अखिलेश का गलत वक्त पर सख्त फैसला

अखिलेश का गलत वक्त पर सख्त फैसला

लखनऊ! राजपूतों के लीडर रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैय्या और बदनाम हिश्ट्रीशीटर रहे बृजभूषण शरण सिंह, कुर्मियों के एक बड़े तबके का लीडर बदनाम डाकू ददुआ, मल्लाहों की लीडर रही फूलन  देवी कुशवाहा और मौर्य समाज के लीडर सालों जेल में रहकर वापस आए बाबू सिंह कुशवाहा और उत्तर प्रदेश बीजेपी के सदर बने कम से कम डेढ दर्जन मुकदमों में नामजद केशव प्रसाद मौर्य संघियों के लीडर सच्चिदानंद साक्षी तो मुसलमानों के एक बड़े तबके के लीडर माफिया डान मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद ब्राहमणों के लीडर अपने जमाने के माफिया कहे जाने वाले हरिशंकर तिवारी, अब गुड्डू पंडित और विजय मिश्रा जैसे लोग उत्तर प्रदेश और प्रदेश में रहने वालों के लिए यह बात भले ही खराब और बदकिस्मती की अलामत हो लेकिन आज की जमीनी हकीकत यही है। इन लोगों को अपनी अपनी बिरादरी का लीडर बनाने में वैसे तो कई सियासतदानों का हाथ रहा लेकिन एक तल्ख हकीकत यह भी है कि इन लोगों को उनकी बिरादरियों का लीडर बनाने में समाजवादी पार्टी और उसके कौमी सदर मुलायम सिंह यादव का भी बहुत बडा तआवुन (सहयोग) रहा है। इनमें एक-दो के अलावा बाकी सभी की पीठ पर कभी न कभी मुलायम सिंह यादव का हाथ रहा है। वह समाजवादी हैं उनका यकीन (विश्वास) है कि इस किस्म के लोगों को सियासत और समाज मंे आगे बढाने और इज्जत देने से यह सुधर सकते हैं। हालांकि इनमे से एक भी नहीं सुधरा।

अब मुलायम सिंह यादव के वजीर-ए-आला बेटे नई सोच और नए नजरियात वाले अखिलेश यादव अपनी ‘क्लीन इमेज’ बनाए रखने के लिए अपने ही वालिद के फार्मूले को उलटने की कोशिश करते नजर आए हैं। उनकी कोशिशों और फैसले का वक्त चूंकि मुनासिब नहीं है असम्बली एलक्शन में महज छः महीने का वक्त बचा है इसलिए ‘माफिया हटाओ, पार्टी और पार्टी की साफ तस्वीर बचाओ’ की उनकी मुहिम से फायदे के बजाए नुक्सान होता ज्यादा दिखता है। एक नुक्सान बहुत बड़े पैमाने पर वोटों का तो दूसरा उनके अपने ही कुन्बे में एख्तलाफ (मतभेद) का होने वाला है। पूरा कुन्बा कितनी ही सफाई दे कि घर में सब ठीक है ‘नेताजी’ मुलायम सिंह यादव की कयादत में सभी एकजुट हैं उनका हर फैसला सभी को काबिले कुबूल है लेकिन सच्चाई कुछ और ही है। अफजाल अंसारी के कौमी एकता दल को समाजवादी पार्टी में शामिल करने का फैसला तो शिवपाल यादव के बयान के मुताबिक ‘नेताजी’ का ही था। उसे खुद अखिलेश यादव ने तस्लीम नहीं किया। वजह यह थी कि इस मामले में अखिलेश यादव मीडिया के प्रोपगण्डे का शिकार हो गए। कौमी एकता दल और समाजवादी पार्टी के एक मे मिलने का एलान होते ही मीडिया के एक खास तबके ने शोर मचा दिया कि ‘मुख्तार अंसारी का कौमी एकता दल’ समाजवादी पार्टी में शामिल हुआ। हकीकत यह (बाकी पेज चैदह पर) नहीं है कौमी एकता दल के सदर अफजाल अंसारी हैं जो समाजवादी पार्टी से ही निकले हैं। मुख्तार के झगड़ांे की वजह से उनके खिलाफ भले ही कुछ मुकदमे दर्ज हो गए हैं लेकिन उनकी तारीफ तो सभी करते हैं। पार्टी के एक मेम्बर असम्बली अगर मुख्तार अंसारी हैं तो दूसरे सिबगत उल्लाह अंसारी भी हैं जो मुकम्मल तौर पर एक मजहबी और गाजीपुर की नहीं कई जिलों के अवाम में एक बाइज्जत शख्स हैं। वैसे भी जब उत्तर प्रदेश समाजवादी पार्टी के एलक्शन इंचार्ज, पार्टी जनरल सेक्रेटरी और सीनियर वजीर शिवपाल सिंह यादव ने नेताजी की मर्जी से कौमी एकता दल को समजावादी पार्टी में शामिल कराने का एलान किया था तो उस वक्त यही तय हुआ था कि मुख्तार अंसारी को पार्टी में शामिल नहीं किया जाएगा। वह अपने असम्बली हलके मऊ से आजाद उम्मीदवार की हैसियत से एलक्शन लड़ेंगे। ठीक उसी तरह जिस तरह कुण्डा में रघुराज प्रताप सिंह (राजा भैय्या) लड़ते हैं। मुख्तार अंसारी को राजा भैय्या की तरह कभी वजीर नहीं बनाया जाएगा।

मीडिया ने शोर मचा दिया तो अखिलेश यादव कौमी एकता दल को समाजवादी पार्टी में शामिल किए जाने के खिलाफ पहाड़ की तरह खड़े हो गए। पहले दिन वह अपने वालिद मुलायम सिंह यादव और चचा शिवपाल यादव के फैसले को रूकवा नहीं सके तो पूर्वी उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के सबसे करीबी और काबिले एतमाद (विश्वासपात्र) वजीर बलराम यादव को ही बर्खास्त कर अपने तेवर दिखा दिए। बाद में कौमी एकता दल को समाजवादी पार्टी में शामिल किए जाने का फैसला पार्टी की नेशनल एक्जीक्यूटिव ने 25 जून को तब्दील कर दिया तो 27 जून को बलराम यादव को दुबारा वजारत मंे शामिल कर लिया गया।

मीडिया के शोर और मीडिया के एक खास तबके ने दरअस्ल अखिलेश को अपने जाल में फसाया। मीडिया का यह वही तबका है जिसके आरएसएस, बीजेपी और बहुजन समाज पार्टी के साथ बहुत ही गहरे रिश्ते है। जब-जब समाजवादी पार्टी सत्ता में आई मीडिया के इसी तबके ने पार्टी लीडर मुलायम सिंह यादव को घेर लिया अब इसी तबके ने अखिलेश यादव को भी अपने जाल में फंसा रखा है। मीडिया का यह तबका हर बार सरकार में रहने के दौरान मुलायम सिंह यादव को फंसा कर उन्हें नुकसान पहुंचाता है। हर बार सरकार जाने के बाद मुलायाम सिंह यादव ने बाकायदा कहा भी कि फंला फंला तो उनकी आस्तीन के सांप साबित हुए, लेकिन अगली बार जब भी सरकार बनी मीडिया की वही टोली मुलायम के चारों तरफ दिखी। अब अखिलेश के साथ भी वैसा ही हो रहा है। अखिलेश यादव के कुछ सीनियर करीबी अफसरान ने भी समाजवादी पार्टी की बुनियादों में खूब मट्ठा डाला है। इस हकीकत के बावजूद अखिलेश ऐसी चकाचैध में फसंे है कि उनका सबसे मजबूत वोट बैंक मुसलमान इसी मीडिया और अफसरान की हरकतों की वजह से समाजवादी पार्टी से अलग हो गया लेकिन अखिलेश को उसका एहसास ही नहीं हुआ।

अफजाल अंसारी के कौमी एकता दल को मुखतार की पार्टी बताकर मीडिया के जिस तबके ने अखिलेश यादव को अपने जाल में फंसाया और उन्हें पार्टी  सुप्रीमो मुलायम सिंह व शिवपाल यादव के खिलाफ बगावत पर आमादा किया उस मीडिया को इस बात की कोई फिक्र नहीं दिखी कि बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में जिन केशव प्रसाद मौर्य को अपना सदर बनाया है वह कितने बड़े माफिया है उनके खिलाफ भी डेढ़ दर्जन से ज्यादा मुकदमें दर्ज हैं। जिनमें संगीन दफाओं के भी कई मुकदमे हैं। मायावती खुले आम ऐसे लोगों को अपनी पार्टी का उम्मीदवार बनाती जा रही है। जिनकी तस्वीर दबंगो और माफिया सरगनाओं की ही है। गुडडू पंडित जैसे लोगो को बीजेपी ने गले लिया तो वह महात्मा हो गए। अब एलक्शन मैदान में बीजेपी व बीएसपी के दबंग और माफिया सरगनाओं के सामने अखिलेश के साधु संत टाईप उम्मीदवारों का क्या हश्र होगा।

इस वक्त अखिलेश यादव को एक दो दिनों के लिए भले ही अखबारात की सुर्खियों में जगह मिल गई हो सियासी एतबार से यह फैसला नुक्सानदेह ही साबित होने वाला है। आजमगढ और गोरखपुर डिवीजन के कई जिलों और तकरीबन चालीस असम्बली सीटों पर अफजाल अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल का असर है। यह असर सिर्फ मुसलमानों में ही नहीं हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों तबकों पर है। इसी लिए तो 2014 का लोक सभा एलक्शन अफजाल अंसारी ने अपने जिले के बजाए बरसों तक चन्द्रशेखर जैसे बड़े लीडर का गढ रहे बलिया से लड़ा था तो नरेन्द्र मोदी की लहर के बावजूद उन्हें ढाई लाख से भी ज्यादा वोट मिले थे। अखिलेश यादव के इस फैसले को उनके हामियों ने कौमी एकता दल और अफजाल अंसारी व मुख्तार अंसारी की तौहीन की शक्ल में देखा है। यहां यह जिक्र भी जरूरी है कि कौमी एकता दल में बड़ी तादाद में राजभर, निषाद और राजपूत बिरादरी के लोग भी शामिल हैं। इन बिरादरियों के वोटों की अहमियत से मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव बखूबी वाकिफ हैं।

2012 के असम्बली एलक्शन के वक्त अखिलेश यादव ने डीपी यादव को पार्टी में शामिल करने से रोक दिया था। उनके इस कदम की खूब तारीफें हुई थीं और एलक्शन में उसका फायदा भी मिला था। वजह यह थी कि उस वक्त प्रदेश के लोग मायावती से नाराज थे प्रदेश भर में साइकिल यात्राएं करके अखिलेश यादव ने काफी शोहरत हासिल की थी। आम लोग उनमें एक नए किस्म का बाउसूल लीडर देख रहे थे। आज सूरते हाल बिल्कुल उल्टी है। उस वक्त लोग मायावती सरकार से नाराज थे आज लोग अखिलेश यादव सरकार से नाराज हैं। आम लोग खुसूसन मुसलमान यह सवाल उठाने लगे हैं कि एक माफिया अमरमणि त्रिपाठी के ड्राइवर से बड़े माफिया बने गुड्डू पंडित को तो अखिलेश ने गले लगा लिया था उसके साथ उसके भाई को भी पार्टी का टिकट देकर दोनों को असम्बली पहुंचवाया। अब वह दोनों अखिलेश सरकार को खुला चैलंेज देते फिर रहे हैं और अखिलेश यादव की नाराजगी मुख्तार अंसारी के लिए जाहिर हो रही है। गुजिश्ता चार सालों मंे लखनऊ के सरोजनी नगर हलके से मेम्बर असम्बली शारदा प्रसाद शुक्ला सरकारी और गैर सरकारी जमीनों पर नाजायज कब्जे करने की वजह से सुर्खियों में रहे हैं इलाके के समाजवादी पार्टी के बजाए खुले आम बीजेपी लीडरान और वर्कर्स के काम करते रहते है उन्हें तो अखिलेश ने 27 जून को अपनी वजारत में शामिल कर लिया लेकिन मुख्तार से नफरत। ज्ञानपुर भदोही से समाजवादी पार्टी के मेम्बर असम्बली विजय मिश्रा, इलाहाबाद से सोनभद्र और भदोही तक दहशत के मुतवाजी (प्रर्याय) बन चुके हैं वह पार्टी मेें हैं अखिलेश की ही इजाजत से उनकी बीवी रामलली मिश्रा को एमएलसी बनवाया गया। गोशाइंगज फैजाबाद से अभय सिंह समाजवादी पार्टी के असम्बली मेम्बर हैं। वह मुख्तार अंसारी केे इंतेहाई करीबी हैं। उनके खिलाफ सिर्फ 18 मुकदमे हैं। हौसला इतना कि उस वक्त के प्रदेश के एडीशनल डीजी रमापति राय तक की सरकारी गाड़ी रोक कर उन्हें धमकी दी थी उनसे भी अखिलेश यादव को कोई परेशानी नहीं है। बड़ी तादाद में लोग यह कहते हुए मिल रहे हैं कि कौमी एकता दल और उसके लीडरान की जो तौहीन अखिलेश यादव ने की है उसका जवाब उन्हें असम्बली एलक्शन में दिया जाएगा। कौमी एकता दल के लीडरान का कहना है कि दोनों पार्टियों को एक में मिलाने का आइडिया हमारा नहीं मुलायम सिंह यादव का था। उन्होंने बलराम यादव और शिवपाल यादव के जरिए हमसे बात की फिर बुलाकर खुद सीधे बात की बाद में इस तरह हमें बेइज्जत किया यह कौन सी सियासत है?

अखिलेश यादव के इस फैसले से जो दूसरा बड़ा नुक्सान हुआ है वह यह है कि उनके अपने कुन्बे में एख्तलाफ (विवाद) पैदा हो गया है। अभी तक कुन्बे के लोगों के दरम्यान एख्तेलाफात की जो बात ढकी छुपी थी वह खुलकर मैदान मंेे आ गई है। उनके कुन्बे को नजदीक से जानने वालांे का कहना है कि पूरे कुन्बे में मुलायम सिंह यादव के बाद उनके छोटे भाई शिवपाल यादव ही हैं जिन्हें मुलायम सिंह यादव जैसी सियासत आती है। पूरे प्रदेश के वर्कर्स  को जानते हैं। 1996 मे जब मुलायम सिंह यादव डिफेंस मिनिस्टर बने उस वक्त से 2012 तक शिवपाल यादव ने ही दिन रात एक करके पार्टी को मजबूती से खड़ा किया। अब एक ही झटके में शिवपाल के फैसले को ठुकरा कर अखिलेश यादव ने ठीक नहीं किया। इन लोगों का कहना है कि मुलायम सिंह यादव के चचेरे भाई रामगोपाल यादव शुरू से ही मुलायम सिंह यादव के साथ तो हैं लेकिन पार्टी को मजबूत करने मंे उनका कोई तआवुन (सहयोग) नहीं है। वह तो हमेशा से ही मुलायम की सियासी कमाई खाते रहे हैं। एक बार संभल से लोक सभा एलक्शन जीते हैं वर्ना हमेशा राज्य सभा में ही रहते हैं। लोग उनकी एक शिकायत यह भी करते हैं कि अव्वल तो वह पार्टी वर्कर्स से मिलते नहीं हैं अगर कोई वर्कर किसी तरह उनतक पहुच भी जाए तो बेइज्जती और बदसलूकी का तोहफा लेकर ही वापस लौटता है। शिवपाल यादव ने जिस दिन से प्रदेश और पार्टी की सियासत में कदम रखा है पहले दिन से ही रामगोपाल उनके खिलाफ बताए जाते हैं। जब तक मुलायम सिंह यादव के हाथों मे ही पार्टी  पूरी तरह रही तब तक रामगोपाल यादव चाहकर भी शिवपाल यादव को दबा नहीं पाते थे लेकिन अखिलेश के 2011 में पार्टी का प्रदेश सदर और 2012 में चीफ मिनिस्टर बनने के बाद से चीजें काफी तब्दील हो गईं। कहते हैं कि रामगोपाल यादव अक्सर अखिलेश को उनके चचा शिवपाल यादव के खिलाफ भड़काने का काम भी करते रहते हैं। अभी तक यह बातें ढकी छुपी थीं अब मंजरे आम पर हैं। अगर यह बातें और खबरें सच हैं तो आने वाले दिन समाजवादी पार्टी के लिए अच्छे साबित नहीं होंगे।

मुसलमानों पर अच्छा असर रखने वाले पार्टी के सीनियर लीडर आजम खां नाराज होकर तकरीबन घर बैठ चुके हैं पूर्वी उत्तर प्रदेश में शाकिर अली पहले से ही नाराज है अब अफजाल अंसारी और उनकी पार्टी भी उनकी नाराजगी को मदद पहुंचाएगी। पार्टी में मुलायम सिंह यादव के बाद सबसे ज्यादा मजबूत लीडर शिवपाल यादव को उन्हीं के भाई रामगोपाल यादव और भतीजे अखिलेश यादव मिलकर अलग-थलग करने में लगे हुए हैं। सीतापुर के बिसवां हलके से पार्टी एमएलए रामपाल यादव ने कमर सीधी करके खड़े होने की कोशिश की तो उनका होटल और मकान तक खुदवा दिया गया। पूर्वी उत्तर प्रदेश के यादवों मे असर रखने वाले अम्बिका चैधरी को वजारत से बर्खास्त करके अलग थलग कर दिया गया। दूसरे थे बलराम यादव तो उन्हंे बर्खास्त करके भले ही एक हफ्ते के अंदर दुबारा वजीर बना दिया गया। उनकी हैसियत तो खत्म ही हो गई। पच्छिमी उत्तर प्रदेश मेें पार्टी का सफाया पहले से ही दिख रहा है। ऐसे हालात में अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव दो लोग कुछ नौजवानों और कुछ मफाद परस्तों के सहारे एलक्शन कैसे जीतंेगे यह बात किसी की समझ में नहीं आती है।

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