मुसीबत के वक्त की दुआ और उसकी हिकमत

मुसीबत के वक्त की दुआ और उसकी हिकमत

मुफ्ती मोहम्मद तकी उस्मानी

जब आदमी सुबह के वक्त कारोबारे जिंदगी में दाखिल होता है तो वहां उसको हर किस्म के हालात और वाक्यात से साबका पेश आता है। कोई इंसान इस जमीन पर ऐसा नहीं है जिसको इन हालात और वाक्यात से कभी भी तकलीफ न पहुची हो बडे़ से बड़ा सरमायादार बड़े से बड़ा दौलतमंद बड़े से बड़ा हाकिम बडे़ से बड़ा साहबे एक्तेदार यह दावा नहीं कर सकता कि मुझे कभी भी तकलीफ नहीं पहंुचती, अगर इंसान है और वह इस दुनिया में है तो उसको कभी न कभी तकलीफ जरूर पहुचेगी इससे कोई बचा नहीं। लेकिन तकलीफ पहुचने पर एक काफिर के रवैए में और एक मुसलमान के रवैए में जमीन और आसमान का फर्क है जब काफिर को तकलीफ पहुचती है तो वह उस तकलीफ का जबान से इजहार करता है बाज अवकात रोता चिल्लाता है बाज अवकात शिकवा करता है बाज अवकात वह तकदीर का गिला करने लगता है और अल्लाह तआला से शिकवा करने लगता है। मगर नबी करीम (सल0) ने एक मोमिन को यह तलकीन फरमाई कि जब कभी तुम्हें कोई तकलीफ की बात पेश आए तो यह कलमात पढो-‘इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन’।

डाक्टर अब्दुल यहया फरमाया करते थे कि तकलीफ पहुचने का यह मतलब नहीं है कि कोई बड़ी मुसीबत आ जाए बल्कि अगर छोटी सी तकलीफ पहुचे तो भी यही हुक्म है जैसाकि हदीस शरीफ में आता है कि जब चराग गुल हो गया तो नबी करीम (सल0) ने यही कलमात पढे। यह जुमला दर हकीकत बड़ा अजीब जुमला है। अगर इंसान इस जुमले को सोच समझ कर जबान से अदा करे तो दुनिया की कोई मुसीबत और कोई तकलीफ ऐसी नहीं है जिसपर यह जुमला ठंडक न डाल देता हो। इस जुमले का मायनी यह है कि हम सब अल्लाह के लिए हैं। यानी अल्लाह के बंदे हैं, अल्लाह की मखलूक हैं अल्लाह ही की ममलूक हैं और हम सब अल्लाह ही की तरफ लौट कर जाने वाले हैं। और जब यह कहा कि इन्नल्लाह कि हम तो हैं ही अल्लाह के बंदे, अल्लाह की मिकियत में हैं। अल्लाह ही हमारा खालिक और मालिक है। लिहाजा अगर हमें कोई तकलीफ पहुची है तो यकीनन उसमें अल्लाह की हिकमत है क्योंकि अल्लाह का कोई काम हिकमत से खाली नहीं।

दूसरा जुमला है ‘वइन्ना इलैहे राजेऊन’ और हम उसकी तरफ लौट कर जाने वाले हैं यानी यह तकलीफ जो पहुची है यह हमेशा रहने वाली नहीं है एक वक्त आएगा कि हम भी अल्लाह की तरफ लौट कर जाएंगे। अगर हमने इस मुसीबत पर सब्र किया और उसको अल्लाह की तरफ से समझा तो उसके नतीजे में हमें अल्लाह के पास अज्र हासिल होगा।

इसके बाद नबी करीम (सल0) ने यह दुआ तलकीन फरमाई- ऐ अल्लाह! मैं इस मुसीबत में आप से सवाब तलब करता हूं यानी यह तकलीफ जो मुझे पहुची है आपकी रहमत से मुझे उम्मीद है कि इस मुसीबत के एवज आप मुझे आखिरत मंे सवाब अता फरमाएंगे। लिहाजा आप मुझे  इसपर अज्र अता फरमाइए। पहले तो अल्लाह से यह दुआ कर ली कि ऐ अल्लाह जो तकलीफ पहुची थी वह पहुच गई और चूंकि वह तकलीफ आपकी तरफ से आई है इसलिए मैं उसपर राजी हूं लेकिन साथ ही आपसे यह इल्तजा है कि इस मुसीबत के बदले मुझे आखिरत में अज्र अता फरमाइए।

अब इसपर किसी को यह ख्याल हो सकता था कि जब तुम मुसीबत पर राजी हो गए और अल्लाह से उस मुसीबत पर अज्र भी मांग रहे हो तो इसका मतलब यह है कि यह मुसीबत बाकी रहे लेकिन नबी करीम (सल0) ने अगला जुमला इरशाद फरमा कर इस ख्याल की तरदीद फरमा दी इसलिए फरमाया कि यह कहो कि ऐ अल्लाह! मुझे इस मुसीबत के बदले कोई बेहतर चीज अता फरमा दीजिए। यानी मैं अगरचे आपके फैसले पर राजी हूं और आपके फैसले पर मुझे कोई गिला और शिकवा नहीं है और न एतराज है लेकिन ऐ अल्लाह! मैं कमजोर हूं मैं मुसीबत का तहम्मुल नहीं कर सकता। इसलिए आप मेरी कमजोरी पर रहम फरमाइए और आप मेरी यह मुसीबत दूर फरमा दीजिए और इसके बदले में मुझे अच्छी हालत अता फरमा दीजिए।

इसलिए इस दुआ में एक तरफ तो जो मुसीबत और तकलीफ पहुची है उस तकलीफ और मुसीबत पर गिला और शिकवा नहीं बल्कि अल्लाह के फैसले पर राजी होने का एलान है। दूसरी तरफ अपनी कमजोरी का एतराफ है कि ऐ अल्लाह! मेेरे अंदर इस मुसीबत और तकलीफ को बरदाश्त करने की ताकत नहीं है कहीं ऐसा न हो कि अगर यह मुसीबत मजीद जारी रहे तो मैं बेसब्री का शिकार हो जाऊं इसलिए ऐ अल्लाह! मैं आपसे दुआ यही करता हूं कि मुझ से यह मुसीबत और तकलीफ दूर फरमा दीजिए। इस दुआ मे नबी करीम (सल0) ने दोनों चीजों को जमा फरमा दिया।

हकीकत यह है कि इंसान को जितनी भी तकलीफें पेश आती हैं चाहे वह सदमा हो या रंज, कोई फिक्र हो या कोई तशवीश यह सब अल्लाह की तरफ से नेमत हैं इसलिए नेमत हैं कि अल्लाह ने यह सब तकलीफें अपनी हिकमत से मोमिन के ऊपर डाली हैं और यह सब मोमिन के लिए सवाब और तरक्की दर्जात का जरिया बन रही हैं और गुनाहो की मगफिरत का जरिया बन रही हैं लेकिन हम अपनी कमजोरी की वजह से यह दुआ करते हैं कि ऐ अल्लाह इसके बजाए हमें राहत की नेमत अता फरमाइए और इसपर शुक्र की तौफीक अता फरमाइए।

नबी करीम (सल0) ने इस हदीस में यही दुआ फरमाई कि ऐ अल्लाह! इस मुसीबत के बदले इससे बेहतर कोई ऐसी चीज अता फरमा दीजिए जिसको मैं बरदाश्त कर सकूं और जो मेरी कमजोरी के मुताबिक हो लिहाजा जब भी इंसान को कोई सदमा तकलीफ, मुसीबत पेश आए तो फौरन अल्लाह की तरफ रूजूअ करे और कहे या अल्लाह! यह मुसीबत पेश आ गई है आप इसपर मुझे सवाब दीजिए और इसके बदले  में मुझे राहत अता फरमा दीजिए। जब यह दो काम कर लिए तो यह मुसीबत भी अल्लाह की तरफ से इंशाअल्लाह नेमत बन जाएगी और रहमत का जरिया बन जाएगी। यह नुस्खा देखने में छोटा सा है लेकिन इसपर अमल करके देखंे लिहाजा छोटी से छोटी तकलीफ भी पहुचे या छोटे से छोटा सदमा भी पेश आए तो अल्लाह की तरफ रूजूअ करके यह बात कह दो फिर देखों कि अल्लाह तआला तुम्हंे कहां से कहां पहुचाते हैं और कैसे तुम्हारे दर्जात में तरक्की अता फरमाते हैं। अल्लाह मुझे और आपको इसपर अमल करने की तौफीक अता फरमाए-आमीन।