अली बिरादरान और तहरीके खिलाफत

अली बिरादरान और तहरीके खिलाफत

खिलाफते उस्मानिया के खिलाफ और उसके हवारियों की तरफ से उठाए गए कदम और इस्लाम व मुसलमानों को उनकी मरकजियत से दूर करने की साजिश के खिलाफ मुत्तहिदा महाज की शक्ल मंे खिलाफते तहरीक 1919 की इब्तिदा में शुरू हुई। इस तहरीक को गांधी जी की कयादत व हिमायत हासिल थी। इस तहरीक मंे अली बिरादरान यानी मौलाना मोहम्मद अली और मौलाना शौकत अली की सरगर्म शुमूलियत थी इस तहरीक को चलाने के लिए खिलाफ कमेटी कायम हुई थी जिसका मकसद यह था कि ब्रिटिश सरकार को मुसलमानों के मुकद्दस मकामात पर कब्जा करने से बाज रखा जाए। अली बिरादरान से पहले इस तहरीक के मौलाना महमूद उल हसन और मौलाना अब्दुल बारी थे। तहरीक कायम होने के इब्तिदाई दौर में मौलाना मोहम्मद अली जेल में थे और जेल से रिहा होने के बाद खिलाफत का सारा काम उनके सुपुर्द हुआ और फिर खिलाफत व मोहम्मद अली लाजिम व मलजूम हो गए। खिलाफत तहरीक मंे अली बिरादरान की हौसला अफजाई सबसे ज्यादा उनकी वालिदा आबादी बानो बेगम ने जो ‘बी अम्मा’ के नाम से मशहूर थीं।
खिलाफत तहरीक के बारे में गांधी जी ने कहा था कि अगर खिलाफत तहरीक न होती तो हिन्दुस्तान कभी आजाद न हुआ होता। मौलाना अबुल कलाम आजाद ने बंगाल की सूबाई कांफ्रेंस में सदारत की थी और खिलाफत की हिमायत में कहा था-
‘इस्लाम का कानून शरई यह है कि हर जमाने में मुसलमानों का एक खलीफा व इमाम होना चाहिए खलीफा से मकसूद ऐसा मुख्तार मुसलमान बादशाह और साहबे हुकूमत व ममलिकत जो मुसलमानों और उनकी आबादियों की हिफाजत और शरीअत के अरकान के निफाज की पूरी कुदरत रखता हो और दुश्मनों के मुकाबले के लिए पूरी तरह ताकतवर हो। यूं तो इस्लामी खिलाफत का मंसब सलातीने उस्मानिया को हासिल है और उस वक्त शरअ के लिहाज से तमाम मुसलमानो के खलीफा और इमाम वही हैं। इसलिए उनकी इताअत तमाम मुसलमानों पर फर्ज है और जो उनकी इताअत से बाहर हुआ उसने इस्लाम का हलका अपनी गर्दन से निकाल दिया और इस्लाम की जगह जाहिलियत मोल ले ली। जिस जिस ने उनके मुकाबले मंे लड़ाई की या उनके दुश्मनों का साथ दिया उसने खुदा और रसूल से लड़ाई की। गरज कि खिलाफत का मसला हिन्दुस्तानी मुसलमानों का मजहबी मसला था।’
1920 में खिलाफत तहरीक के रहनुमाओं और इंडियन नेशनल कांग्रेस में जो उस वक्त हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी पार्टी थी मुआहिदा हुआ। दोनों ने यह तय किया कि वह खिलाफत और हिन्दुस्तान की आजादी के लिए साथ साथ काम करेंगे। इस तरह दोनों तहरीकों के एक दूसरे से तआवुन देने के हिन्दू- मुस्लिम एत्तेहाद पैदा हुआ और मौलाना मोहम्मद अली की वलवलाअंगेज शख्सियत से गांधी जी को कुवत मिली। खिलाफत तहरीक का सबसे मुसबत पहलू था और मौलाना मोहम्मद अली का सबसे बड़ा कारनामा था वह यह था कि उन्होंने अंग्रेजों के डिवाइड एंड रूल की पालीसी को इस तहरीक की मदद से नाकारा बना दिया था। मौलाना मोहम्मद अली को गांधी जी ने लव एट फस्र्ट साइट करार दिया। खिलाफत के दूसरे लीडर डाक्टर अंसारी, मौलाना आजाद, हकीम अजमल खां को गांधी जी की कुर्बत हासिल हुई। इस कुर्बत का एक फायदा यह हुआ कि इन शख्सियात ने कौमी एत्तेहाद पैदा करने और मुसलमानों की तालीमी पसमांदगी को दूर करने के लिए 1920 मे कौमी इदारा जामिया मिल्लिया इस्लामिया कायम किया। अंग्रेजों ने इस एत्तेहाद को कुचलने की भरपूर कोशिश की और बहुत से लीडरों को कैद कर लिया खिलाफत और कांग्रेस का एत्तेहाद बहुत ज्यादा अर्सा नहीं चल पाया और हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग की मुखालिफत की वजह से कमजोर पड़ता गया। हिन्दुओं ने खिलाफत तहरीक को इस्लामिक फंडामेंटलिज्म का गहवारा तसव्वुर किया। 1928 में पंडित जवाहर लाल नेहरू की सदारत में ड्राफ्ट आईन तैयार करने के लिए एक कमेटी कायम हुई जिसमें मरकजी खिलाफत कमेटी के मेम्बरों ने भी हिस्सा लिया। इस ड्राफ्ट आईन का नाम नेहरू रिपोर्ट था। मौलाना शौकत अली और बेगम मोहम्मद अली के अलावा तीस अराकीने खिलाफत कमेटी ने शिरकत की। सेंट्रल खिलाफत कमेटी के तीस अरकान यह थे-
‘मौलाना मोहम्मद इरफान मुंबई, मौलाना मुहीउद्दीन अजमेरी मुंबई, यासीन नूरी बैरिस्टर एट लाॅ अहमदाबाद, एस के नबी उल्लाह वकील, मौलवी गुलशेर खां इकोला (बरार), मौलाना मोहम्मद इब्राहीम मुजफ्फरपुर (बिहार), मौलवी मंजूर अली तालिब, शिमला, हाजी मूसा खां अलीगढ, मोहम्मद आजाद सुब्हानी गोरखपुर, मौलाना मोहम्मद जाफरी एडवोकेट दिल्ली, सैसद लाल बादशाह पेशावर, मौलाना अब्दुल माजिद दरियाबादी, सैयद रऊफ पाशिम, हाफिज मोहम्मद उस्मान अलीगढ, शेख अब्दुल माजिद कराची, डाक्टर मगफूर अहमद जाजी मुजफ्फरपुर (बिहार), सेठ हाशिम अब्दुर्रहमान कलकत्ता, ख्वाजा गयास उद्दीन कलकत्ता, शेख इलाही बख्श समतराही, मौलाना अब्दुल मोहसिन मोहम्मद सज्जाद फुलवारी शरीफ पटना (बिहार), सरदार सुलेमान कासिम मीठामालाबार हिल्स मुंबई, हाजी अली मोहम्मद जलाल उद्दीन मुंबई, मौलाना अब्दुर्रऊफ मुंबई, मौलवी फतेह मोहम्मद एडीटर इंसाफ मुंबई, मोहम्मद जान मुंबई, सेठ अहमद भमरी वाला मुंबई, खां बहादुर अब्दुल अहद खां मुंबई, मौलवी हिमायत उल्लाह मुंबई, मोहम्मद बख्श जमादार मुंबई, जाहिद अली मुंबई।
बाद में खिलाफ कमेटी ने नेहरू रिपोर्ट को मुस्तरद कर दिया। रिपोर्ट मुस्तरद होने के बाद अली बिरादरान और गांधी जी के बीच राब्ता कम हो गया और तहरीक तर्के मवालात चैरीचैरा में 23 पुलिस अहलकारों के कत्ल के बाद कांग्रेस और खिलाफत कमेटी ने एक दूसरे की हिमायत करना तर्क कर दिया इसके बाद हिन्दुस्तान के मुसलमान तीन हिस्सो में बट गए यानी कांग्रेस, खिलाफते तहरीक और मुसिलम लीग । इधर मुस्तफा कमाल पाशा की फतेह के बाद तुर्की मंे मगरिबी मुमालिक की हिमायत से एक जम्हूरी हुकूमत कायम हो गई और खिलाफत का सिलसिला 1924 तक खत्म हो गया। तुर्की की नई हुकूमत ने हिन्दुस्तान से भी मदद मांगी। मौलाना मोहम्मद अली की वालिदा बी अम्मा ने मरते दम तक तहरीके खिलाफत और मुसलमानों की बरतरी और एत्तेहाद के लिए जद्दोजेहद की मगर 13नवम्बर 1924 को उनका इंतकाल हो गया। अपनी जिंदगी में उन्होंने अपनी बेटों को खिलाफत तहरीक को जिंदा रखने और ब्रिटिश साम्राज के खिलाफ जद्दोजेहद रखने की तलकीन की। कहा जाता है कि बी अम्मा को यह गुमान हो गया कि उनके बेटे (मोहम्मद अली व शौकत अली) ब्रिटिश साम्राज की गर्म सलाखांे की तपिश बरदाश्त नहीं कर सके और माफी मांगकर बाहर आजादी की फजा मंे आना चाहते हैं ऐसे में एक मां को बेटों की आमद का इंतजार होना चाहिए था लेकिन वह मां थी जिसने कहा था कि अगर मेरे बेटों ने फिरंगियों से माफी मांग ली है और रिहा हो रहे हेै तो मेरे हाथों को अल्लाह इतनी कुवत दे कि मैं अपने हाथों से उनके गले दबा कर उन्हें हलाक कर दूं। ऐसी माओं की मिसाल नहीं मिलती। बी अम्मां खुद एक मिसाल हैं।
इब्तिदा मंें खिलाफत तहरीक बिल्कुल मजहबी नौइयत की मालूम हुई लेकिन इस तहरीक से जुड़े हिन्दुस्तान के रहबरों खासकर मौलाना मोहम्मद अली ने उसे तहरीके आजादी-ए-हिन्द से जोड़ दिया और इसी तहरीक में वुसअत और हमा गीरी गांधी जी की शुमूलियत से पैदा हुई इसलिए जब गांधी जी ने खिलाफत उस्मानिया से हमदर्दी जाहिर की और खुलूस से वह मुसलमानों के साथ मैदान में आए तो वह बहुत जल्द मुसलमानों में मकबूल हो गए। खिलाफते तहरीक ने न सिर्फ यह कि हिन्दुस्तान मंे आजादी की तहरीक को तेजतर किया बल्कि दुनिया के दीगर मुल्कांे मंे भी आजादी की तहरीक को आम किया। दूसरी खिलाफत कांफ्रेंस दिल्ली मंे हुई जिसमें दोनों कौमों के रहनुमाओं ने शिरकत की। गांधी जी के अलावा स्वामी श्रद्धानंद और मिस्टर शंकर लाल ने भी शिरकत की। इसी जलसे में गांधी जी ने तकरीर की और खिलाफत तहरीक की अहमियत का जिक्र करते हुए हिन्दू मुस्लिम एत्तेहाद पर जोर दिया और कहा कि अगर मुसलमानों के दिल रंजीदा हैं तो हिन्दू उनके शरीके गम हैं। इस जलसे मंे गांधी जी ने खिलाफत कमेटी के लिए चंदा की अपील की और खुद एक पैसा तबरका इनायत किया। यह एक पैसा नीलाम हुआ और जिसकी कीमत पांच सौ एक रूपया तय पाई। 6 सितम्बर 1920 को जमीयत उलेेमा हिन्द का एक इजलास कलकत्ता मंे जेरे सदारत मौलाना ताज मोहम्मद सिंधी मुनअकिद हुआ और पांच सौ उलेमा के दस्तखत से तर्के मवालात का फतवा शाया हुआ। यह फतवा मौलाना अबुल मुहास मोहम्मद सज्जाद साहब नायब अमीर शरीअत बिहार ने तहरीर फरमाया था। मौलाना आजाद ने अपनी तकरीर में कहा कि खिलाफत कमेटी ने एहकामे शरअ के मातहत फैसला किया कि तर्के मवालात मुसलमानों के फरायज में से है। आप की तहरीके खिलाफत हिन्दुस्तान की आजादी की तहरीक है।
अली बिरादरान यानी मौलाना मोहम्मद अली और मौलाना शौकत अली तहरीके खिलाफत के अहम मेम्बर थे लेकिन मौलाना मोहम्मद अली को इस तहरीक का करता धरता माना जाता है।
मोहम्मद अली के वालिद अब्दुल अली खां का ताल्लुक कस्बा नजीबाबाद जिला बिजनौर से था मगर मुलाजिमत के सिलसिले से रियासत रामपुर में रहते थे। उनकी वालिदा बी अम्मां के नाम से मशहूर थीं । उनके चार बेटे थे। नवाजिश अली, जुल्फिकार अली, शौकत अली और मोहम्मद अली। नवाजिश अली का कमसिनी में इंतकाल हो गया था। अली बिरादरान के वालिद का इंतकाल भी जल्द हो गया। इस तरह बी अम्मां पर बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी रही। बच्चों की तालीम व तर्बियत पर पूरी नजर रखी और आला इकदार से रौशनास कराया। तीन बेटों में मोहम्मद अली निहायत जहीन और निडर इंसान थे और उनके अंदर जोश और हिम्मत भरपूर था। उनकी बातचीत और तकरीरें बहुत दिलचस्प और जेहन को असर अंदाज करने वाली होती थीं। एक आलिम ने बी अम्मां से पूछा कि मोहम्मद अली को इतना कद्दावर आप की तर्बियत ने बनाया तो उन्हांेने कहा कि नहीं यह अल्लाह का फजल व करम है । वह जिसको चाहे नवाज दे।
मौलाना मोहम्मद अली के बड़े भाई मौलाना शौकत अली भी खिलाफत तहरीक के अहम मेम्बर और कौमी लीडर थे। शौकत अली 1873 में रामपुर में पैदा हुए और तालीम अलीगढ मुस्लिम युनिवर्सिटी में पाई। शौकत अली बहुत फआल और बासलाहियत इंसान थे। उन्होंने आगरा और अवध की सिविल सर्विस मंे 1896 से 1913 तक काम किया। मौलाना शौकत अली ने अपने छोटे भाई मोहम्मद अली की भरपूर मदद की और उनकी मदद से मौलाना मोहम्मद अली ने उर्दू का अखबार हमदर्द और अंग्रेजी का अखबार कामरेड निकाला। अखबारात में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मजामीन शाया करने और तहरीके तर्के मवालात मंे महात्मा गांधी की भरपूर हिमायत करने पर मौलाना मोहम्मद अली को 14 सितम्बर 1921 से 29 अगस्त 1923 तक लगातार जेल मंे रहना पड़ा । मौलाना मोहम्मद अली जिस जमाने मे जेल मे थे खिलाफते तहरीक की रहनुमाई मौलाना शौकत अली ने की। खिलाफते तहरीक के तीस मेम्बर मौलाना शौकत अली के कांधे से कांधा मिलाकर तहरीक में शामिल रहे। उन्होंने पहली और दूसरी गोल मेज कांफ्रेंस मंे लंदन मेे शिरकत की। 1931 मंे मौलाना मोहम्मद अली के इंतकाल के बाद उन्होंने आलमी मुस्लिम कांफ्रेंस यरूशलम मंे मुनअकिद कराई। मौलाना शौकत अली ने 1936 मंे आल इंडिया मुस्लिम लीग की शुमूलियत अख्तियार की और हिन्दुस्तान की आजादी की तहरीक मंे भरपूर हिस्सा लिया।
मौलाना शौकत अली के छोटे भाई मोहम्मद अली हिन्दुस्तान के कद्दावर और बासलाहियत लीडर थे। उनकी शोलाबाज तकरीरो ने तहरीके आजादी के मुर्दा जिस्म में जान डाल दी। उनकी पुरमग्ज तहरीरों ने मुल्क मंे हलचल मचा दी। कमाल यह है कि जैसी कुदरत उन्हें उर्दू पर हासिल थी ऐसी ही अंग्रेजी पर थी। मौलाना मोहम्मद अली रासेखुल अकीदा मुसलमान थे और इतने ही बड़े कौमपरस्त भी थे। मौलाना मुल्क की आजादी के दीवाने थे। तहरीके आजादी को मुस्तहकम करने में जान खपा दी। उन्होंने इंग्लिस्तान मंे गोल मेज कांफ्रेंस में उखड़ी हुई सांसों के बीच गरजदार आवाज मेें कहा था कि यह मेरा अज्म है कि हिन्दुस्तान वापस जाऊंगा तो आजादी का परवाना लेकर और अगर अंगे्रज मेरे देश को आजादी नहीं देना चाहते तो मेरी कब्र के लिए जगह देनी पड़ेगी। इस खादिमे इस्लाम ने मौत पाई तो ऐसी काबिले रश्क कि मुसलमानों के किब्ला अव्वल में हमेशा के आराम केलिए जगह पाई। मोहम्मद अली की पैदाइश 10 दिसम्बर 1878 को रामपुर में हुई। 1890 मंे मैट्रिक का इम्तेहान पास किया। वह मजीद तालीम हासिल करने के लिए अलीगढ चले गए। अलीगढ मंे दरसी किताबों से ज्यादा दूसरी सरगर्मियां उनकी तवज्जो का मरकज रहीं और यही से उन्हें शायरी का शौक पैदा हो गया और अपना तखल्लुस जौहर रख लिया और मोहम्मद अली जौहर हो गए। 1898 मेे मोहम्मद अली ने दर्जा अव्वल मंे बीए पास किया और पूरी इलाहाबाद युनिवर्सिटी में अव्वल आए। बड़े भाई शौकत अली की ख्वाहिश थी कि वह इंग्लिस्तान जाएं और आईसी एस बनंे मगर वह आइसीएस नहीं बन पाए और वापस आए। अमजदी बेगम से शादी हुई और फिर इंग्लिस्तान चले गए और आक्सफोर्ड से आनर्स की डिग्री लेकर वापस लौटे। पहले रामपुर के एक हाई स्कूल के प्रिंसिपल और फिर एजूकेशन अफसर मुकर्रर हुए और फिर सियासत और सहाफत की तरफ मायल हुए। 14 जनवरी 1911 से उन्होंने अपना हफ्तावार अंग्र्रेजी अखबार कामरेड निकाला मुल्क मंे हर तरफ धूम मच गई अंग्रेज भी इस अखबार से बहुत मुतास्सिर थे और इसकी कापी इंग्लिस्तान भेजी जाती थी। यहां तक कि वायसराए को भी इस अखबार का इंतजार रहता था। इश्तेआल अंगेज बागियाना मजामीन शाया करने के जुर्म में मोहम्मद अली नजर बंद भी हुए। वह मुल्क के तूफानी दौरे करते रहे और आतिश बगावत को हवा देते रहे। और अब वह मिस्टर मोहम्मद अली नहीं बल्कि मौलाना मोहम्मद अली जौहर थे। 23 फरवरी 1913 से उन्होंने एक दूसरा अखबार रोजनामा हमदर्द उर्दू में निकाला। अब मौलाना का बेश्तर हिस्सा कैद व बंद मंेे गुजरने लगा। वह कैद की तकलीफें भी झेलते और शेअर भी कहते। कांगेे्रस के चोटी के लीडरो में मौलाना का शुमार था। तहरीके अदम तआवुन का आगाज हुआ तो मुल्क में आग सी लग गई। मौलाना ने बाद मंे एक कौमी कालेज की दाग बेल डाली जो जामिया मिल्लिया इस्लामिया कहलाया। सख्त बीमारी के बावजूद आजादी की तवील जंग लड़ने के बाद नवम्बर 1930 मेें गोल मेज कांफ्रेंस में शिरकत के लिए लंदन गए। मौलाना मोहम्मद अली ने गोल मेज कांफ्रेंस के चैथे इजलास में 19 नवम्बर 1930 को अपनी तकरीर मंे (जो उनकी आखिरी तकरीर थी) कहा था कि जहां हिन्दुस्तान का सवाल आता है जहां हिन्दुस्तान की आजादी का सवाल आता है जहां हिन्दुस्तान की फलाह व बहबूद का सवाल आता है मेैं अव्वल भी हिन्दुस्तानी हूं और दोयम भी हिन्दुस्तानी हूं और आखिरमे भी हिन्दुस्तानी हूं और हिन्दुस्तानी होने के अलावा कुछ नहीं हूं लंदन मे ही 4 जनवरी 1931 को उनका इंतकाल हो गया जनाजा यरूशलम लाया गया और बैतुल मुकद्दस के अहाते मंे 23 जनवरी 1931 को तदफीन अमल में आई उनके जनाजे मेे तकरीबन दो लाख लोग शामिल थे। बकौल खुद
हे रश्क एक खल्क को जौहर की मौत पर/ यह उसकी देन है जिसे परवरदिगार दे।
अली बिरादरान खासकर मौलाना मोहम्मद अली जौहर के कारनामों को एक जगह कलम बंद करने के लिए काफी वक्त और जगह दरकार है। मुख्तलिफ अदीबो और शायरों ने उनके कारनामों को कलमबंद किया हैं उन्हें शायरों मंेे एक प्रोफेसर आले अहमद सूरूर ने अपने मजमूआ कलाम सलसबील 1935मे अपने तास्सुरात एक खुसूसी गोशा ‘लाला सहरा शहीदे मिल्लत मौलाना मोहम्मद अली जौहर की जद्दोजेहद के एक अक्स’ की शक्ल में पेश किया हैं जिसके चंद अशआर हैं-
मरते मरते भी दिखा दी तूने सबको शाने हक/ कसर बातिल कांप उठा सुनकर तेरा एलाने हक/ मुश्किलें पेश आईं लाखों गो दिल बीमार को/ कौमियत का रास्ता दिखला दिया अगयार को/ दे चुका जब सारी दुनिया को पयामे जिंदगी/ हो गया लबरेज जौहर का भी जामे जिंदगी/ जर्रा जर्रा हिन्द का सुनकर जिसे मदहोश था/ आह वह नगमा हमेशा के लिए खामोश था/ जिसकी ताबानी से बज्मे जिंदगी रौशन हुई/ आह वह शमा अपने जलवों से तही दामन हुई/ साहिले दरिया के हर जर्रा को लाकर होश में/ मौज मुजतर होगई फिर बहर की आगोश मंे।