब हर ऐसा काम किया जा रहा है जिससे रेलवे को औने-पौने में कारपोरेट घरानों को ही सौंपने का रास्ता साफ हो सके। यह एक इंतेहाई खतरनाक कदम होगा।

अरूण जेटली के इस बजट में कोई नई बात नहीं है इसमें उन झूटे वादों और एलानात को ही भर दिया गया है जो वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी आम तौर पर  अपने बयानात में करते रहते हैं और पूरा आरएसएस कुन्बा उन झूटे वादों पर बगलें बजाता फिरता है। इन पांच बातों पर ज्यादा जोर दिया गया है। एक यह कि इस बार किसी नए प्रोजेक्ट या स्कीम का जिक्र नहीं है। इसके लिए जेटली का कहना है कि उनकी सरकार पहले उन प्रोजेक्ट्स और स्कीमों को मुकम्मल करना चाहती है जो पिछले सालों से चल तो रही हैं लेकिन किसी वजह से मुकम्मल नहीं हो पाई हैं।ं दूसरे यह वादा किया गया है कि गांवों में गरीबी दूर की जाएगी, देहातों मंे इनफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाया जाएगा। तीसरी बात यह कही गई है कि जो शोबे (क्षेत्र) कामयाबी हासिल कर रहे हैं उन्ही में ज्यादा काम और सरमायाकारी की जाएगी ताकि तरक्की की रफ्तार तेजी पकड़ सके। चैथी अहम बात यह है कि कालेधन को खत्म करने के लिए ज्यादा से ज्यादा लोगों को टैक्स के दायरे मंे लाया जाएगा। पांचवां यह कि सियासी पार्टियां अब सिर्फ दोे हजार रूपए तक ही नकदी की शक्ल में ले सकेगी ताकि मआशी सिस्टम (अर्थव्यवस्था) में सुधार लाया जा सके अभी तक सियासी पार्टियां बीस हजार रूपए तक नकद चंदा ले सकती हैं। जिसमें चंदा देने वाले के नाम पते का रिकार्ड रखना जरूरी नहीं होता था।

मुल्क में नोटबंदी से बेरोजगारी में हुए बडे़ पैमाने पर इजाफे और आने वाले दिनों में अमरीका के नए सदर डोनाल्ड ट्रम्प की पालीसियोें से मुल्क के मआशी सिस्टम (अर्थव्यवस्था) पर पड़ने वाले खतरनाक असर और एस वन  वीजा को कण्ट्रोल किए जाने की वजह से बढने वाली बेरोजगारी से भी निपटने का कोई इरादा मोदी सरकार के इस बजट मंे नजर नहीं आता है। बैंकों के सिस्टम को ठीक करने के बजाए मोदी सरकार ने तय कर दिया कि तीन लाख से ज्यादा खर्च नकदी की शक्ल में नहीं किया जा सकेगा। पचास हजार से ज्यादा पैसा बैंकों से निकालने या लेनदेन करने पर टैक्स लगाया जाएगा। मतलब यह कि हमारी कमाई का पैसा बैंकोें में ही रह सकता है। हमंें अपनी मर्जी मुताबिक उसे खर्च करने का अख्तियार अब नहीं रहेगा। जेटली भी कहते हैं कि नोटबंदी देश के मफाद में है लेकिन अवाम को इसके फायदे मिलने में अभी कुछ साल लग सकते हैं। दो से तीन साल उन्होंने यह नहीं बताया कि नोटबंदी से जो नुक्सान अभी हो चुका है और बेरोजगारी में बड़े पैमाने पर इजाफा हो गया है उसका हल कैसे निकलेगा।  उसके फायदे हासिल करने के लिए दो-तीन साल लगेगे तो यह दो-तीन साल कैसे कटेंगे? पूरा बजट महज वादांे पर और मुल्क की मआशी हकीकत से काफी दूर है।

बजट के जरिए पांच प्रदेशों में असम्बली एलक्शन पर असर डालने और वोट ठगने की भरपूर कोशिश की गई है। मसलन शेडयूल कास्ट, शेडयूल ट्राइब्स की फलाह व बहबूद (कल्याण) के लिए बजट में 52393 करोड़ रूपयों का बंदोबस्त किया गया है जो गुजिश्ता साल के 38833 करोड़ के मुकाबले तकरीबन 35 फीसद ज्यादा है। इस कदम से मोदी की बीजेपी उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड और पंजाब के दलित तबके के वोट हासिल नहीं कर सकेगी। उत्तर प्रदेश के दलित बहुजन समाज पार्टी के साथ तो पंजाब और उत्तराखण्ड के दलितों का रूझान पूरी तरह से कांगे्रस की तरफ है। मुल्क के उन्नीस करोड़ से भी ज्यादा अकलियतों के लिए तकरीबन चार हजार करोड़ रूपयों का ही बंदोबस्त इस बजट में किया गया है। इसके बावजूद सरकार में बैठे लोग मुसलमानों की तरक्की के नाम पर लम्बी-चैड़ी बयानबाजी कर रहे हैं उनका ख्याल है कि शायद उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड के कुछ मुसलमान उनके झांसे में आकर बीजेपी को वोट देंगे। ऐसे ख्वाब वह पार्टी देख रही है जिसने उत्तर प्रदेश की 403 और उत्तराखण्ड की 70 सीटों में से एक पर भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा है। यह उस बीजेपी की हकीकत है जिसको  जेब में रखने वाले नरेन्द्र मोदी सबका साथ सबका विकास जैसा नारा लगाकर अवाम को बेवकूफ बनाते रहते हैं।

भारतीय जनता पार्टी जब अपोजीशन मेें होती है तो मतालबा करती रहती है कि कम से कम पांच लाख तक की आमदनी को इनकम टैक्स से छूट मिलनी चाहिए लेकिन जब खुद सत्ता में होती है तो पांच लाख की बात भूल जाती है। पंडित अटल बिहारी वाजपेयी की कयादत वाली सरकार ने छः बजट पेश किए थे। अब मोदी सरकार का यह चैथा बजट है अब सरकार को इस बात की फिक्र नहीं है कि पांच लाख तक की आमदनी को इनकम टैक्स से अलग रखा जाए। उल्टे अब यह कहा जा रहा है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को इनकम टैक्स के दायरे मंें लाने की कोशिश सरकार कर रही है। भारतीय जनता पार्टी के लिए कहा जाता है कि यह खुदरा व्यापारियों और बनियों की पार्टी है। मोदी और अरूण जेटली ने अपने इस बजट में खुदरा छोटे व्यापरियों और दुकानदारों को कई रियायतें देने का एलान करके इस कहावत पर मोहर लगा दी है कि बीजेपी तो बनियों और छोटे व्यापारियों की पार्टी है।

अरूण जेटली ने इनकम टैक्स की लिमिट मे तो कोई तब्दीली नहीं की है। बस इतना कर दिया है कि ढाई लाख तक की आमदनी पर टैक्स नहीं लगेगा। उसके बाद पांच लाख तक की आमदनी  पर पांच फीसद इनकम टैक्स देना होगा। साठ साल से ज्यादा की उम्र वालों को तीन लाख तक की आमदनी पर टैक्स नहीं देना पड़ेगा लेकिन तीन लाख से पांच लाख तक आमदनी पर दस फीसद इनकम टैक्स देना होगा। पांच लाख से दस लाख तक आमदनी पर सभी को बीस फीसद और दस लाख से ज्यादा आमदनी पर तीस फीसद टैक्स देना होगा। पचास लाख से एक करोड़ तक की आमदनी पर हर किसी को इनकमटैक्स के अलावा दस फीसद तो एक करोड़ से ज्यादा पर 15 फीसद सरचार्ज अलग से देना पडे़गा।

इस बजट में हेल्थ सेक्टर के लिए ज्यादा रकम रखी गई है लेकिन जेटली ने यह नहीं बताया कि इस बजट में हेल्थ सेक्टर के लिए कितनी रकम कहां खर्च होगी। यह कहा गया कि झारखण्ड और गुजरात में दो आल इंडिया इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंसेज बनाए जाएगें। मेडिकल के पोस्ट ग्रेजूएट स्पेशलाइजेशन कोर्स की सीटों में पांच हजार सीटों का इजाफा किया गया है। मेडिकल शोबे (क्षेत्र) के लोगांे का कहना है कि इससे काम नहीं चलेगा जरूरत तो एमबीबीएस कोर्स की सीटों में इजाफा करने की है। अभी तक मुल्क में एमबीबीएस की 52 हजार और पोस्ट ग्रेजूएशन की 25 हजार सीटें ही हैं। इनसे सवा सौ करोड़ की आबादी की मेडिकल जरूरतों को पूरा नहीं किया जा सकता है। मुल्क की सत्तर फीसद आबादी अब भी गांवों में रहती है। गांवों में पैथालोजी और जांच के सेंटर नहीं हैं। नतीजा यह हेै कि कैंसर टीबी और दिल जैसेसंगीन अमराज का पता लोगांें को चल ही नहीं पाता है उन्हें इतना खतरनाक मरज हो गया है। इसका अ्रंदाजा भी उन्हें तभी चल पाता है जब मरज लाइलाज हो जाता है। पैथालोजी और जांच सेंटरों पर सरकार ने बजट मंे खामोशी अख्तियार कर रखी है। यह दावा जरूर किया गया है कि 2017 मेें कालाजार, 2020 तक खसरा और 2025 तक मुल्क से टीबी जैसे अमराज को खत्म कर दिया जाएगा। जरूरी दवाआंें की कीमतें कम करने की कोई ठोस तजवीज नहीं है।

काश्तकारों के लिए इस बजट में लफ्फाजियां तो की गई हैं लेकिन काश्तकारों को उनकी पैदावार की मुनासिब कीमत दिलाने के सिलसिले मेें कुछ नहीं कहा गया है। बजट मेें काश्तकारों को सिर्फ बेवकूफ बनाया  जा रहा है। इसका अंदाजा काश्तकारों को शायद इकनामिक सर्वे की रिपोर्ट से ही लग गया था इसीलिए स्वराज अभियान के तहत बडी़ तादाद में काश्तकारों ने दिल्ली आकर अपनी अलग पंचायत लगा रखी थी उन्हें इस बात पर सख्त एतराज और गुस्सा था कि उनकी पैदावार की सरकारी मुनाफाबख्श कीमतों पर बात तक नहीं की गई है।