फरिश्तों की दुआएं

फरिश्तों की दुआएं

नबी करीम (सल0) का इरशाद है कि रोजाना सुबह के वक्त दो फरिश्ते आसमान से उतरते हैं एक दुआ करता है कि अल्लाह खर्च करने वाले को उसका बदल अता फरमा। दूसरा फरिश्ता दुआ करता है कि अल्लाह रोक कर रखने वाले का माल बर्बाद कर दे। (मिश्कात) हजरत अबू दरदा (रजि0), नबी करीम (सल0) का इरशाद नकल करते हैं कि जब भी आफताब निकलता है तो उसकी दोनों तरफ दो फरिश्ते एलान करते हैं जिनको जिन्नात और इंसान के सिवा सब सुनते हैं कि लोगो अपने रब की तरफ चलो थोड़ी चीज जो किफायत का दर्जा रखती हो उस ज्यादा मिकदार से बहुत बेहतर है जो अल्लाह से गाफिल कर दे और जब आफताब डूबता है तो उसकी दोनों तरफ दो फरिश्ते जोर से दुआ करते हैं कि अल्लाह खर्च करने वाले को बदल अता फरमा और रोक कर रखने वाले के माल को बर्बाद कर दे। एक हदीस में है कि जब सूरज निकलता है तो उसकी दोनों तरफ दो फरिश्ते आवाज देते हैं कि या अल्लाह खर्च करने वाले को बदल जल्दी अता फरमा और या अल्लाह रोक कर रखने वाले के माल को जल्दी हलाक फरमा। एक और हदीस में है कि आसमान में दो फरिश्ते हैं जिन के मुताल्लिक सिर्फ यही काम है कोई दूसरा काम नहीं। एक कहता रहता है कि या अल्लाह खर्च करने वाले को बदल अता कर दूसरा कहता है कि या अल्लाह रोक कर रखने वाले को हलाकत अता फरमा। इससे मालूम होता है कि सुबह शाम की खुसूसियत नहीं उनकी हर वक्त यही दुआ है लेकिन पहली रिवायत की बिना पर मालूम होता है कि यह फरिश्ते आफताब निकलने के वक्त और डूबने के वक्त खास तौर से यह दुआ करते हैं और मुशाहिदा और तजुर्बा भी इसकी ताईद करता है कि माल जमा करके रखने वालों पर अक्सर ऐसी चीजें मुसल्लत हो जाती हैं कि सब माल जाया हो जाता है। किसी पर मुकदमा मुसल्लत हो जाता है किसी पर आवारगी सवार हो जाती है किसी के पीछे चोर लग जाते हैं। हाफिज इब्ने हजर ने लिखा है कि बर्बादी कभी तो माल की होती है कभी साहबे माल की। यानी वह खुद ही चल देता है और कभी बर्बादी नेक आमाल के जाया होने से होती है कि वह उसमें फंस कर नेक आमाल से जाता रहता है। इसके बिलमुकाबिल जो खर्च करता है उसके माल में बरकत होती है बल्कि एक हदीस में आया है कि जो शख्स सदका अच्छी तरह करता है अल्लाह तआला उसके तर्के में अच्छी तरह नयाबत करते हैं यानी उसके मरने के बाद भी उसका माल वारिस बर्बाद नहीं करते। बेकार की चीजों में जाया नहीं करते वरना अक्सर रईसों के लड़के बाप के माल का जो हश्र करते हैं वह मालूम ही है। इमाम नूदी ने लिखा है कि जो खर्च पसंदीदा है वह ही खर्च है जो नेक कामों में हो बालबच्चों के नफके में हो या मेहमानों पर खर्च हो या दूसरी इबादतों में हो। करतबी कहते हैं कि यह फर्ज इबादत और नफिल इबादत दोनों को शामिल है। लेकिन नवाफिल से रूकने वाला बददुआ का मुस्तहक नहीं होता। मगर यह कि उसकी तबीयत पर ऐसा बुख्ल मुसल्लत हो जाए जो वाजिबात में भी खुशी से खर्च करे।

HIndi Latest