एलक्शन, वादे और मुद्दे

एलक्शन, वादे और मुद्दे

उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, पंजाब और गोवा प्रदेश असम्बलियों के एलक्शन हो रहे हैं। हिन्दुस्तान जैसे अजीम जम्हूरी मुल्क में लोक सभा और असम्बली इंतखाबात को ‘लोकतन्त्र का पर्व’ यानी जम्हूरियत का जश्न या जम्हूरियत का बड़ा त्यौहार कहा जाता है। इंतेखाबात में शामिल होने वाली सभी सियासी पार्टियां अवाम और मुल्क के मफादात से मुताल्लिक मुद्दों पर बात करती थीं, सभी पार्टियां यह वादे करती थीं कि अगर उनकी पार्टी की सरकार बनी तो वह देश और अवाम के मफाद में फलां-फलां काम करंेगें। अब आहिस्ता-आहिस्ता सियासी पार्टियां और मुल्क के एलक्शन कमीशन दोनों ने मिल कर असम्बली और पार्लियामेंट के एलक्शन को लोकतन्त्र का पर्व तो रहने नहीं दिया। अब यह एलक्शन प्रदेशों और मुल्क की सत्ता पर कब्जा करने का जरिया बन गए हैं। एलक्शन कमीशन ने इस पर्व को कैसे खत्म किया इस पर तो बाद में कभी लिखूंगा अभी तो सियासी पार्टियांे, उनके सियासतदानों व उनके जरिए उठाए जाने वाले मुद्दों पर ही महदूद रहना चाहता हूं। अजीब बात है कि इस वक्त मुल्क में दो नेशनल पार्टियों यानी कांग्रे्रस और भारतीय जनता पार्टी और सभी इलाकाई पार्टियां भी किसी न किसी एक शख्सियत की प्रापर्टी हो कर रह गई हैं। समाजवादी पार्टी के मालिक अखिलेश यादव हैं, बहुजन समाज पार्टी की मालकिन मायावती हैं, अकाली दल के मालिक प्रकाश सिंह बादल हैं चंद साल कब्ल बनी नई नवेली आम आदमी पार्टी के मालिक अरविन्द केजरीवाल हैं। इन इलाकाई पार्टियों की तर्ज पर ही दोनों नेशनल पार्टियां भी तब्दील हो गई। बीजेपी के मालिक बन गए नरेन्द्र मोदी तो कांगे्रस के मालिक बन गए राहुल गांधी। वैसे तो कश्मीर से तमिलनाडु तक और मुंबई से कोलकाता तक हर प्रदेश में दर्जनों इलाकाई पार्टियां हैं और उन सभी पर किसी न किसी एक ही शख्सियत का मालिकाना हक है लेकिन यहां सिर्फ तीन प्रदेशों की इलाकाई पार्टियों का जिक्र कर रहे हैं क्योंकि इन्हीं प्रदेशों में इस वक्त एलक्शन हो रहे हैं। इस वक्त जो एलक्शन हो रहे हैं उसमें कोई भी पार्टी प्रदेशों और अवाम के मफाद के मुद्दों पर बात नहीं कर रही हैं और अगर कर भी रही हैं तो झूट बोल रही हैं।

सबसे पहले जिक्र मुल्क की सत्ताधारी पार्टी भारतीय जनता पार्टी और उसके मालिक नरेन्द्र मोदी का, वह मुल्क के वजीर-ए-आजम हैं उनसे यह उम्मीद की जाती थी कि वह जो भी बात करंेंगे संजीदगी से ही करंेगे, लेकिन इंतखाबी मीटिंगों में उनकी तकरीरें मजहकाखेज (हास्यास्पद) ही सुनाई देती हैं। वह इंतेहाई गैरजिम्मेदाराना बातें कहते फिर रहे हैं। अक्सर उनकी तकरीरों में झूट ज्यादा सुनाई देता है। मसलन पांच साल से गोवा में उनकी पार्टी की सरकार है। इन पांच सालों में काम तो कुछ किए नहीं अब गोवा के अवाम से कह रहे हैं कि अगर आप हमें ‘कम्फर्टेबल’ मजारिटी देंगे तो हमारी सरकार गोवा को भी पूरी तरह कम्फर्टेबल बना देगी। अब इस कम्फर्टेबल का उनका मकसद क्या है। यह कोई नहीं जानता। पांच साल से उनकी सरकार चल रही है। सरकार को कभी कोई खतरा पैदा नहीं हुआ। ढाई साल तक चीफ मिनिस्टर रहने वाले मनोहर परिकर को 2014 में उन्होंने अपना डिफंेस मिनिस्टर बनाकर दिल्ली बुला लिया और गोवा में उनका दूसरा चीफ मिनिस्टर बना। आराम से अब तक सरकार चल रही है। इसके बावजूद वह कम्फर्टेबिल मजारिटी की बातें करके गोवा के लोगों को गुमराह करने का काम कर रहे हैं। पंजाब मंे उन्होने नशीली दवाओं और बेरोजगारी जैसे अहम परेशानियों को खत्म करने का वादा करने  के बजाए यह कहा कि कांगे्रस दम तोड़ रही है, मरने के करीब है। इसी लिए भगोड़ों को अपने साथ लेकर सत्ता में आने का ख्वाब देख रही है। कांग्र्रेस पर इस किस्म का गैर जरूरी कमेण्ट वह नरेन्द्र मोदी कर रहे थे जो खुद ही दर्जन भर छोटी-छोटी इलाकाई पार्टियों के कांधे पर एनडीए के नाम पर चढकर सत्ता तक पहुचे हैं। जिस पंजाब में खड़े होकर वह यह तकरीर कर रहे थे वहंा भी अकाली दल के साथ गुजिश्ता दस सालों से सत्ता में हैं। वही अकाली दल जिसके सदर प्रकाश सिंह बादल दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट पर मुल्क के संविधान को जला चुके हैं। आजाद हिन्दुस्तान की तारीख में बादल के अलावा आज तक किसी भी शख्स ने इतना घिनौना जुर्म नहीं किया है। संविधान जलाने वाले बादल की बहू हरसिमरत कौर बादल भी नरेन्द्र मोदी सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर हैं।

मुल्क की सत्ता में मोदी को आए हुए अभी सिर्फ ढाई साल ही हुए हैं। बातें ऐसी करते फिरते हैं कि जैसे बीस-पच्चीस सालों से मुल्क के वजीर-ए-आजम हों। कांगे्रस पर सतही और सड़कछाप जुमलों के जरिए हमले करते वक्त वह यह भूल जाते हैं कि ढाई साल पहले तक इस मुल्क की सत्ता दस सालों से उसी कांग्रेस के पास थीं अपने गरूर में मोदी इतने डूबे रहते हैं कि उन्हें यह भी याद नहीं रहता कि हम जम्हूरी सिस्टम में रहते हैं। पांच साल में अवाम ही अपने वोटों के जरिए किसी को फर्श से अर्श पर तो किसी को अर्श से फर्श पर पहुचा देते हैं। खुद मोदी की भारतीय जनता पार्टी के भी 1984 में सिर्फ दो मेम्बर जीत कर लोक सभा पहुचे थे। उन दो मेम्बरान से ही बढते-बढते आज उनकी पार्टी 282 तक पहुची है। अगली बार 182 या सिर्फ 82 तक भी पहुच सकती है। वह उत्तर प्रदेश की अवामी मीटिंगों में बोलते हैं तो प्रदेश के अहम मुद्दों के बजाए कभी राहुल गांधी कभी मायावती तो कभी अखिलेश यादव और मुलायम के कुन्बे का मजाक बनाते हुए उन लोेगों पर सतह से गिरे हुए जाती हमले भी करते हैं।

पंजाब में दस सालों से भारतीय जनता पार्टी और अकाली दल की सरकार है वजीर-ए-आला प्रकाश सिंह बादल उनके बेटे सुखवीर बादल और सुखवीर के साले मजीठिया के साथ-साथ बीजेपी ने भी दोनों हाथों से पंजाब को हर तरह से लूटा है। पूरे पंजाब की नौजवान नस्ल को नशीली दवाओं का आदी और गुलाम बना दिया गया। प्रदेश में पुलिस इतनी बेईमान हो गई कि पुलिस में शामिल कुछ बेईमान और मुल्क के गद्दार पुलिस वालोें ने पाकिस्तानी दहशतगर्द गरोहों के साथ मिल कर पठान कोट एयरफोर्स बेस उड़ी और गुरूदासपुर जेल तक दहशतगर्दाना हमले करा दिए। पंजाब का सब कुछ तबाह व बर्बाद करने के बाद अब एक बार फिर बादल बेटेे पंजाब के अहम मुद्दों का जिक्र करने के बजाए कांग्रेस लीडर कैप्टन अमरिन्दर सिंह, बीजेपी छोड़कर कांगे्रस में शामिल होने वाले मशहूर क्रिकेटर और अब टीवी अदाकार नवजोत सिंह सिद्धू और आम आदमी पार्टी के लीडर व दिल्ली के वजीर-ए-आला अरविन्द केजरीवाल पर सतही हमले करके पंजाबियों से वोट मांग रहे हैं। पंजाब पहुचकर आम आदमी पार्टी के लीडर अरविन्द केजरीवाल भी पंजाब के अस्ल मसायल और जमीनी मुद्दों के बजाए दूसरी पार्टियों के लीडरान पर हमले करके वोट हासिल करने की कोशिश करते नजर आते हैं। शुरू में तो उनके डिप्टी चीफ मिनिस्टर मनीष सिसोदिया ने यही एलान कर दिया था कि अगर पंजाब में आम आदमी पार्टी जीती तो अरविन्द केजरीवाल पंजाब के चीफ मिनिस्टर बनेंगे बाद में खुद केजरीवाल ने उनकी बात की तरदीद करते हुए कहा कि चीफ मिनिस्टर कोई पंजाबी ही होगा। पंजाब में कांगे्रसी लीडरान भी इसी किस्म के बेसूद मुद्दों पर बात करते नजर आते हैं। हां नए कांगे्रसी बने नवजोत सिंह सिद्धू ही हैं जो पंजाब के अस्ल मसायल पर बात करते नजर आते हैं।

मुल्क के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश का हाल तो और भी खराब है। बीजेपी के मालिक नरेन्द्र मोदी जब भी प्रदेश के किसी मकाम पर इंतखाबी मीटिंग करते हैं वह मायावती, अखिलेेश यादव और राहुल गांधी पर जाती हमले करके वोट मांगते हैं। पांच साल से सरकार चला रहे अखिलेश यादव ने तो हद ही कर दी। उन्होंने पब्लिक मीटिंगों में कहना शुरू कर दिया कि अवाम के फायदे के लिए उन्होंने अपने  कुन्बे (परिवार) तक में झगड़ा कर लिया। मतलब यह कि उनके वालिद मुलायम सिंह यादव समेत उनके कुन्बे के लोग ही उत्तर प्रदेश की तरक्की और अवाम के मफाद में सबसे बड़ी रूकावट थे। मायावती पर तंज  करते हुए वह बार-बार एक ही घिसा-पिटा जुमला दोहराते नजर आते हैं कि पत्थरों वाली सरकार ने प्रदेश में बड़े-बड़े हाथी लगवाए थे जो हाथी खड़ा था वह सात-आठ सालों खड़ा है जो बैठा था वह बैठा है। न खड़ा वाला बैठ सका, न बैठा खड़ा हो सका है। सवाल यह है कि पत्थरों वाली सरकार ने अगर पत्थर के हाथी ही खड़े और बैठे लगवाने के अलावा  दूसरा कोई काम नही किया था तो अवाम ने इस सरकार को सत्ता से बेदखल करके आपको सत्ता सौंपी थी अपने पांच सालों में क्या किया। सिर्फ लखनऊ में मेट्रो, लखनऊ से आगरा तक एक्सप्रेस वे और लखनऊ में एक आईटी सिटी जहां गरीबों और मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं। प्रदेश में तालीम की बदतरीन हालत में कोई सुधार नहीं किया गया, हेल्थ सर्विसेज बद से बदतर होती गईं कोई दो साल पहले खुद अखिलेश यादव लखनऊ के किनारे मोहनलाल गंज के एक प्राइमरी स्कूल में गए थे तो वहां के बच्चे अपनी किताबों में एक लफ्ज भी पढ नहीं सके थे। बच्चों की जेहनी तरक्की का आलम यह कि जब अखिलेश ने बच्चों से पूछा मुझे पहचानते हो तो जवाब मिला था कि हां आप राहुल गांधी हैं। इस वाक्ए का जिक्र तो अखिलेश ने कई बार चटखारे लेकर किया लेकिन एक बार भी यह नहीं बता सके कि प्रदेश में प्राइमरी तालीम ठीक करने के लिए उन्होनेे और उनकी सरकार ने क्या कदम उठाए हैं। अब तो खैर वह कांगे्रस के साथ हो लिए हैं  तो कांग्रेस लीडरान पर उनके हमले फिलहाल रूक गए हैं।

कांगे्रस और उसके मालिक का हाल भी इन तमाम सियासतदानों से कुछ अलग नहीं है। कभी तो वह अपने कुर्ते की फटी हुई जेब दिखाकर खुद का मजाक उड़वाते हैं तो कभी उन्हें हजरत अली की तस्वीर दिख जाती है जिसमें उनकी पार्टी का चुनाव निशान पंजा भी नजर आता है। उन्हें इतना भी शऊर नहीं है कि पैगम्बरे इस्लाम (स.अ.व.) और उनके बाद चारों खलीफा की तस्वीर ही कहीं नहीं है। उनके पास भी उत्तर प्रदेश की तरक्की के लिए कोई ठोस रोडमैप नहीं है। साल भर से तो वह 27 साल यूपी बेहाल का नारा लगाकर पुराने कांगे्रसियों को घरों से निकाल कर सड़क पर खड़ा कर दिया अब एलक्शन आया तो उसी समाजवादी पार्टी के साथ महज 105 सीटंें लेकर इंतखाबी समझौता कर लिया जिसने 27 में से बारह साल से ज्यादा मुद्दत तक हुकूमत की है। यह गलती उनसेे इसलिए हुई कि पार्टी मालिक की हैसियत से उन्होने नरेन्द्र मोदी के एक पुराने नमकख्वार प्रशांत किशोर को अपनी पार्टी सौंप दी थी। पीके ठहरे मैनेजमेंट सेक्टर के आदमी उन्होने पार्टी को अखिलेश के हाथों गिरवी रख दिया।